Monday, September 10, 2012

नहीं रहे स्वेत क्रांति के जनक वर्गीज कुरियन


किसानों के कल्याण और कृषि उत्पादन तथा देश के विकास में उनके योगदान को मापा नहीं जा सकता - प्रधानमंत्री
दूध की कमी वाले भारत को उन्होंने दुनिया का सर्वाधिक दु ग्ध उत्पादक दे श बनाने में महत्वपू र्ण योगदान दिया - राष्ट्रपति
आणंद, गुजरात (एजेंसी)। दूध की कमी से जूझने वाले देश से भारत को दुनिया का सर्वाधिक दुग्ध उत्पादक देश बनाने वाले ेत क्रांतिके जनक डा. वर्गीज कुरियन का पड़ोसी नाडियाड के मुलजीभाई पटेल यूरोलॉजिकल अस्पताल में संक्षिप्त बीमारी के बाद रविवार तड़के निधन हो गया। वह 90 साल के थे और उनके परिवार में पत्नी मॉली कुरियन और पुत्री निर्मला हैं। गुजरात कोआपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ) अधिकारियों ने बताया, ‘डा. कुरियन का शव आज तड़के चार बजे के करीब उनके आवास पर लाया गया और उसके बाद उसे आणंद में अमूल डेयरी के सरदार हॉल में रखा गया था। वहां लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। इसके बाद उनका दाह संस्कार आज शाम साढ़े चार कर दिया गया।कुरियन का आज तड़के सवा एक बजे निधन हुआ। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के संस्थापक अध्यक्ष कुरियन की अगुवाई में ऑपरेशन फ्लडकी शुरुआत की गई थी। इसने भारत को दुनिया का सर्वाधिक दुग्ध उत्पादक देश बना दिया। उन्हें अमूल डेयरी को घर-घर में लोकप्रिय बनाने का श्रेय जाता है। उनका पेशेवर जीवन सहकारिता के जरिए भारतीय किसानों के सशक्तीकरण को समर्पित था। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भारत में ेत क्रांति के जनक डा. वर्गीज कुरियन के निधन पर शोक जताया। मुखर्जी ने कुरियन की ऐसे व्यक्ति के रूप में सराहना की जिसने ेत क्रांति की शुरुआत की और कृषि, ग्रामीण विकास तथा डेयरी के क्षेत्र में जबर्दस्त योगदान दिया। उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी उनके निधन पर शोक जताया। भारतीय सहकारिता आंदोलन और डेयरी उद्योग का आदर्श बताते हुए सिंह ने कहा कि अपने लंबे और शानदार कैरियर में कुरियन ने सहकारी डेयरी विकास का आणंद मॉडल स्थापित किया, ेत क्रांति शुरू की और भारत में दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक बनाया। (विशेष सामग्री पेज 13)
राष्ट्रीय सहारा दिल्ली  संस्करण पेज 1, 10-09-2012 izsj.kk

