दूसरी महालड़ाई के दौरान, जब लंदन और पेरिस पर बमों की बारिश हो रही थी और हिटलर के जुल्मों को रोकना बेहद मुश्किल लग रहा था, तब महात्मा गांधी ने एक असाधारण सलाह दी थी। इस सलाह के लिए देश-विदेश में गांधीजी की कठोर आलोचना हुई थी और उनकी बात को बिल्कुल हवाई करार दिया गया था। जिस तरह के वातावरण में हमारा जन्म और परवरिश हुई है, उसमें गांधीजी की बहुत-सी बातें हवाई ही लगती हैं। लेकिन कोई बात हवाई है या उसमें कु छ दम है, इसका इम्तिहान तो परीक्षण के दौरान ही हो सकता है। गांधीजी की सलाह पर अमल किया जाता, तो यह सामने आ सकता था कि प्रतिकार का एक अहिंसक रूप भी हो सकता है और इससे भी बड़ी बात यह कि वह सफल भी हो सकता है। महात्मा गांधी द्वारा ‘टू एव्री ब्रिटन’ के शीर्षक से लिखा गया यह संबोधन एक अनन्य ऐतिहासिक दस्तावेज है। फासिस्ट हिटलर की जुल्मी सेना ने यूरोप पर जो जुल्म ढाया था, उससे दुनिया भर के लोग चिंतित थे। साफ था कि अगर हिटलर की जीत हो गई, तो पूरी सभ्यता ही खतरे में पड़ जाएगी। इससे गांधी भी उद्विग्न थे। कांग्रेस के उनके साथियों का मानना था कि इस घड़ी हमें ब्रिटिश सरकार का साथ देना चाहिए। पंडित नेहरू इस मत के अगुआ थे लेकिन गांधीजी अपनी जिद पर अड़े रहे कि एक गुलाम देश के रूप में नहीं, स्वतंत्र देश के रूप में ही हम ब्रिटेन का साथ दे सकते हैं। अगर ब्रिटिश सरकार हमारा समर्थन और सहयोग चाहती है, तो उसे सबसे पहले हमें आजाद करना होगा। गांधीजी का तर्क जायज था, पर राजकिशोर परत दर परत दूसरे नेताओं को, खासकर कम्युनिस्टों को लगता था कि यह फालतू अडंगेबाजी है। लेकिन कांग्रेस ने गांधीजी की ही राह पर चलने का निर्णय किया क्योंकि उनके बिना कांग्रेस थी ही क्या? गांधीजी को यह चिंता भी थी कि कहीं उन्हें फासीवाद का समर्थक न मान लिया जाए। इसलिए उनकी ओर से यह सुझाव आना लाजिमी था कि हिटलर के जुल्म का प्रतिकार कैसे किया जाए। गांधीजी के पास अहिंसा को छोड़ कर कोई और हथियार नहीं था। अहिंसा का प्रयोग वे विवरण पढ़ने को मिला, जिससे इस नीति की सफलता का ठोस प्रमाण मिलता है। गांधीजी के जन्म के बहुत पहले राजस्थान के बिश्नोई अहिंसक प्रतिकार का यह प्रयोग कर चुके थे और उन्हें सफलता भी मिली थी। बिश्नोइयों के गुरु जांबेश्वर या जंबाजी ने अपने अनुयायियों के लिए 29 सिद्धांत बनाए थे, जिनमें से एक था हरा-भरा पेड़ न काटना। यह घटना सन् 1730 की है। जोधपुर के राजा को अपना महल बनवाने के लिए चूने की जरूरत थी। चूने की भट्टियों के लिए काफी मात्रा में लकड़ी चाहिए थी। भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में कर ही रहे थे। हजारों लोग निहत्थे हो कर सरकारी नीतियों का विरोध करते थे। पुलिस उन पर डंडे या गोली चलाती, तब भी वे अपनी जगह से नहीं हटते थे और सारी तकलीफ शांतिपूर्वक सहते थे। इसी नीति को गांधीजी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आजमाने