घर, मोहल्ला, जिला, प्रदेश, देश व समाज ने मुझे क्या दिया, ऐसी बातें कर अपना दुखड़ा सुनाने वाले तो करोड़ों में मिल जाएंगे, लेकिन ऐसे गिनती के ही लोग हैं, जो लेने का नहीं, बल्कि देने का भाव रखते हैं। ऐसे ही एक व्यक्तित्व 90 वर्षीय ब्रजनंदन प्रसाद डंगवाल हैं, जो अपने आप में एक मिसाल बन गए हैं। उम्र के इस पड़ाव में उन्होंने जीवनभर की कमाई से जोड़ी गई सम्पत्ति को बेचकर 51 लाख रूपये की धनराशि दून विश्वविद्यालय को इस उद्देश्य से दान दी कि इसे निर्धन बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया जाएगा। इसके लिए उन्होंने अपना मकान तक बेच दिया। उनके मन में गरीब बच्चों की पढ़ाई को लेकर जो दर्द रहा, उसके लिए वे जो कर सकते थे, वह कर दिखाया। उन्होंने जो किया, उससे लोगों को सीख भी लेनी चाहिए और प्रेरणा भी। तेजी से बदल रही सामाजिक मान्यताओं के बीच ब्रजनंदन का कार्य उम्मीद की किरण है। जनप्रतिनिधि सेवाभाव को लेकर नित नए बयान देते हैं, परंतु उन बयानों को कभी आचारण में उतारने का साहस नहीं दिखा पाते हैं। यदि उत्तराखंड में बुनियादी शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा की बात करें तो इसकी स्थिति संतोषजनक नहीं है। राज्य सरकार का लक्ष्य देहरादून को एजुकेशन हब बनाने का है लेकिन इसका एक पक्ष यह भी है कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत पब्लिक स्कूलों में गरीब बच्चों को प्रवेश नहीं मिल पाया। सरकार ने पब्लिक स्कूलों में प्रवेश तिथि निकल जाने के एक महीने बाद शासनादेश जारी करने की औपचारिकता पूरी की। राज्य के दूरस्थ व दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था पटरी से उतरती जा रही है। जिन स्कूलों में छात्र हैं, वहां शिक्षकों की कमी है और जहां शिक्षक हैं, वहां छात्र गिनती के भी नहीं हैं। इस तरह के वातावरण में निर्धन बच्चों को उच्च शिक्षा की परिधि में लाने के लिए ब्रजनंदन का समर्पण समाज के सक्षम लोगों के साथ ही सरकार के लिए भी एक प्रेरणा अथवा नसीहत है।
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