Wednesday, December 28, 2011

जिन्होंने डायर पर दागी थीं गोलियां


आज भारत भ्रष्टाचार की बेडि़यों में जकड़ा कराह रहा है। बहुत हद तक हमारी इच्छाशक्ति कमजोर हो चली है कि जहां हम भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने में नाकाम हो रहे हैं, वहीं इसमें लिप्त अफसर और नेता देश और देश की जनता के साथ ऐसा अपराध करने में कोई गुरेज नहीं करते। ऐसे में देश के लिए अपनी जान गंवा देने वाले शहीद उधम सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों को याद करने की आवश्यकता है, जिन्होंने देश के हित के अलावा अपने जीवन में किसी दूसरी चीज को तरजीह नहीं दी। लेकिन आज हम उसी आजादी का संसद से लेकर सड़क तक मजाक बनता हुआ देख रहे हैं। आज यानी 26 दिसंबर को महान क्रांतिकारी शहीद उधम सिंह का जन्मदिन है, लेकिन हैरत की बात है कि इनके बलिदान की बहुत से लोगों को जानकारी तक नहीं है। 26 दिसंबर 1899 में संगरूर जिले के सुनाम गांव में जन्मे शहीद उधम सिंह को जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला लेने स्वरूप जनरल डायर को मार देने के लिए याद किया जाता है। शहीद उधम सिंह जलियांवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे। 13 अप्रैल 1919 को रोलट एक्ट के विरोध में अमृतसर में एक जनसभा का आयोजन किया गया था, उसी में उधम सिंह लोगों को पानी पिलाने का कार्य कर रहे थे। अचानक जनरल माइकल ओ डायर डायर ने पूरे बाग को घेरकर लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग का हुक्म दे दिया। अपनी आंखों के सामने सैकड़ों की संख्या में बेकसूर लोगों की जान जाते देख उधम सिंह ने जनरल डायर से बदला लेने की ठान ली। अपने मिशन को अंजाम देने के लिए उधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की। वर्ष 1934 में उधम सिंह लंदन पहुंचे और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवॉल्वर भी खरीद ली। भारत का यह वीर क्रांतिकारी डायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगा। उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940 में मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के कॉक्सटन हाल में बैठक थी, जहां डायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुंच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके। बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने डायर पर गोलियां दाग दीं। दो गोलियां डायर को लगीं, जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। गौर करने वाली बात यह भी है कि जनरल डायर गोलियां मारने के बाद उधम सिंह भागे नहीं, बल्कि खुद को गिरफ्तार करवाया। गिरफ्तारी के बाद उन्होंने कहा था, मेरी उससे (जनरल डायर से) शत्रुता थी, इसलिए मैंने उसे मारा। वह इसी लायक था। मैंने ऐसा किसी संस्था या किसी अन्य के कहने पर नहीं किया, बल्कि यह मेरा अपना फैसला था। बहरहाल, उधम सिंह पर मुकदमा चला और 31 जुलाई 1940 को उन्हें हत्या का दोषी ठहराकर पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई। शहीद उधम सिंह के जीवन पर अगर हम नजर डालें तो वह भी बहुत कठिनाइयों भरा रहा। उधम सिंह ने सात साल की उम्र के होने से पहले ही अपने माता-पिता दोनों को खो दिया था। उनकी और उनके भाई की परवरिश अमृतसर के एक यतीमखाने में हुई। उधम सिंह के बचपन का नाम शेर सिंह था। अनाथालय में उनका नाम उधम सिंह हो गया। वर्ष 1917 में उधम सिंह के भाई का भी स्वर्गवास हो गया और 1919 में उधम सिंह क्रांतिकारियों के संपर्क में आए और उन्हीं के साथ हो लिए। वह सरदार भगत सिंह से बहुत प्रभावित थे। जाहिर तौर पर ऐसे वीर क्रांतिकारी पुरुष को जीवन में तो कठिनाइयों और दुखों का सामना करना पड़ा ही, लेकिन हार न मानते हुए उन्होंने अपना जीवन देश के लिए समर्पित कर दिया। अगर आज की स्थिति से इन सभी वीर गाथाओं की तुलना की जाए तो खुद पर ही शर्मिदगी महसूस होने लगती है, क्योंकि जिस भारत का सपना देखकर इन महान वीरों ने अपनी जान दी थी, वह भारत तो दूर-दूर तक नजर नहीं आता। शहीद भगत सिंह ने भी कहा था कि आजादी लाने का हमारा मकसद यह कतई नहीं है कि भारत का शासन अंग्रेजों के हाथ से निकल कर चंद भारतीयों के हाथ में आ जाए, बल्कि देश को अन्याय, गरीबी जैसी तमाम बेडि़यों से मुक्त करवाना ही हमारा अंतिम लक्ष्य है। उधम सिंह ने उसी आजादी का सपना देखा और उसी की खातिर फांसी के फंदे को भी चूम लिया, लेकिन क्या हमने कभी उन सपनों को साकार करने में रत्ती भर भी योगदान दिया? योगदान देना तो दूर, हमने तो कभी उनके इस सपने को समझने की जरूरत भी नहीं समझी। जान देना और शारीरिक ताकत रखना तो दूर की बात है, आज के बहुत से युवाओं के जिम जाने का मकसद भी शारीरिक रूप से मजबूत होना नहीं, बल्कि अच्छा दिखना भर होता है। कामयाब होने के नाम पर खूब पैसा कमाना होता है। इसी तरह आज की ज्यादातर लड़कियों भी जिम इसलिए नहीं जातीं, बल्कि बल्कि उनका मकसद संदर काया पाना भर होता है। दरअसल, इसमें इनका भी कसूर नहीं है, क्योंकि हमने कभी इनके सामने महापुरुषों के आदर्शो को ठीक ढंग से रखा ही नहीं। बल्कि आगे बढ़ने के लिए कक्षा में पढ़ाए गए सबक को जिंदगी में लागू करना सिखाने के बजाय हमने बच्चों को हमेशा प्रथम आने पर जोर दिया। हमें हमारे अपने बच्चे के अलावा औरों का बच्चा अच्छा ही नहीं लगा। उसे जिंदगी के उतार-चढ़ाव कभी देखने नहीं दिए। बस, सब कुछ वहीं का वहीं लाकर दे दिया। यहां एक उदाहरण शहीद भगत सिंह की मां का लेना होगा, जिन्होंने अपने बेटे को हिम्मत दी और साहस दिया कि वह नेकी के रास्ते पर चले और अपने लिए न सही, औरों के लिए जिए। दुर्भाग्य से आज ऐसा जिगर बहुत ही कम अभिभावकों का रह गया है। यहां बात किसी के बेटे या बेटी की कुर्बानी देने की नहीं, बल्कि उनमें देशप्रेम और अच्छे संस्कार देने की है। शायद इसीलिए आज इन सभी वीर क्रांतिकारियों के मूल्य खत्म होते जा रहे हैं। एक भारतीय होने के नाते हमारा यह फर्ज बनता है कि हम जितना अपनी जिंदगी की जरूरतों से वास्ता रखते हैं, उतना ही इन शहीदों के जीवन से भी रखें। आज अगर हम अपनी मर्जी की जिंदगी जी रहे हैं तो यह इन अमर शहीदों की देन है। वास्तव में इन महापुरुषों के जीवन मूल्यों को समझते हुए हमें एक नए भारत का निर्माण करना होगा। अब यह हमारे हाथ में है कि हम उनकी दी हुई इस आजादी को बनाए रखें और आने वाली पीढ़ी को भी उनका संदेश पहुंचाएं। शहीद उधम सिंह के जन्मदिवस पर उन्हें शत-शत नमन। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Thursday, July 7, 2011