की सोची। उन्होंने प्रत्येक ब्रिटन को यह सलाह दी कि हिटलर के प्रतिकार का मानव दीवार बना कर उसका निहत्थे सामना किया जाए। गांधी जी का विश्वास था कि आखिरकार जुल्मी का दिल पसीजेगा ही और वह जुल्म ढाना बंद कर देगा। क्या यह नीति सफल हो सकती है? अभी तक तो ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता। पर यह हमारा अज्ञान है। हाल ही में एक ऐसा इसके लिए राजा ने लकड़हारों को खेजलड़ी गांव भेजा, जहां खेजड़ी के पेड़ बहुतायत में थे। लेकिन गांव के लोगों ने लकड़हारों को पेड़ काटने से रोक दिया। क्रुद्ध राजा ने एक सैनिक टुकड़ी भेजी लेकिन गांव वाले टस से मस नहीं हुए। नंगी तलवारें लिए सैनिकों से गांव के मुखिया ने हाथ जोड़ कर निवेदन किया कि आप लोग लौट जाएं, हम खेजड़ी के हरे-भरे पेड़ नहीं काटने देंगे। यह देख कर सेनापति गुस्से में आ गया। उसने सैनिकों को जबरदस्ती पेड़ काटने का हुक्म दिया। जवाब में गांव की महिलाएं, पुरु ष और बच्चे पेड़ों से चिपक कर खड़े हो गए। उनके चेहरों पर कोई तनाव नहीं था। न प्रतिकार का कोई भाव था। इससे सैनिकों का गुस्सा और बढ़ा। उन्होंने अंधाधुंध तलवार चलाना शुरू कर दिया। लेखक के अनुसार, ‘सबसे पहले अमृताबाई तलवार से कट मरी। इसके बाद पड़ोस के 84 गांवों से आए लोगों ने अपना बलिदान दिया। 69 महिलाओं और 294 पुरु षों ने बलिदान दिया। कु ल 363 ग्रामीणों को मार कर सैनिकों की तलवारें रुक गई। कैसे चलाए कोई तलवार निहत्थों पर? सैनिक आत्मग्लानि से भर गए। जोधपुर नरेश के पास जा कर सारी घटना बतलाई। नरेश बहुत दुखी हुए। वे खेजलड़ी गांव पहुंचे। धरती पर लेट कर उन्होंने ग्रामवासियों से क्षमा मांगी।’
तो यह है अहिंसा का प्रताप। इस प्रताप के भरोसे ही महात्मा गांधी ने यूरोप को अहिंसक प्रतिकार की सलाह दी थी। इस रास्ते पर चलते हुए पता नहीं कितने लोगों को जान की कुर्बानी देनी पड़ती (वैसे भी कम लोग नहीं मरे), लेकिन इससे सभ्यता का एक कदम आगे बढ़ता। जब यह साबित हो जाता कि अहिंसा हिंसा से ज्यादा कारगर है, तो हमारे समय में हिंसा की जिस संस्कृति का विकास हो रहा है, वह संभव न हो पाता। हिटलर इसीलिए पराजित हुआ क्योंकि उसकी हिंसा पर उसके विरोधियों की हिंसा भारी पड़ी। इस जीत के उन्माद में ही, अमेरिका ने हिटलर के सहयोगी देश जापान पर परमाणु बम गिराए, क्योंकि जापान आत्मसमर्पण नहीं कर रहा था। परमाणु बम से होने वाले भयावह विध्वंस की विरासत आज भी समूची मानवता का पीछा कर रही है। उन दिनों सिर्फ अमेरिका के पास परमाणु बम था, आज लगभग एक दर्जन देशों के पास यह बम बनाने की टेक्नोलॉजी है। हाल ही में ट्यूनीशिया, यमन, मिस्र आदि अरब देशों में अहिंसक विद्रोह से गांधीजी के सत्याग्रह की सफलता का आश्वासन मिलता है।
क्या इस सबसे हम भारतीय कु छ सीख सकते हैं?
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