Thursday, July 7, 2011

शिक्षाविद् वैज्ञानिक के शिखर

वर्ष 2005 के जनवरी में लखनऊ विश्वविालय के कुलपति का पदभार संभाले हुए प्रो. राम प्रकाश सिंह को मात्र पांच दिन ही हुए थे। अचानक एक छात्र नेता उनके कमरे में हथियारबंद होकर घुस आया। उसने कुलपति के साथ कुछ इस तरह से बातचीत की कि आईआईटी खड़गपुर से आए प्रो. सिंह को माहौल का अंदाजा लगाने में जरा भी कठिनाई नहीं हुई। वैसे भी उन्हें उस दौरान विश्वविालय परिसर के माहौल के बारे में जानकारी मिल चुकी थी। छात्र नेता के व्यवहार ने उनका यह संकल्प मजबूत बना दिया कि वे अपने कार्यकाल के दौरान शिक्षा के इस मंदिर की सूरत पूरी तरह से बदल देंगे। यहां उच्चतर अकादमिक गतिविधियों के लिए आदर्श माहौल होगा। यह संकल्प पूरा करने के लिए अपने तीन वर्षो के कार्यकाल में प्रो. सिंह न तो शासन की घुड़की से डरे, न प्रशासन के असहयोग से निराश हुए। जब उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया तो उन्हें अपना मिशन एक हद तक पूरा करने का संतोष था। विश्वविालय से छात्र नेताओं के नाम पर जड़ें फैलाए बैठे सफेदपोश गुंडों की सफाई लगभग हो चुकी थी और प्रो. सिंह पूरे लखनऊ और अकादमिक जगत की आंखों में हीरो बन चुके थे। 

प्रस्तुत है प्रो. सिंह के 71वें जन्मदिन पर राजकुमार भट्टाचार्य का विशेष लेख..1. डी. फिल की डिग्री के दौरान किए गए शोध कार्य के लिए वर्ष 1969 में अमेरिकी कृषि विभाग की तरफ से प्रशंसा प्रमाण पत्र। 

2.
बायोडिग्रेडेबल फ्लोक्यूलेंट्स फॉर इंडस्ट्रियल एफ्लुएंट ट्रीटमेंट विषय पर एसके रथ के साथ किए गए शोध कार्य को वर्ष 1995 में नेशनल सिंपोजियम ऑन रीसेंट एडवांसेज इन न्यू पॉलिमरिक मैटीरियल्स की तरफ से सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र का पुरस्कार।

3.
वर्ष 1996 में एमआरएसआई मेडल पुरस्कार से सम्मानित 

4.
बॉम्बे विश्वविालय की तरफ से वर्ष1996-97 का डॉ. मूलगी भाई शिवा भाई पटेल ट्रस्ट फेलोशिप।

5.
वर्ष 1997 में नेशनल अकादमी ऑफ साइन्सेज के फेलो बने। 

6.
वर्ष 1998 में डीएएडी शोध एवं अध्ययन पुरस्कार से नवाजे गए। 

7.
एडवांस्ट मैटीरियल्स पर वैश्विक मंच पॉलीकैर की वैज्ञानिक समिति के सदस्य बने।

8.
अकाउस्टिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया और अल्ट्रासोनिक्स सोसाइटी ऑफ इंडिया के फेलो बने।

9.
एनसी कर्मकार, बीएस शाी तथा आरपी सिंह के शोधपत्र डेवलपिंग बायोडिग्रेडेबल पॉलिमरिक फ्लोक्यूलेंट्स फॉर दी ट्रीटमेंट ऑफ कोल फाइन्स सस्पेन्शन्स को वर्ष 2000 में बायो/एनवायरनमेंटली डिग्रेडेबल पॉलीमर सोसाइटी की भारतीय इकाई द्वारा सर्वश्रेष्ठ शोधपत्र के पुरस्कार से नवाजा गया।

10.
वर्ष 2002 में अंतरराष्ट्रीय मैटीरियल्स शिक्षा परिषद की कार्यकारी समिति के सदस्य मनोनीत।