शिक्षाविद् वैज्ञानिक के शिखर

वर्ष 2005 के जनवरी में लखनऊ विश्वविालय के कुलपति का पदभार संभाले हुए प्रो. राम प्रकाश सिंह को मात्र पांच दिन ही हुए थे। अचानक एक छात्र नेता उनके कमरे में हथियारबंद होकर घुस आया। उसने कुलपति के साथ कुछ इस तरह से बातचीत की कि आईआईटी खड़गपुर से आए प्रो. सिंह को माहौल का अंदाजा लगाने में जरा भी कठिनाई नहीं हुई। वैसे भी उन्हें उस दौरान विश्वविालय परिसर के माहौल के बारे में जानकारी मिल चुकी थी। छात्र नेता के व्यवहार ने उनका यह संकल्प मजबूत बना दिया कि वे अपने कार्यकाल के दौरान शिक्षा के इस मंदिर की सूरत पूरी तरह से बदल देंगे। यहां उच्चतर अकादमिक गतिविधियों के लिए आदर्श माहौल होगा। यह संकल्प पूरा करने के लिए अपने तीन वर्षो के कार्यकाल में प्रो. सिंह न तो शासन की घुड़की से डरे, न प्रशासन के असहयोग से निराश हुए। जब उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया तो उन्हें अपना मिशन एक हद तक पूरा करने का संतोष था। विश्वविालय से छात्र नेताओं के नाम पर जड़ें फैलाए बैठे सफेदपोश गुंडों की सफाई लगभग हो चुकी थी और प्रो. सिंह पूरे लखनऊ और अकादमिक जगत की आंखों में हीरो बन चुके थे। 

प्रस्तुत है प्रो. सिंह के 71वें जन्मदिन पर राजकुमार भट्टाचार्य का विशेष लेख..1. डी. फिल की डिग्री के दौरान किए गए शोध कार्य के लिए वर्ष 1969 में अमेरिकी कृषि विभाग की तरफ से प्रशंसा प्रमाण पत्र। 

