बिहार के औरंगाबाद में नक्सलियों के खिलाफ पुलिस गांधीगीरी पर उतर आई है। नक्सल प्रभावित इलाकों में पुलिस द्वारा एक रणनीति के तहत ग्रामीणों को सामूहिक भोज कराया जा रहा है। पुलिस को इसका फायदा मिलता दिख रहा है और ग्रामीण उसके साथ जुड़ते जा रहे हैं। नक्सलवाद के सफाए के लिए उसने एक अनूठे प्रयोग की शुरुआत की है। पुलिस की यह मुहिम घोर नक्सल प्रभावित टंडवा थाने के बेला गांव से शनिवार को शुरू हुई। इसके तहत इलाके में पुलिस ग्रामीणों को न सिर्फ सामूहिक भोज करा रही है बल्कि उनके दुख-दर्द भी सुन रही है। गांवों में ढोल बजा उत्सव का माहौल कायम कर वह ग्रामीणों का इस सुधार आंदोलन में साथ देने का आह्वान कर रही है। लाल आतंक से सहमे ग्रामीणों ने जब टंडवा में आयोजित भोज में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया तो पुलिस का हौसला बढ़ा। रविवार को ढिबरा थाना क्षेत्र के तेंदुई गांव में भी ग्रामीणों को सामूहिक भोज कराया गया। जब यहां भी ग्रामीणों ने काफी संख्या में हिस्सा लिया तो एसपी विवेकराज सिंह ने जिले के सभी नक्सल प्रभावित थाना क्षेत्रों में ऐसे आयोजन कराने की योजना बनाई। इस बाबत थानाध्यक्षों को निर्देश दिया गया है। एसपी ने कहा कि ग्रामीण लाचारी में नक्सलियों का साथ देते हैं। अगर पुलिस का नमक खाएंगे, तो नक्सल क्षेत्रों के ग्रामीण अवश्य उसके मददगार बनेंगे। सामुदायिक पुलिसिंग योजना के तहत ग्रामीणों के शादी-विवाह में पुलिस मदद कर रही है। बर्तन के साथ-साथ नि:शुल्क टेंट उपलब्ध कराती है। मगध रेंज के डीआईजी जितेंद्र कुमार कहते हैं कि इस बदलाव में कड़ी बनी राज्य सरकार की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। सामूहिक भोज का यह प्रयोग माओवाद की उठती लपटों को अवश्य कम करेगा।
Friday, January 28, 2011
Sunday, January 23, 2011
इंद्रावती का नाम सुनते ही डर जाते हैं अफसर
गोरखपुर। सचमुच, इंद्रावती के हौसले का जवाब नहीं है। अफसरों से लड़ते भिड़ते 80 महिलाओं का जॉब कार्ड और उन्हें नियमित काम दिलाकर इस अनपढ़ महिला ने नारी सशक्तिकरण की अनूठी मिसाल पेश की है। अब हाल यह है कि इंद्रावती का नाम सुनते ही अफसर कांप उठते हैं। डरते हैं कि कहीं फिर शासन से जांच न बैठ जाए। मनरेगा के स्टेट हेल्पलाइन को उसने प्रशासनिक कामकाज के खिलाफ बतौर हथियार इस्तेमाल किया है।
आप सोच रहे होंगे कि इंद्रावती कोई वीआईपी महिला है। जी नहीं, वह कैंपियरगंज के कुंजलगढ़ गांव की ऐसी गरीब महिला है जिसने स्कूल का मुंह तक नहीं देखा। लेकिन उसके इरादे चट्टान की तरह मजबूत हैं। क्षेत्र की महिलाएं उसे मुखिया कहकर पुकारती हैं और उसकी आवाज पर महिलाओं की फौज खड़ी हो जाती है। इंद्रावती के काम कराने का तरीका बिलकुल अलग है। यदि किसी का जॉब कार्ड नहीं बन रहा है तो वह स्टेट लेवल हेल्प लाइन पर फोन करती हैं। किसी भी तरह की दिक्कत को वह हेल्प लाइन के जरिए शासन तक पहुंचा देती हैं। इसके बाद लोकल स्तर पर अफसरों के पास पैरवी शुरू कर देती है। शासन के अलंबरदार भी उसकी बात को नजरअंदाज नहीं करते हैं। यही कारण है कि उसके गांव में तमाम गड़बड़ियां दूर हो गई हैं।