11.
वर्ष 2005 में पॉलीकैर द्वारा अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फ्लोरी पुरस्कार से सम्मानित।

12.
जापान की एक संस्था अंरराष्ट्रीय सामाजिक तथा सांस्कृतिक एवं उन्नयन की तरफ से वर्ष 2005 में जीवन भर की उपलब्धियों के लिए पुरस्कृत।अकादमिक उत्कृष्टता और उच्चतम स्तर की प्रशासनिक काबलियत उसी तरह एक साथ नहीं चलते जिस तरह एक जमाने में लक्ष्मी और सरस्वती का साथ नहीं होता था। फिर भी, जिस व्यक्ति का दिमाग स्टील का बना हो, वह खुद में दोनों क्षमताएं समान रूप से विकसित कर लेता है। लखनऊ विश्वविालय के पूर्व कुलपति रहे प्रो. राम प्रकाश सिंह इसके सबूत हैं। इन दिनों प्रोफेसर एमेरिटस के रूप में पुणे स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइन्स एजुकेशन एंड रिसर्च को अपनी सेवाएं दे रहे प्रो. सिंह को वर्ष 2005 से 2008 तक लखनऊ विश्वविालय के कुलपति के रूप में ऐसे तत्वों से सीधा जूझना पड़ा, जिनका सामना किसी आम आदमी के लिए बुरे सपने से कम नहीं होता है। इन तत्वों की दबंगई रोकना बहुत बड़ी चुनौती थी। प्रो. सिंह की सफलता ने इस विश्वविालय से गुम हो चुका अकादमिक माहौल लौटाकर लाने में मदद दी। यह अपने-आप में एक बड़ी उपलब्धि थी। छात्र राजनीति में घुस आए अपराधी तत्वों के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाले राज्य की राजनीति का सीधा मुकाबला करने के मायने क्या हैं यह तो कोई खुद प्रो. सिंह से ही पूछे। शिक्षा और विशेष तौर पर उच्चतर शिक्षा के प्रति पूरी तरह से समर्पित प्रो. सिंह ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। यह उनके अपने राज्य की शिक्षा व्यवस्था में सुधार का सवाल तो था ही, देश के सबसे बड़े आवासीय विश्वविालय की हालत में बेहतरी की बड़ी जिम्मेदारी भी थी। 6 जनवरी, 2005 में इस विश्वविालय के कुलपति के रूप में अपना कार्यभार संभालने के बाद पॉलीमर विज्ञान के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर चुके इस वरिष्ठ वैज्ञानिक ने एक वर्ष के अंदर कई बड़े परिवर्तन कर दिए। विश्वविालय परिसर से अवांछित तत्वों की सफाई के लिए उनके द्वारा उठाए गए कदमों की जिस समय पूरे देश में सराहना की जा रही थी, उसी समय विधानसभा में समूचे विपक्ष के साथ ही सरकार ने उनके साथ असहयोग करने की ठान ली। इस चुनौती से निपटने के लिए उन्होंने इतना काम कर दिखाया कि वर्ष2006 तक राष्ट्रीय मीडिया ने उन्हें वर्ष के 10 हीरो में से एक माना और मैन ऑफ यूपी-2006 के खिताब से नवाजा। अखिल भारतीय बुद्घिजीवी कॉन्फ्रेंस ने उन्हें यूपी रतन पुरस्कार दिया। यह सिलसिला आने वाले दो वर्षो तक जारी रहा। जहां मंजुनाथ षन्मुगम ट्रस्ट ने वर्ष 2007 में पहले मंजुनाथ पुरस्कार के लिए उनको नामित किया वहीं गॉडफ्रे फिलिप्स की तरफ से वर्ष 2008 में उन्हें माइंड ऑफ स्टील वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 