2.
बायोडिग्रेडेबल फ्लोक्यूलेंट्स फॉर इंडस्ट्रियल एफ्लुएंट ट्रीटमेंट विषय पर एसके रथ के साथ किए गए शोध कार्य को वर्ष 1995 में नेशनल सिंपोजियम ऑन रीसेंट एडवांसेज इन न्यू पॉलिमरिक मैटीरियल्स की तरफ से सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र का पुरस्कार।

3.
वर्ष 1996 में एमआरएसआई मेडल पुरस्कार से सम्मानित 

4.
बॉम्बे विश्वविालय की तरफ से वर्ष1996-97 का डॉ. मूलगी भाई शिवा भाई पटेल ट्रस्ट फेलोशिप।

5.
वर्ष 1997 में नेशनल अकादमी ऑफ साइन्सेज के फेलो बने। 

6.
वर्ष 1998 में डीएएडी शोध एवं अध्ययन पुरस्कार से नवाजे गए। 

7.
एडवांस्ट मैटीरियल्स पर वैश्विक मंच पॉलीकैर की वैज्ञानिक समिति के सदस्य बने।

8.
अकाउस्टिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया और अल्ट्रासोनिक्स सोसाइटी ऑफ इंडिया के फेलो बने।

9.
एनसी कर्मकार, बीएस शाी तथा आरपी सिंह के शोधपत्र डेवलपिंग बायोडिग्रेडेबल पॉलिमरिक फ्लोक्यूलेंट्स फॉर दी ट्रीटमेंट ऑफ कोल फाइन्स सस्पेन्शन्स को वर्ष 2000 में बायो/एनवायरनमेंटली डिग्रेडेबल पॉलीमर सोसाइटी की भारतीय इकाई द्वारा सर्वश्रेष्ठ शोधपत्र के पुरस्कार से नवाजा गया।

10.
वर्ष 2002 में अंतरराष्ट्रीय मैटीरियल्स शिक्षा परिषद की कार्यकारी समिति के सदस्य मनोनीत।

11.
वर्ष 2005 में पॉलीकैर द्वारा अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फ्लोरी पुरस्कार से सम्मानित।

12.
जापान की एक संस्था अंरराष्ट्रीय सामाजिक तथा सांस्कृतिक एवं उन्नयन की तरफ से वर्ष 2005 में जीवन भर की उपलब्धियों के लिए पुरस्कृत।अकादमिक उत्कृष्टता और उच्चतम स्तर की प्रशासनिक काबलियत उसी तरह एक साथ नहीं चलते जिस तरह एक जमाने में लक्ष्मी और सरस्वती का साथ नहीं होता था। फिर भी, जिस व्यक्ति का दिमाग स्टील का बना हो, वह खुद में दोनों क्षमताएं समान रूप से विकसित कर लेता है। लखनऊ विश्वविालय के पूर्व कुलपति रहे प्रो. राम प्रकाश सिंह इसके सबूत हैं। इन दिनों प्रोफेसर एमेरिटस के रूप में पुणे स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइन्स एजुकेशन एंड रिसर्च को अपनी सेवाएं दे रहे प्रो. सिंह को वर्ष 2005 से 2008 तक लखनऊ विश्वविालय के कुलपति के रूप में ऐसे तत्वों से सीधा जूझना पड़ा, जिनका सामना किसी आम आदमी के लिए बुरे सपने से कम नहीं होता है। इन तत्वों की दबंगई रोकना बहुत बड़ी चुनौती थी। प्रो. सिंह की सफलता ने इस विश्वविालय से गुम हो चुका अकादमिक माहौल लौटाकर लाने में मदद दी। यह अपने-आप में एक बड़ी उपलब्धि थी। छात्र राजनीति में घुस आए अपराधी तत्वों के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाले राज्य की राजनीति का सीधा मुकाबला करने के मायने क्या हैं यह तो कोई खुद प्रो. सिंह से ही पूछे। शिक्षा और विशेष तौर पर उच्चतर शिक्षा के प्रति पूरी तरह से समर्पित प्रो. सिंह ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। यह उनके अपने राज्य की शिक्षा व्यवस्था में सुधार का सवाल तो था ही, देश के सबसे बड़े आवासीय विश्वविालय की हालत में बेहतरी की बड़ी जिम्मेदारी भी थी। 6 जनवरी, 2005 में इस विश्वविालय के कुलपति के रूप में अपना कार्यभार संभालने के बाद पॉलीमर विज्ञान के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर चुके इस वरिष्ठ वैज्ञानिक ने एक वर्ष के अंदर कई बड़े परिवर्तन कर दिए। विश्वविालय परिसर से अवांछित तत्वों की सफाई के लिए उनके द्वारा उठाए गए कदमों की जिस समय पूरे देश में सराहना की जा रही थी, उसी समय विधानसभा में समूचे विपक्ष के साथ ही सरकार ने उनके साथ असहयोग करने की ठान ली। इस चुनौती से निपटने के लिए उन्होंने इतना काम कर दिखाया कि वर्ष2006 तक राष्ट्रीय मीडिया ने उन्हें वर्ष के 10 हीरो में से एक माना और मैन ऑफ यूपी-2006 के खिताब से नवाजा। अखिल भारतीय बुद्घिजीवी कॉन्फ्रेंस ने उन्हें यूपी रतन पुरस्कार दिया। यह सिलसिला आने वाले दो वर्षो तक जारी रहा। जहां मंजुनाथ षन्मुगम ट्रस्ट ने वर्ष 2007 में पहले मंजुनाथ पुरस्कार के लिए उनको नामित किया वहीं गॉडफ्रे फिलिप्स की तरफ से वर्ष 2008 में उन्हें माइंड ऑफ स्टील वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 

