Monday, April 25, 2011
Thursday, April 14, 2011
बाबा साहब ने दिया लोकतंत्र को बल
संविधान को लोकतंत्र की गीता कहा जाता है। भारत के संविधान के निर्माण में कई विधि विशेषज्ञों ने योगदान दिया जिसमें सर्वप्रमुख थे बाबा साहब अंबेडकर। उनके नेतृत्व में भारत के संविधान का निर्माण एक अतुलनीय उपलब्धि था जिस कारण उन्हें संविधानशिल्पी भी कहा जाता है। वह संविधान निर्माण की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। उन्होंने देश के संविधान के मसौदे में संविधान की प्रकृति को अत्यंत महत्वपपूर्ण स्थान दिया। संविधान की प्रकृति इस मामले में महत्वपूर्ण है कि यह केंद्र व राज्य के बीच संबंधों को तय करती है। इस वक्त इस बात का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है, क्योंकि गठबंधन राजनीति ने ऐसे समीकरणों को जन्म दिया है जो अंबेडकर व संविधान की भावना के विरूद्ध है। छोटे-छोटे दलों की मजबूत उपस्थिति का प्रभाव केवल चुनाव, नीति निर्माण और कानून तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे सरकार के गठन में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। लोकतंत्र में यह अच्छा प्रतीत होता है, क्योंकि गठबंधन की राजनीति कमजोर लोगों की भागीदारी को बढ़ाती है। बहुदलीय राजनीति के उभार ने बड़े लोकतांत्रिक खिलाडि़यों के एकाधिकार को चुनौती दी है। छोटे दलों के जन प्रतिनिधियों को अब अपनी जनता के दुख-दर्द की अभिव्यक्ति के लिए ज्यादा अवसर है। शक्ति का संतुलन अब राज्य व क्षेत्रीय दलों की ओर झुक रहा है। केंद्र अपने महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए छोटे दलों व राज्यों के मुखिया की ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं। ए राजा का इस्तीफा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तब ले पाए जब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि ने हरी झंडी दिखा दी। संसदीय प्रणाली में प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल में मंत्री बनाने का एकाधिकार रखता है, लेकिन गठबंधन राजनीति ने संसदीय व्यवस्था में सेंध लगा दी है। प्रधानमंत्री अब संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार व शक्ति का प्रयोग करने में असमर्थ साबित हो रहे हैं। इस प्रकार हमारे संविधान में दी गई संसदीय प्रणाली गठबंधन राजनीति का शिकार बन रही है। इसी गठबंधन राजनीति का दूसरा शिकार है केंद्र राज्य संबंधों में बदलाव। भारत के संविधान में शक्तियों को केंद्र व राज्य के बीच विभाजित किया गया है। इस विभाजन में केंद्र को ज्यादा बलशाली बनाया गया है। संविधान राज्यों को जान बूझकर कम शक्ति प्रदान करता है। संविधान सृजन के समय यह बात साफ कही गई थी। नवंबर 1948 को सांविधानिक दस्तावेज के संकल्प को प्रस्तुत करते हुए डॉ. अंबेडकर ने कहा कि यदि कानून के किसी विद्यार्थी को संविधान दी जाए तो वह दो प्रश्न अवश्य करेगा कि संविधान के अंतर्गत किस प्रकार के शासन का (संसदीय या राष्ट्रपति) स्वरूप सोचा गया है और यह कि संविधान का स्वरूप या प्रकृति (ऐकिक या परिसंघीय) कैसा है? पहले प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि हमारा शासन संसदीय होगा, क्योंकि लंबे समय से हम इसके आदी हैं। दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि इस संवैधानिक प्रारूप में एक परिसंघीय संविधान परिकल्पित है, क्योंकि यह द्विस्तरीय शासन प्रणाली का सृजन कर रहा है। इस संविधान में द्विस्तरीय शासन प्रणाली के अंतर्गत केंद्र में संघ व उसकी परिधि में राज्यों को रखा गया है। दोनों संविधान द्वारा प्रदत्त अपने-अपने क्षेत्रों में संप्रभु शक्तियों का प्रयोग करेंगे। उन्होंने भारत व