Saturday, January 1, 2011

बाण से गरीबी का वध करने की चाहत

अजय का तीरदांजी में कोई आदर्श खिलाड़ी नहीं है, क्योंकि वह इस खेल के किसी खिलाड़ी को जानता तक नहीं है, लेकिन उसकी मंशा है कि वह इस खेल में शानदार प्रदर्शन कर एशियाड और ओलंपिक पदक जीते और अपने परिवार की गरीबी को दूर करे। इसके लिए वह मेहनत करने के लिए तैयार है। 33वीं जूनियर राष्ट्रीय तीरदांजी चैंपियनशिप में रजत पदक जीतने वाला अजय कुमार बेहद गरीब परिवार से है और उसके पिता रोज फेरी लगाकर सब्जी बेचते हैं। गरीबी और तमाम मुश्किलों के बावजूद अजय ने गुरुवार को यह कारनामा कर दिखाया। उसके पास महंगा धनुष और उपकरण खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, लेकिन एक दोस्त से उधार लिए धनुष-बाण ने उसको पदक दिला दिया। सरकारी स्कूल मॉडल टाउन नंबर एक की दसवीं कक्षा में पढ़ने वाला अजय वजीरपुर की झुग्गियों में रहता है। उसके पिता रोज सब्जी की फेरी लगाते हैं। वह अपने छह भाई बहनों में दूसरे नंबर का है। तीन वर्ष पहले उसने अपने स्कूल के स्पो‌र्ट्स टीचर रामकुमार सहरावत के कहने पर तीरदांजी में हाथ आजमाने शुरू किए थे। उसके स्कूल के कई छात्र राष्ट्रीय स्कूली खेलों में इस स्पर्धा का स्वर्ण जीत चुके हैं। उसने बताया कि इस खेल के शौक को पूरा करने के लिए उसको एक अच्छे धनुष की जरूरत थी। जब उसका चयन राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए दिल्ली टीम में हुआ तो उसने धनुष-बाण देने के लिए अपने दोस्त हरीश से अनुरोध किया। हरीश ने उसको धनुष दिया, उसी के धनुष से वह रिकर्व स्पर्धा के फाइनल में राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक विजेता मुकेश तमंग को चुनौती देने उतरा। उसने बताया कि जब वह स्वर्ण पदक के लिए तमंग के साथ खड़ा था, तब तक उसको यह कतई नहीं मालूम था कि उसका मुकाबला किसके साथ है। हां, जीतने के बाद उसके कोच रामकुमार सहरावत ने बताया कि उसने तो कमाल कर दिया। अब वह अपने इस खेल को जारी रखने के लिए तीरदांजी महासंघ और दिल्ली एसोसिएशन से जरूरी सामान की उम्मीद लगाए हुए है। उसकी इस सफलता पर दिल्ली एसोसिएशन के अध्यक्ष विरेंद्र सचदेवा ने जल्द ही उसको तीरदांजी की सुविधाएं देने का आश्वासन दिया है। यही नहीं दिल्ली के अब तक के इतिहास में अजय ने पहली बार जूनियर स्तर पर कोई पदक जीता है।

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