इस वर्ष 7 जुलाई को अपने जीवन के 70 साल पूरे करने जा रहे प्रो. सिंह से अक्सर यह सवाल पूछा जाता रहा है कि आखिर उन्होंने बतौर कुलपति कैसे निभाई अपनी यादगार सुधारपरक भूमिका, वह भी तमाम रुकावटों और शासन-प्रशासन के सहयोग के बगैर? लंबे कद-काठी वाले और चश्मा लगाए प्रभावशाली आवाज में बातें करने वाले प्रो. सिंह का जवाब यह होता है कि वे हमेशा जानते थे कि उनके निर्णय बिल्कुल सही थे। इन निर्णयों में से एक था विश्वविालय छात्र संघ के चुनाव करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जेएम लिंग्दोह समिति की सिफारिशों को लागू करना। इस फैसले से छात्र राजनीति के माध्यम से राज्य या राष्ट्र स्तर की राजनीति चमकाने में जुटे अवांछित तत्वों को काफी परेशानी हो गई। लिंग्दोह समिति की सिफारिशों को लागू करने का अर्थ था 28 वर्ष से अधिक उम्र के छात्रों को चुनाव लड़ने की अनुमति न मिलना। फिर जिन छात्र नेताओं के खिलाफ आपराधिक मामलों की जांच लंबित थी, उन्हें भी चुनावी मैदान से दूर ही रहना पड़ता। इस निर्णय से निहित स्वार्थी तत्वों को शिकायत तो होनी ही थी। इन तत्वों की पहुंच काफी ऊंची थी और लखनऊ के अपराध जगत में इनकी तूती बोलती थी। कुलपति प्रो. सिंह को इनके गुर्गो ने जान से मारने तक की धमकी दे डाली। एक छात्र नेता ने तो मीडिया के कैमरों का सामना करते हुए उनके खिलाफ आग उगली और पूरे लखनऊ को जलाकर खाक कर देने की धमकी तक दे डाली। प्रो. सिंह ने ऐसे तत्वों को कॉलेज से हमेशा के लिए निकाल बाहर करने में देरी नहीं लगाई। उनके पास ऐसे 200 से अधिक छात्र नेताओं की सूची तैयार थी। इसी सूची ने प्रो. सिंह को यकीन दिलाया कि छात्रावासों में रहने वाले 38 हजार से अधिक विार्थियों का भविष्य संवारने के लिए मात्र 200 सफेदपोश अपराधियों से सख्ती बरतने में कोई बुराई नहीं है। उनके लिए बेहतरीन अकादमिक माहौल तैयार करने की जिम्मेदारी उन्होंने पूरी तरह से निभाई। जरूरत पड़ने पर विश्वविालय और उससे संबद्घ सात कॉलेजों की सभी अकादमिक गतिविधियां तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दी गईं। यहां तक कि विधि स्नातक की परीक्षा बिना रुकावट संचालित करने के लिए विश्वविालय परिसर को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया और परीक्षार्थियों ने इसका स्वागत भी किया। हालांकि छात्र नेताओं ने उन्हें परीक्षा देने से रोकने की कोशिश की लेकिन परीक्षार्थियों ने उनकी कोशिशें असफल कर दी। यह कुलपति के प्रयासों को विार्थियों का समर्थन था। 