अमेरिका के संविधान की भी तुलना की। कई संविधानविद अमेरिकी संविधान को विश्व के परिसंघीय संविधानों का आदर्श मानते हंै। उनके अनुसार भारत का संविधान अमेरिका से दो प्रकार से समरूपता रखता है। एक यह कि वहां भी द्विस्तरीय व्यवस्था है तथा दूसरे कि संविधान राज्यों का लीग नहीं है और न ही राज्य संघीय सरकार की प्रशासनिक इकाई या एजेंट है। कई बिंदुओं पर दोनों में अंतर भी है। जैसे यहां द्वैध नागरिकता, दो संविधान, दो न्यायपालिका, विधिक संहिताओं (जम्मू-कश्मीर के दुर्भाग्यपूर्ण अपवाद को छोड़कर) या लोक सेवाओं में दोहरापन नहीं है, जो कि द्विस्तरीय व्यवस्था की तार्किक परिणति होती है। ऐसी दोहरी व्यवस्था के लिए भारत के संविधान में कोई जगह नही है। भारत में न्यायिक स्तर पर एकल न्यायपालिका है, जो श्रृंखलाबद्ध है, जिसमें शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय है। अखिल भारतीय स्तर पर एक अखिल भारतीय सेवा है। यद्यपि कि राज्यों को स्वयं की लोक सेवा बनाने का अधिकार है। इसके अलावा हमारी संविधान संशोधन की प्रक्रिया अमेरिका की तुलना में काफी लचीली है। अपने सारगर्भित भाषण में अंबेडकर ने यह स्वीकार किया कि राज्यों की तुलना में केंद्र बलशाली है, क्योंकि आधुनिक विश्व में परिस्थितियां इस प्रकार की हैं कि शक्ति का केंद्रीकरण अपरिहार्य हो गया है। उन्होंने संविधान की रचना इस बुद्धिमत्ता से की कि शक्ति के अत्यधिक व अनुचित केंद्रीकरण को टाला जा सके। इसकी विलक्षणता इस तथ्य में निहित है कि युद्ध के समय यह ऐकिक संविधान की भांति कार्य करने लगता है। अंबेडकर ने स्वीकार किया कि जो दस्तावेज वह रख रहे हैं, वह संविधान के परिसंघीय ढांचे को प्रस्तुत करता है। किंतु रोचक बात यह है कि इतने बड़े संविधान में इस बात को कहीं भी साफ-साफ लिखा नहीं गया है और न ही शब्द परिसंघ या परिसंघीयता का कोई जिक्र लिखित रूप में कहीं किया गया है। इसके विपरीत जिस पदावली का प्रयोग किया गया है उसमें अनु. एक में भारत को राज्यों का संघ बताया गया है। इतना ही नहीं राज्यों की सीमा, नाम व क्षेत्र परिवर्तन करने के सिलसिले में अन्य संबंधित राज्यों की सम्मति आवश्यक थी, जबकि अब केवल उनका विचार जान लेना ही पर्याप्त है जिसे मानने के लिए केंद्र बाध्य नहीं हैं। प्रारूप समिति द्वारा संविधान के प्रथम दस्तावेज को स्वीकार नहीं किया गया जो बीएन राऊ ने तैयार किया था। ऐसे में किसी को भी अचरज हो सकता है कि एक तरफ तो अंबेडकर भारत को फेडरल संविधान देना चाहते थे, दूसरी तरफ भारत को राज्यों का फेडरेशन कहने की बजाय यूनियन कह रहे थे। यह अंतर्विरोध क्यों था? वस्तुत: यह अंबेडकर की दूरदर्शिता व देश की एकता-अखंडता को सुनिश्चित करने लिए उठाया गया अनुपम उदाहरण है। राज्यों का परिसंघ पदावली के दो निहितार्थ हैं। पहला, हमारा परिसंघ राज्यों की किसी संधि या करार की उत्पत्ति नहीं है और दूसरा, कोई प्रदेश इससे पृथक होने के अधिकार का दावा नहीं कर सकता। इस प्रकार अंबेडकर की दृष्टि व्यापक व सोच प्रगतिपूर्ण थी। अनेकता में एकता की स्थापना के लिए संविधान की भूमिका किस प्रकार सकारात्मक होनी चाहिए, यह भलीभांति जानते थे। बाबा साहब अंबेडकर को मालूम था कि एक मजबूत केंद्र ही विभाजनकारी प्रवृत्तियों को उत्तेजित करने वाली प्रेरणा को प्रारंभ में ही नष्ट करने का नैतिक व संवैधानिक साहस कर सकता है। एक शक्तिशाली केंद्र ही कठोर निर्णय ले सकता है। यदि केंद्र शक्तिशाली होता और राज्य आधारित दलों पर निर्भर नहीं होता तो कांधार कांड, आतंकवाद, नक्सलवाद, भ्रष्टाचार पर ज्यादा कठोरता से निर्णय हो पाता। हमारा देश डॉ. अंबेडकर की दूरदर्शी सोच और समग्र चिंतन को आज अधिक प्रासंगिक पाता है। (लेखक विधि प्रवक्ता हैं).