इंद्रावती को दूसरे के लिए लड़ने में हिचक नहीं होती। वह कहती हैं कि तीन साल पहले अपना जॉब कार्ड बनवाने के लिए जब गांव के प्रधान के पास गई तो उन्होंने डांट कर भाग दिया। बोले महिलाओं का जॉब कार्ड नहीं बनता है। एक गोष्ठी में इंद्रावती भाग लेने तहसील गई तो वहां लघु सीमांत किसान मोर्चा के लोगों ने मनरेगा के हेल्प लाइन का नंबर दिया और संपर्क करने को कहा। बस क्या था, इंद्रावती ने इस हेल्प लाइन को ऐसा हथियार बनाया कि प्रशासनिक अमले में हलचल मच गई। अफसरों ने प्रधान पर दबाव बनाया तो इंद्रावती का जॉब कार्ड बन गया। लेकिन इंद्रावती ने जॉब कार्ड लेने से मना कर दिया। उसने कहा कि पूरे गांव की महिलाओं का जॉब कार्ड बनना चाहिए। साल भर तक उसने ब्लाक से लेकर प्रधान और सेक्रेटरी से संपर्क किया। कोई फायदा नहीं हुआ तो फिर उसने हेल्प लाइन का सहारा लिया। हर सप्ताह वह हेल्प लाइन पर अपनी रिपोर्ट बताती रहीं। अधिकारियों को डांट मिली। सेक्रेटरी और प्रधान ने गांव की महिलाओं को बुलाकर जॉब कार्ड बनवाना शुरू किया।
अब इंद्रावती कहती हैं कि जॉब कार्ड तो बन गया है लेकिन अब सबको बराबर काम मिलना चाहिए। अगर काम नहीं मिलता है तो रोजगार भत्ता मिले। कहती हैं, कुछ भी हो हम लोग अपना हक लेकर रहेंगे। गांव की महिलाएं इस महिला से कदम मिलाकर चलती हैं।
Wednesday, January 19, 2011
पांच सौ बच्चों को पाल रहा कुंवारा बाप
परिस्थितियां कई बार इंसान को इस कदर तोड़ देती हैं कि वह खुदकुशी करने की सोचता है। कुछ विरले ही होते हैं, जो एक मिसाल बन जाते हैं। इसी का जीवंत उदाहरण हैं अंडमान पोर्ट ब्लेयर के खेल अधिकारी सुरेश कुमार चौधरी। हालात के हाथों अनाथ हुए चौधरी ने न सिर्फ अपनी मेहनत के बल पर उच्च सरकारी पद प्राप्त किया बल्कि हैरत अंगेज कारनामों की बदौलत गिनीज बुक के आजीवन सदस्य बने। इतना ही नहीं वह अविवाहित होते हुए भी पांच सौ बच्चों के पिता हैं। 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान त्रिपुरा के शांति बाजार निवासी सुरेश कुमार चौधरी का 22 सदस्यीय परिवार काल का ग्रास बन गया। दो भाइयों व एक बहन के सिवाय परिवार में कोई नहीं बचा। न कोई सहारा था और न ही कोई संभालने वाला, जैसे तैसे दो वर्ष पेड़ के नीचे बिता दिए। जिंदगी से तंग आकर एक दिन नदी में छलांग लगाकर आत्म हत्या का विचार किया, लेकिन भाग्य से रास्ते में राबर्ट पिंटों की योग व जिम्नास्टिक पर लिखी पुस्तक हाथ लग गई। इसी पुस्तक ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। पुस्तक से मिली प्रेरणा ने सुरेश कुमार चौधरी को न केवल उड़ीसा के कटक जिले में एसडीएम जैसे प्रशासनिक अधिकारी के पद