इस वर्ष 7 जुलाई को अपने जीवन के 70 साल पूरे करने जा रहे प्रो. सिंह से अक्सर यह सवाल पूछा जाता रहा है कि आखिर उन्होंने बतौर कुलपति कैसे निभाई अपनी यादगार सुधारपरक भूमिका, वह भी तमाम रुकावटों और शासन-प्रशासन के सहयोग के बगैर? लंबे कद-काठी वाले और चश्मा लगाए प्रभावशाली आवाज में बातें करने वाले प्रो. सिंह का जवाब यह होता है कि वे हमेशा जानते थे कि उनके निर्णय बिल्कुल सही थे। इन निर्णयों में से एक था विश्वविालय छात्र संघ के चुनाव करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जेएम लिंग्दोह समिति की सिफारिशों को लागू करना। इस फैसले से छात्र राजनीति के माध्यम से राज्य या राष्ट्र स्तर की राजनीति चमकाने में जुटे अवांछित तत्वों को काफी परेशानी हो गई। लिंग्दोह समिति की सिफारिशों को लागू करने का अर्थ था 28 वर्ष से अधिक उम्र के छात्रों को चुनाव लड़ने की अनुमति न मिलना। फिर जिन छात्र नेताओं के खिलाफ आपराधिक मामलों की जांच लंबित थी, उन्हें भी चुनावी मैदान से दूर ही रहना पड़ता। इस निर्णय से निहित स्वार्थी तत्वों को शिकायत तो होनी ही थी। इन तत्वों की पहुंच काफी ऊंची थी और लखनऊ के अपराध जगत में इनकी तूती बोलती थी। कुलपति प्रो. सिंह को इनके गुर्गो ने जान से मारने तक की धमकी दे डाली। एक छात्र नेता ने तो मीडिया के कैमरों का सामना करते हुए उनके खिलाफ आग उगली और पूरे लखनऊ को जलाकर खाक कर देने की धमकी तक दे डाली। प्रो. सिंह ने ऐसे तत्वों को कॉलेज से हमेशा के लिए निकाल बाहर करने में देरी नहीं लगाई। उनके पास ऐसे 200 से अधिक छात्र नेताओं की सूची तैयार थी। इसी सूची ने प्रो. सिंह को यकीन दिलाया कि छात्रावासों में रहने वाले 38 हजार से अधिक विार्थियों का भविष्य संवारने के लिए मात्र 200 सफेदपोश अपराधियों से सख्ती बरतने में कोई बुराई नहीं है। उनके लिए बेहतरीन अकादमिक माहौल तैयार करने की जिम्मेदारी उन्होंने पूरी तरह से निभाई। जरूरत पड़ने पर विश्वविालय और उससे संबद्घ सात कॉलेजों की सभी अकादमिक गतिविधियां तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दी गईं। यहां तक कि विधि स्नातक की परीक्षा बिना रुकावट संचालित करने के लिए विश्वविालय परिसर को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया और परीक्षार्थियों ने इसका स्वागत भी किया। हालांकि छात्र नेताओं ने उन्हें परीक्षा देने से रोकने की कोशिश की लेकिन परीक्षार्थियों ने उनकी कोशिशें असफल कर दी। यह कुलपति के प्रयासों को विार्थियों का समर्थन था। 

बहरहाल, विश्वविालय में ऐसे शिक्षकों और शिक्षणेतर कर्मचारियों की कमी नहीं थी जो कुलपति के कदमों की निंदा करने में पेशतर रहा करते थे।