शहीदों की जाति बताना कितना जायज
कांग्रेस पार्टी के मुखपत्र कांग्रेस संदेश पत्रिका के मार्च अंक में स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को जाति का मुखौटा पहनाकर उनके जीवन वृत्तांत का उल्लेख किया जाना राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत नहीं माना जा सकता है। कांग्रेस संदेश पत्रिका का यह आचरण शहीदों की भावनाओं और गरिमामयी शहादत के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। जब देश और समाज में आपसी सौहार्द्र स्थापित करने के लिए जाति, पंथ, भाषा और क्षेत्र की संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठने की बात की जा रही है तो ऐसे में कांग्रेस संदेश में शहीदों की जातियों का उल्लेख करना आखिर क्या दर्शाता है? क्या शहीदों की इस तरह जातिवादी घेराबंदी करने से एक नया वितंडा खड़ा नहीं होगा? एक ओर कांग्रेस पार्टी जाति और धर्म की सियासत करने वाले राजनीतिक दलों को नैतिकता और शुचिता की सीख देती नजर आती है, वहीं अपने मुखपत्र में शहीदों की जाति का उल्लेख करना आखिर यह किस प्रकार की देशभक्ति का प्रदर्शन है? कांग्रेस संदेश पत्रिका में उल्लेख किया गया है कि भगत सिंह एक स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनका जन्म लायलपुर (अब पाकिस्तान) में एक जाट सिख परिवार में हुआ था, जो ब्रिटिश राज के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल रहे थे। राजगुरु के बारे में पत्रिका में कहा गया है कि वह महाराष्ट्र के भारतीय क्रांतिकारी थे और देशस्थ ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक रखते थे। कुछ इसी तरह सुखदेव के नाम के आगे थापर जोड़ते हुए बताया गया है कि सुखदेव थापर का जन्म पंजाब के लुधियाना में हुआ था। वह पुलिस की अत्यधिक पिटाई के कारण लाला लाजपत राय की हुई मौत का बदला लेने के लिए शहीद भगत सिंह और राजगुरु के साथ ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जेपी सांडर्स की हत्या में शामिल थे। कांग्रेस संदेश पत्रिका में क्रांतिकारियों की शूरवीरता को हत्या जैसे शब्दों से जोड़ना क्या कांग्रेस की औपनिवेशिक मानसिकता को उजागर नहीं करता है? अगर भाजपा या देश का कोई भी आमजन जिनकी क्रांतिकारियों मे अपार श्रद्धा और निष्ठा है, अगर आहत होकर कांग्रेस पार्टी को देश से माफी मांगने की बात कहता है तो यह अनुचित कैसे कहा जा सकता है? देखा जा रहा है कि शहीद भगत सिंह और सुखदेव के परिवार के लोग भी कांग्रेस संदेश पत्रिका के इस धत्कर्म को लेकर बेहद ही आहत हैं और नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। कांग्रेस संदेश पत्रिका जाट सिख परिवार, देशस्थ ब्राह्मण समुदाय और थापर जैसे शब्दों को जोड़े बिना भी तो क्रांतिकारियों का उल्लेख कर अपनी देशभक्ति का प्रदर्शन कर सकती थी? फिर इन जाति और क्षेत्रसूचक शब्दों को जोड़ने की उसे जरूरत क्यों आन पड़ी? ऐसे में कांग्रेस की मंशा और नीयत पर सवाल तो उठेगा ही। यह सार्वकालिक सत्य है कि स्वतंत्रता आंदोलन में अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले शूरवीरों ने