तक पहुंचाया। इसके बाद उन्होंने अपना जीवन अनाथ बच्चों के नाम कर दिया। हैरतअंगेज कारनामे दिखा विश्व रिकार्ड बना चुके सुरेश कुमार चौधरी वर्तमान में पांच सौ बच्चों को गोद लेकर उनका लालन-पालन कर रहे हैं। सभी बच्चे अपने पिता का नाम एसके चौधरी ही दर्ज करवाते हैं। चौधरी का कहना है कि उनकी कोशिश है कि किसी को अनाथ होने के दर्द का अहसास न हो। चौधरी गिनीज बुक के आजीवन सदस्य हैं और तीन लाख रुपये बतौर इनाम सालाना पाते हैं। सुरेश कुमार चौधरी साल में दो माह अवकाश लेते हैं। इस दौरान अपने कारनामे दिखा देश-विदेश में जो राशि एकत्रित होती है, उससे गोद लिए बच्चों का लालन-पालन करते हैं। उन्होंने 1983 में मारीशस के तत्कालीन राष्ट्रपति शिव सागर गुलाम के सहयोग से शिकागो में लगातार 360 घंटे तक साइकिल चलाकर विश्व कीर्तिमान स्थापित किया। 26 जनवरी 1996 को तत्कालीन केंद्रीय मंत्री माधव राव सिंधियां के सहयोग से दिल्ली के हवाई अड्डे पर विश्व के सबसे भारी भरकम बोइंग 777 को सिर के बालों से खींचकर दूसरी बार गिनीज बुक में नाम दर्ज करवाया। 19 मार्च 1997 को ग्वालियर में खड़े डीजल इंजन को सिर के बालों से खींचा। नवंबर 1997 को बंगाल के बहरामपुर में 72 घंटे तक जल समाधि लेकर विश्व कीर्तिमान स्थापित किया।
Saturday, January 15, 2011
आंखों से नहीं हौसले से देखी उजली किरण
यूजीसी के जेआरएफ (जूनियर रिसर्च फेलोशिप) में चयनित दृष्टिहीन छात्रा इमराना को अब दुनिया को न देख पाने का कोई खास दुख नहीं होता। अब तक मिली कामयाबी ने सब कमियां पूरी कर दी हैं। खलिश तो इस बात की रहती है कि हाईस्कूल के बाद ब्रेल लिपि में पुस्तकें आसानी से नहीं मिलतीं। इसलिए इमराना ने खुद ही ब्रेल लिपि में अपने लिए नोट्स तैयार किए। अपनी किताबों की तरह अपनी तकदीर भी इमराना ने खुद ही लिखी। इमराना की ख्वाहिश है वह टीचर बनकर इल्म की रोशनी फैलाए।
चित्रकूट जिले के मऊ गांव में रहने वाले किसान शफीक अहमद की तीसरी बेटी इमराना जन्म से ही दृष्टिहीन है। तीन भाइयों में से तीसरे फहीम अहमद अजमेर में सरकारी स्कूल में टीचर हैं। बाकी के शमीम अहमद हाफिज हैं और वसीम अहमद की अपनी शॉप है। चार में से दो बहनों की शादी हो चुकी है। छोटी बहन शमा परवीन उन्हीं के साथ एएमयू में ही बीए कर रही है। इमराना कहती हैं, ‘उन्हें कुदरत के दिए अंधेरे मंजूर न थे। इसीलिए इल्म की रोशनी से जिंदगी के अंधेरे दूर करने की उन्होंने ठान ली। इसमें भाई और मां मोमिना सिद्दीकी ने बहुत मदद की।’
इमराना बताती हैं कि इस मुकाम तक आने में उनके प्राइमरी स्कूल के टीचर अबुल कलाम कासमी साहब और मो. हाशिम जी का बहुत बड़ा योगदान है। यहां एएमयू में सैयद अब्दुल वासे और नियाज अहमद ने भी बहुत मदद की। इन सभी ने जिंदगी में सकारात्मक तरीके से सोचने में बड़ी मदद की।
