Tuesday, February 22, 2011
Sunday, February 20, 2011
लोहिया के वारिस
डॉ. राममनोहर लोहिया के वारिसों को तीन वर्गो में बांटा जा सकता है- कलमवीर, गलावीर और कर्मवीर। इनमें कलमवीरों की संख्या सबसे ज्यादा दिखाई देती है। कलमवीर उत्सव के दौरान ड्रम बजाने वालों से बेहतर नही हैं। उनकी कलम में अतिरिक्त स्याही हमेशा मौजूद होती है। वे इस स्याही का इस्तेमाल पहले छिटपुट या कभी-कभार करते थे। लोहिया की जन्मशती के अवसर पर वह तबियत से स्याही उड़ेल रहे हैं। समस्या यह है कि लोहिया सिद्धांत की बात जरूर करते थे पर उसके साथ अल्पकालिक या दीर्घकालीन कार्यक्रम जरूर जोड़ते थे। कार्यक्रम के बिना सिद्धांत गले के हार की तरह है- न वह खाने-पीने के काम आता है न उससे सेहत सुधरती है। आज के लोहियावादी लेखन में किसी राजनीतिक कार्यक्रम की झलक तक नहीं मिलती। यहां तक कि समाजवाद का नाम, झिझकते हुए भी नहीं लिया जाता। ऐसे निर्गुण लेखन से आज की दिशाहारा पीढ़ी को कोई मार्गदर्शन नहीं मिल सकता। लोहिया के स्तवन से यह तो प्रगट होता है कि वे गांधी के बाद सबसे बड़े नेता और विचारक थे पर आज के लड़के-लड़कियां पूछेंगी वे महान थे तो हमें क्या? हमें यह बताओ कि आज हम क्या करें? वर्तमान लोहियाटिक लेखन इसमें कोई मदद नहीं करता। जहां तक गलावीरों का सवाल है उनका तो कहना ही क्या! कलमवीर कम से कम लिखने की तकलीफ तो गवारा करते हैं। गलावीर माइक के सामने सिर्फ जीभ हिलाते हैं। इन्हें देखकर अब तो गुस्सा तक नहीं आता, क्योंकि इनके बारे में हम पहले से जानते होते हैं कि इनकी राजनीतिक पूंजी कुछ और है। ज्यादातर गलावीर रंगे सियार हैं। कायदे से समाजवादी मिजाज के आयोजकों को इन्हें बुलाना ही नहीं चाहिए फिर भी इन्हें लगभग हर जगह बुलाया जाता है। इसका एक कारण तो यह है कि सच्चे समाजवादी वक्ता हों तब तो उन्हें आमंत्रित किया जाए। दूसरा कारण यह है शायद ज्यादा ठोस कि ज्यादातर गलावीर कहीं न कहीं सत्ता से जुड़े होते हैं। ऐसे सम्मेलनों में हमेशा पुराने समाजवादियों से ही मुलाकात होती है, क्योंकि नए समाजवादियों की पौध रोपी ही नहीं गई है। तीसरी श्रेणी के समाजवादियों को हमने कर्मवीर बताया है, लेकिन इनकी संख्या इतनी कम है कि कभी-कभी यह शक होने लगता है कि इनका अस्तित्व है भी नहीं। छोटे-छोटे शहरों और कस्बों में, गांवों में भी लोहिया के सिपाहियों की सक्रियता के बारे में सुनता रहता हूं। ये लोहिया के जमाने में भी मजनूं थे और आखिरी सांस तक मजनूं बने रहेंगे। जैसे अब भी पुरानी तर्ज के गांधीवादी जहां-तहां मिल जाते हैं और कुछ कम्युनिस्ट भी। मेरे पास इनके लिए सर्वश्रेष्ठ उपमा जुगनू की है। बढ़ते हुए अंधेरे में इन्हें देखकर मन प्रसन्न तो होता है पर कोई आस नहीं बंधती। लोहिया के ज्यादातर सक्रिय दावेदारों ने किशन पटनायक की समाजवादी जन परिषद में शरण ली है। इनके लिए परिषद बरसात में छाते की तरह है। समाजवादी जन परिषद के वर्तमान प्रमुख सुनील हर तरह से एक विशिष्ट व्यक्तित्व हैं। वह जानकारी जुटाते हैं, विचार करते हैं, लिखते हैं और राजनीतिक सक्रियता भी बनाए रखते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि सुनील मध्य प्रदेश के पिछड़े जिले होशंगाबाद के एक आदिवासी-बहुल गांव में परिवार के साथ रहते हैं और सिर्फ राष्ट्रीय राजनीति ही नहीं करते, बल्कि अपने क्षेत्र को भी गरम बनाए रखते हैं। परिषद के कुछ अन्य नेता और कार्यकर्ता भी प्रणम्य हैं। काश ये सभी लोहिया का नाम कुछ और ज्यादा लेते होते। कुछ लोगों का मानना है कि लोहिया खुद महान थे पर उन्होंने साथी अच्छे नहीं चुने। यह आरोप सही नहीं है। लोहियाजी का काफिला शिव की बारात नहीं थी। कुछ सिरफिरे या सुविधावादी सभी जमातों में होते हैं। वे लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी या संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में भी थे पर लोहिया उनसे परेशान रहते थे और उन्हें डांटते-डपटते भी रहते थे। कुछ के बारे में तो कहा जाता है कि उनसे मिलने के लिए वह दरवाजा तक नहीं खोलते थे। सार्वजनिक जीवन में ये समस्याएं आम हैं। जो चीज खास है वह है लोहिया के वारिसों का सीमाहीन चारित्रिक पतन। जॉर्ज फर्नाडीज को इनका महानायक कहा जा सकता है। बहुत सोचने पर भी समझ में नहीं आता कि ऐसा क्यों हुआ? एक ही बात दिखाई देती है कि लोहिया या जयप्रकाश व्यावहारिक स्तर पर विफल होने को भी तैयार रहते थे, क्योंकि वे रूटीन किस्म के नेता नहीं थे। जो रूटीन किस्म का नेता होता है उसे किसी भी कीमत पर अपने सिद्धांतों और चरित्र की कीमत पर भी सफलता चाहिए। सफलता के लिए दौड़ हमेशा पतित करती है। फिर समाजवादी लोग भी इसका अपवाद कैसे बने रह सकते थे? फिर भी हम निराश नहीं हैं। हर महापुरुष अपने समय से पहले पैदा होता है। लोहिया ने अपने समय से बहुत बहस की और संघर्ष भी कम नहीं किया, लेकिन उनका असली समय अभी भी नहीं आया है। जिस तरह इतिहास आज महात्मा गांधी को पुकारा रहा है उसी तरह कल लोहिया को भी पुकारा जाएगा। इस बीच यंत्रणा और निराशा का लंबा दौर हमारे सामने है। काश लोहिया के प्रति श्रद्धा रखने वाले भले लोग इस दौर को छोटा करने के लिए कुछ कर पाते।
Thursday, February 10, 2011
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