Wednesday, July 6, 2011

राष्ट्रीय एकता के प्रणेता


अंग्रेज भारत को आजादी न देने के लिए तरह-तरह की कुटिल चालें चल रहे थे, साजिशें रच रहे थे और फूट डालो, राज करो की नीति के अनुसार हिंदू-मुसलमानों तथा हिंदू सवर्णो-दलितों के बीच दरार पैदा कर रहे थे। पहले जिन्ना को भड़का कर हिंदू-मुसलमानों के बीच खाई खोदी और फिर स्वतंत्रता-संग्राम की मुख्यधारा को कमजोर न कर सकने पर कट्टर हिंदुओं और सदियों से सताए दलितों को सब्जबाग दिखाकर भड़काने की साजिश रची। यह राष्ट्रीय अस्मिता, एकता और अखंडता पर गहराते संकट की घड़ी थी। उच्चवर्गीय अभिजात्य श्रेष्ठता के दंभ को संभालना अपेक्षाकृत आसान था, वह भी हिंदुओं के सर्वाधिक सर्वमान्य नेता महामना मालवीय जैसे व्यक्ति के लिए। दूसरी तरफ दलितों का एक छोटा दिग्भ्रमित समूह अंग्रेजों की शह पर सामाजिक समरसता में बाधा पहुंचाने पर अड़ा था। दलितों के मतांतरण और अछूतिस्तान की मांग से राष्ट्रीय एकता और विदेशी दासता से देश की मुक्ति के महास्वप्न के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया था। महात्मा गांधी मानो इसके दूरगामी घातक दुष्परिणामों को देख रहे थे। वह राष्ट्रीय एकता और अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने और विदेशी दासता से मुक्ति की दृष्टि से स्वतंत्रता-संग्राम की मुख्यधारा को किसी भी कीमत पर बंटने नहीं देना चाहते थे। इस राष्ट्रघाती परिणाम से बेचैन गांधीजी ने सामाजिक समता की दिशा में रचनात्मक पहल की। इसी बेचैनी की कोख से बापू के अछूतोद्धार आंदोलन का जन्म हुआ। राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में बापू के परम विश्वासभाजन बापू जगजीवन राम की ऐतिहासिक भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक सिद्ध हुई। उन्होंने अपने राष्ट्रव्यापी दौरे में स्वतंत्रता की अलख जगाते हुए राष्ट्रविरोधी तत्वों को करारा जवाब दिया और कहा कि दलित हिंदू धर्म के अभिन्न अंग हैं और उन्हें उससे अलग नहीं किया जा सकता। धर्म कोई कपड़ा नहीं कि फट जाए, तो उसे बदल दिया जाए। यह हमारी आत्मा से जुड़ा है। हमारे संस्कारों में रचा-बसा है। इसमें रहते हुए हम सामाजिक गैर-बराबरी के खिलाफ पूरी शक्ति से लड़ेंगे और निश्चित रूप से जीतेंगे। यह हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। महात्मा गांधी के अछूतोद्धार आंदोलन के अभिन्न अंग स्वरूप भारत के तमाम प्रमुख मंदिरों में दलितों के प्रवेश का राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू हुआ। उनके आदेश के अनुसार तय हुआ कि बाबूजी काशी विश्वनाथ मंदिर में प्रवेश के लिए दलितों के एक बड़े जत्थे का नेतृत्व करेंगे और कमलापति त्रिपाठी सुरक्षित मंदिर-प्रवेश की व्यवस्था करेंगे। निश्चित कार्यक्रम के अनुसार अपने जत्थे के साथ बाबूजी मंदिर की गली में पहुंचे तो देखा कि संकरी गली में सवर्ण, विशेष रूप से महिलाएं अवरोधक बनकर लेटी हुई हैं। बाबूजी ने अपने जत्थे को रोक दिया और किसी तरह मंदिर के प्रवेश-द्वार तक पहुंचे। वहां लेटी महिला के चरणस्पर्श किए और कहा-नारी में संपूर्ण देवताओं का निवास है और फिर भगवान शिव तो अ‌र्द्धनारीश्वर हैं। वे तो मेरे आराध्य हैं। सच्चे भक्त की आवाज अवश्य सुनेंगे। अहिंसक प्रतिकार के कायल बाबूजी बिना कोई विरोध जताए शांत भाव से अपने जत्थे के साथ लौट आए। सवर्णो पर इसका बहुत अनुकूल प्रभाव पड़ा। उनका अहिंसक प्रतिकार निष्फल नहीं गया। आज काशी विश्वनाथ मंदिर का द्वार सबके लिए खुला है। उन्होंने कुशल नेतृत्व का परिचय देते हुए दिग्भ्रमित दलितों को स्वतंत्रता संग्राम की मुख्यधारा से जोड़कर देश की आजादी का मार्ग प्रशस्त किया। देश की आजादी, राष्ट्रीय एकता और अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने की दिशा में उनका महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अवदान सदा स्मरण किया जाएगा। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).