आईजी हॉल में रहने वाली इमराना का दूसरा शौक गायकी है। फ्रेंड्स की हौसला अफजाई ने उनकी गायिकी को और परवान चढ़ाया। 7 जून, 2009 को एएमयू के दीक्षांत समारोह में आए प्रख्यात संगीतकार एआर रहमान के साथ अपनी मुलाकात को भूल नहीं सकती। पार्श्व गायक मो. अजीज की बात भी इमराना को अच्छी तरह याद है। वह कहती हैं, ‘अजीज साहब ने कहा था कि मेहनत कीजिए। इंशा अल्लाह, कामयाबी जरूर मिलेगी।’
ग्रेजुएशन टाइम से ही एएमयू तराना टीम की सदस्य इमराना कहती हैं कि फिल्मों में प्लेबैक सिंगर के रूप में भी वह तकदीर आजमाना चाहेंगी।
आंखों की रोशनी इमराना ने भले ही खो दी हो, पर मन की रोशनी से उसने वह सबकुछ देखा, जिसे देखने की ख्वाहिश हर विद्यार्थी करता है। आखिरकार उसकी मेहनत रंग लाई और उसने यूजीसी के जेआरएफ एग्जाम को क्लियर कर लिया। टीचर बनने का उसका ख्वाब भी अब आसानी से पूरा हो सकेगा।
इमराना की कामयाबी का सफर
•18 जुलाई, 1992 को अलीगढ़ में एएमयू के अहमदी स्कूल ऑफ ब्लाइंड में एडमिशन।
•पहले एक वर्ष सिर्फ ब्रेल लिपि सीखी और बहुत जल्द ही महारत हासिल की।
•पहली क्लास प्रथम श्रेणी के साथ उत्तीर्ण की और तीसरी के बाद सीधे 5वीं कक्षा में प्रवेश लिया।
•6ठी कक्षा के लिए अब्दुल्ला कॉलेज में एंटे्रंस दिया और सफल रही।
•2003 में तबीयत खराब होने के बाद भी 10वीं की परीक्षा दी, द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण।
•2005 में फर्स्ट डिवीजन के साथ 12वीं की परीक्षा पास की। अब्दुल्ला गर्ल्स कॉलेज में प्रवेश।
•2008 में फर्स्ट डिवीजन के साथ ग्रेजुएट की परीक्षा भी पास की।
•2008 में एएमयू में हुए सिंगिंग कंपीटीशन सुर-2008 की चैंपियन बनी।
•2010 में उर्दू विषय के साथ एमए पूरा किया। साथ ही यूजीसी की जेआरएफ में भी चयन हुआ।
Thursday, January 13, 2011
चंद रुपयों से खड़ी कर दी करोड़ों की कंपनी
उस समय मेरे पास सिर्फ 14 हजार रुपये थे। ये मैंने गर्मी की छुट्टियों में पार्ट टाइम नौकरी कर बचाए थे। इसके अलावा दो कंप्यूटर थे, जो किराए पर लिए थे। यकीन नहीं होता, इस पूंजी से करीब दस साल के भीतर देश की सबसे बड़ी डिजिटल मीडिया कंपनी खड़ी हो गई। सफलता की अपनी कहानी बयां करते हुए मैग्नॉन सॉल्यूशंस के संस्थापक व सीओओ विनीत वाजपेयी फूले नहीं समाते हैं। महज 33 साल के इस युवा की कहानी जल्द ही लोगों के सामने होगी। विनीत अपने जीवन के सभी संघर्षो व अनुभवों को किताब द स्ट्रीट टू द हाईवे में पिरोने जा रहे हैं। वाजपेयी ने बताया कि जब उन्होंने कारोबार शुरू किया था, तब यह बताने वाला कोई नहीं था कि क्या सही है और क्या गलत। काम करते-करते सब सीखा। कई बार ऐसी गलतियां भी हुई, जिनसे झटका लगा। यह किताब उन लोगों के लिए है, जो कारोबार में सफलता का सपना देखते हैं। विनीत ने 22 साल के कॉलेज से निकले छात्र के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी। आज की तारीख में मैग्नॉन सॉल्यूशंस के ग्राहकों में कई बड़ी भारतीय कंपनियां शुमार हैं। इनमें भारती