बहरहाल, विश्वविालय में ऐसे शिक्षकों और शिक्षणेतर कर्मचारियों की कमी नहीं थी जो कुलपति के कदमों की निंदा करने में पेशतर रहा करते थे।

Wednesday, July 6, 2011

राष्ट्रीय एकता के प्रणेता


अंग्रेज भारत को आजादी न देने के लिए तरह-तरह की कुटिल चालें चल रहे थे, साजिशें रच रहे थे और फूट डालो, राज करो की नीति के अनुसार हिंदू-मुसलमानों तथा हिंदू सवर्णो-दलितों के बीच दरार पैदा कर रहे थे। पहले जिन्ना को भड़का कर हिंदू-मुसलमानों के बीच खाई खोदी और फिर स्वतंत्रता-संग्राम की मुख्यधारा को कमजोर न कर सकने पर कट्टर हिंदुओं और सदियों से सताए दलितों को सब्जबाग दिखाकर भड़काने की साजिश रची। यह राष्ट्रीय अस्मिता, एकता और अखंडता पर गहराते संकट की घड़ी थी। उच्चवर्गीय अभिजात्य श्रेष्ठता के दंभ को संभालना अपेक्षाकृत आसान था, वह भी हिंदुओं के सर्वाधिक सर्वमान्य नेता महामना मालवीय जैसे व्यक्ति के लिए। दूसरी तरफ दलितों का एक छोटा दिग्भ्रमित समूह अंग्रेजों की शह पर सामाजिक समरसता में बाधा पहुंचाने पर अड़ा था। दलितों के मतांतरण और अछूतिस्तान की मांग से राष्ट्रीय एकता और विदेशी दासता से देश की मुक्ति के महास्वप्न के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया था। महात्मा गांधी मानो इसके दूरगामी घातक दुष्परिणामों को देख रहे थे। वह राष्ट्रीय एकता और अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने और विदेशी दासता से मुक्ति की दृष्टि से स्वतंत्रता-संग्राम की मुख्यधारा को किसी भी कीमत पर बंटने नहीं देना चाहते थे। इस राष्ट्रघाती परिणाम से बेचैन गांधीजी ने सामाजिक समता की दिशा में रचनात्मक पहल की। इसी बेचैनी की कोख से बापू के अछूतोद्धार आंदोलन का जन्म हुआ। राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में बापू के परम विश्वासभाजन बापू जगजीवन राम की ऐतिहासिक भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक सिद्ध हुई। उन्होंने अपने राष्ट्रव्यापी दौरे में स्वतंत्रता की अलख जगाते हुए राष्ट्रविरोधी तत्वों को करारा जवाब दिया और कहा कि दलित हिंदू धर्म के अभिन्न अंग हैं और उन्हें उससे अलग नहीं किया जा सकता। धर्म कोई कपड़ा नहीं कि फट जाए, तो उसे बदल दिया जाए। यह हमारी आत्मा से जुड़ा है। हमारे संस्कारों में रचा-बसा है। इसमें रहते हुए हम सामाजिक गैर-बराबरी के खिलाफ पूरी शक्ति से लड़ेंगे और निश्चित रूप से जीतेंगे। यह हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। महात्मा गांधी के अछूतोद्धार आंदोलन के अभिन्न अंग स्वरूप भारत के तमाम प्रमुख मंदिरों में दलितों के प्रवेश का राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू हुआ। उनके आदेश के अनुसार तय हुआ कि बाबूजी काशी विश्वनाथ मंदिर में प्रवेश के लिए दलितों के एक बड़े जत्थे का नेतृत्व करेंगे और कमलापति त्रिपाठी सुरक्षित मंदिर-प्रवेश की व्यवस्था करेंगे। निश्चित कार्यक्रम के अनुसार अपने जत्थे के साथ बाबूजी मंदिर की गली में पहुंचे तो देखा कि संकरी गली में सवर्ण, विशेष रूप से महिलाएं अवरोधक बनकर लेटी हुई हैं। बाबूजी ने अपने जत्थे को रोक दिया और किसी तरह मंदिर के प्रवेश-द्वार तक पहुंचे। वहां लेटी महिला के चरणस्पर्श किए और कहा-नारी में संपूर्ण देवताओं का निवास है और फिर भगवान शिव तो अ‌र्द्धनारीश्वर हैं। वे तो मेरे आराध्य हैं। सच्चे भक्त की आवाज अवश्य सुनेंगे। अहिंसक प्रतिकार के कायल बाबूजी बिना कोई विरोध जताए शांत भाव से अपने जत्थे के साथ लौट आए। सवर्णो पर इसका बहुत अनुकूल प्रभाव पड़ा। उनका अहिंसक प्रतिकार निष्फल नहीं गया। आज काशी विश्वनाथ मंदिर का द्वार सबके लिए खुला है। उन्होंने कुशल नेतृत्व का परिचय देते हुए दिग्भ्रमित दलितों को स्वतंत्रता संग्राम की मुख्यधारा से जोड़कर देश की आजादी का मार्ग प्रशस्त किया। देश की आजादी, राष्ट्रीय एकता और अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने की दिशा में उनका महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अवदान सदा स्मरण किया जाएगा। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).

