Tuesday, January 4, 2011

मेहनतकशों ने बदल डाला जिंदगी के सांचे को

लखनऊ, उन्होंने किसी प्रबंध संस्थान से डिग्री नहीं ली है। उनमें से अधिकांश तो स्कूल भी नहीं गईं। बावजूद इसके आप उन्हें सफल व्यवसायी कह सकते हैं। उनके द्वारा बनायी गईं अगरबत्तियों की खुशबू राजधानी के आसपास के जिलों में भी फैलने लगी है। कुछ लोग विपत्तियों के आगे घुटने टेक देते हैं और कुछ लोग मुश्किलों से जूझते हुए हालात को अपने अनुकूल बना लेते हैं। ऐसे ही चंद लोगों में से एक हैं सुनीता वाजपेयी। पति किसान ह
। खेती ही गुजारे का सहारा। अक्सर बाढ़ के कारण दो जून की रोटी मुश्किल हो जाती। सीमैप की टीम पहुंची स्वयं सहायता समूह की रोशनी लेकर। सुनीता ने तय किया कि वह खुद भी स्वावलंबी बनेंगी और अन्य महिलाओं को भी प्रेरित करेंगी। मेहनत रंग लाई। सुनीता के नेतृत्व में 15 महिलाओं का समूह अगरबत्ती बनाने के उद्योग जुड़ा है। समूह में 25 वर्ष की महिला सदस्य भी हैं तो 65 वर्ष की मधुरानी भी। अब सभी आत्मनिर्भर हैं और परिवार का बराबर से सहयोग कर रही हैं। सुनीता के जैसी कहानी बाराबंकी के गांव पवइयाबाद निवासी गीता की है। गीता का परिवार भी खेती पर निर्भर है। आर्थिक तंगी से छुटकारा पाना है। इसी संकल्प के साथ गीता ने 14 महिलाओं को अपने साथ जोड़ा। गुलाबजल बनाना और उसे बेचना शुरू किया।


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