एयरटेल, महिंद्रा एंड महिंद्रा, एचसीएल, मारुति और टीसीएस भी शामिल हैं। दुनिया भर के 14 देशों में उसके ग्राहकों में 600 से अधिक कंपनियां हैं। इस कंपनी की शुरुआत दो कंप्यूटर के साथ एक छोटे से जेनरेटर रूम से हुई थी जो एक बिल्डिंग के टॉप फ्लोर पर स्थित था। आज इस कंपनी में 150 कर्मचारी हैं और दिल्ली के अलावा मुंबई में भी इसका ऑफिस है। साथ ही विनीत लंदन में भी एक ऑफिस बनाने की प्रक्रिया में हैं।
Sunday, January 9, 2011
हरियाणा के किसान ने ढूंढ़ा गणित का नया फार्मूला
कैथल गणित के सवालों पर भले ही बड़े-बड़ों के माथे पर सिलवटें पड़ने लगती हों, परंतु सौंगल गांव निवासी सातवीं पास किसान लक्ष्मन सिंह ने गुणा करने का नया फार्मूला इजाद कर सबको चौंका दिया है। इसके आधार पर गणित के कई पेचीदा सवालों को आसानी से हल किया जा सकता है। लछमन सिंह ने गत दिवस राजकीय इंटर कालेज के विद्यार्थियों के सवालों को ब्लैक बोर्ड पर हल किया तो स्कूल के अध्यापक भी दंग रह गए। लछमन ने बताया कि वह गरीबी के कारण सातवीं कक्षा से आगे नहीं पढ़ सके, लेकिन गणित विषय में उसकी रुचि शुरुआत से ही रही है। इसके चलते उसने फार्मूला तैयार किया है जिससे गणित के मुश्किल से मुश्किल सवाल का हल निकाला जा सकता है। सिंह ने दावा किया कि उनके फार्मूले से एक तो विद्यार्थियों को सवाल निकालने में आसानी होगी दूसरा समय भी कम लगेगा। अमूमन लंबी गणना के कारण या तो विद्यार्थी सवाल ही छोड़ देते है या फिर सवाल गलत हो जाता है। यह है फार्मूला लछमन ने बताया कि अपने फार्मूले से तैयार की गई गणना के बाद संख्याओं में से एक को गणना के परिणाम से भाग देकर जांच की तो दूसरी संख्या उसके भागफल में आ गई। उसकी गणना की तो फार्मूला पूरी तरह से सिद्ध हो गया। बकौल लक्षमन सिंह गणित एक ऐसी विद्या है, जिसमें परिणाम सही पाए जाने के बाद और कोई सबूत देने की जरूरत नहीं होती। यदि छात्र-छात्राएं उसके फार्मूले के तहत सवालों का हल करते हैं, तो उनके लिए बहुत ही सरलता होगी। इस फार्मूले के तहत बड़ी संख्या का गुणा चंद मिनटों में किया जा सकता है। मात्र 9 तक के पहाड़ों से विद्यार्थी बड़ी से बड़ी संख्या को हल कर सकता है। इसमें छात्रों को हासिल लगाने के झंझट से मुक्ति मिल जाती है। बारहवीं के छात्रों गौरव, कपिल, मनोज, प्रदीप और राहुल ने कहा, लछमन के तरीके से सवाल उन्हें आसानी से समझ आ गये हैं। नए फार्मूले के चलते उन्हें सवाल को निकालने में बहुत आसानी होगी और समय भी कम लगेगा। विद्यार्थियों को होगी आसानी गुलाटी राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में गणित विषय के अध्यापक विनय गुलाटी ने बताया कि उन्होंने लछमन के फार्मूले की जांच की है। हिसाब के सवालों में यह काफी काम आ सकता है। साथ ही विद्यार्थियों को सवालों का हल निकालने में आसानी होगी।
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