Wednesday, June 29, 2011

समर्पण की मिसाल


घर, मोहल्ला, जिला, प्रदेश, देश व समाज ने मुझे क्या दिया, ऐसी बातें कर अपना दुखड़ा सुनाने वाले तो करोड़ों में मिल जाएंगे, लेकिन ऐसे गिनती के ही लोग हैं, जो लेने का नहीं, बल्कि देने का भाव रखते हैं। ऐसे ही एक व्यक्तित्व 90 वर्षीय ब्रजनंदन प्रसाद डंगवाल हैं, जो अपने आप में एक मिसाल बन गए हैं। उम्र के इस पड़ाव में उन्होंने जीवनभर की कमाई से जोड़ी गई सम्पत्ति को बेचकर 51 लाख रूपये की धनराशि दून विश्वविद्यालय को इस उद्देश्य से दान दी कि इसे निर्धन बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया जाएगा। इसके लिए उन्होंने अपना मकान तक बेच दिया। उनके मन में गरीब बच्चों की पढ़ाई को लेकर जो दर्द रहा, उसके लिए वे जो कर सकते थे, वह कर दिखाया। उन्होंने जो किया, उससे लोगों को सीख भी लेनी चाहिए और प्रेरणा भी। तेजी से बदल रही सामाजिक मान्यताओं के बीच ब्रजनंदन का कार्य उम्मीद की किरण है। जनप्रतिनिधि सेवाभाव को लेकर नित नए बयान देते हैं, परंतु उन बयानों को कभी आचारण में उतारने का साहस नहीं दिखा पाते हैं। यदि उत्तराखंड में बुनियादी शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा की बात करें तो इसकी स्थिति संतोषजनक नहीं है। राज्य सरकार का लक्ष्य देहरादून को एजुकेशन हब बनाने का है लेकिन इसका एक पक्ष यह भी है कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत पब्लिक स्कूलों में गरीब बच्चों को प्रवेश नहीं मिल पाया। सरकार ने पब्लिक स्कूलों में प्रवेश तिथि निकल जाने के एक महीने बाद शासनादेश जारी करने की औपचारिकता पूरी की। राज्य के दूरस्थ व दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था पटरी से उतरती जा रही है। जिन स्कूलों में छात्र हैं, वहां शिक्षकों की कमी है और जहां शिक्षक हैं, वहां छात्र गिनती के भी नहीं हैं। इस तरह के वातावरण में निर्धन बच्चों को उच्च शिक्षा की परिधि में लाने के लिए ब्रजनंदन का समर्पण समाज के सक्षम लोगों के साथ ही सरकार के लिए भी एक प्रेरणा अथवा नसीहत है।