जाति, धर्म और क्षेत्र जैसी संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठकर देश की आजादी के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर किया। न तो उनके क्रांतिकारी आचरण में कभी जाति-धर्म की भावना निहित रही और न ही क्षेत्र विशेष के संकुचित दायरे से वे बंधे दिखे। फिर उनके नाम के साथ संकुचित और सीमित संदर्भ वाले शब्दों को जोड़ना क्या उनका मान-मर्दन करना नहीं हुआ? क्यों न माना जाए कि कांग्रेस पार्टी अपने सियासी फायदे के लिए ही शहीदों को जाति, धर्म और क्षेत्र के विभिन्न खांचे में फिट करना चाहती है। अगर इस तरह की राजनीतिक ठगहारी पर देश के अन्य राजनीतिक दलों के अलावा आमजन भी सवाल उठा रहे हैं तो यह जायज ही है। अब अगर बचाव में कांग्रेस संदेश पत्रिका के संपादक अनिल शास्त्री यह तर्क दे रहे हैं कि पाठ्य पुस्तकों में भी स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन वृतांत में उनकी जातियों का उल्लेख किया गया है तो यह बिल्कुल ही गले उतरने वाला तर्क नहीं है। समझ लेना जरूरी है कि कांग्रेस संदेश पत्रिका विद्यार्थियों के लिए कोई पाठ्य पुस्तक नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस की राजनीतिक विचारधारा को प्रचारित करने वाला एक मुखपत्र है और इसका अपना विशेष राजनीतिक महत्व है। इसकी तुलना पाठ्य पुस्तकों से कैसे की जा सकती है? किसी भी राजनीतिक दल को अपने मुखपत्रों के माध्यम से राष्ट्रीयता के अग्रदूतों और शहीदों का उपहास और अपमान करने की छूट देश की जनता नहीं दे सकती है। जहां तक पाठ्य पुस्तकों में क्रांतिकारियों के जीवन-चरित में उनकी जातियों का उल्लेख का सवाल है तो यह भी अनुचित ही है और एक गलत परंपरा को कांग्रेस अगर आधार बना रही है तो यह और भी अनर्थकारी है। मानव संसाधन मंत्रालय को इस दिशा में पहल करते हुए पाठ्य पुस्तकों में उल्लिखित क्रांतिकारियों के जीवन वृतांत से जुड़े जाति प्रसंगों को हटाया जाना चाहिए, लेकिन देखा जा रहा है कि सत्ता में बैठे हुए लोग राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वाले कार्यो और महापुरुषों व राष्ट्रवाद के सारगर्भित संदर्भो के प्रति तंग नजरिया अपना रहे हैं। जब भी किसी सामाजिक संस्थाओं और राजनीतिक दलों द्वारा देश को एकता के सूत्र में गूंथने के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अलख जगाने का प्रयास किया जाता है, तथाकथित ढपोरशंखी धर्मनिरपेक्षतावादियों को इसमें सांप्रदायिकता की बू आने लगती है। इतिहास में राष्ट्रीय शूरवीरों के बारे में न जाने कितनी भ्रामक बातें लिखी गई हैं, लेकिन सरकारों द्वारा आज तक इसमें सुधार करने की पहल नहीं की गई। कौन नहीं जानता है कि महाराणा प्रताप और शिवाजी भारतीयता के नायक रहे हैं और उन्होंने भारतीय संस्कृति और समाज की रक्षा में अपने जीवन को कुर्बान कर दिया। लेकिन देश के तमाम इतिहास की पुस्तकों में जान-बूझकर इन नायकों के संबंध में भ्रामक बातों का जिक्र किया गया है। तमाम वामपंथी इतिहासकारों द्वारा अभी भी उन पर गाहे-बगाहे कीचड़ उछाला जाता है। सार्वजनिक मंचों पर क्रांतिकारी वीर सावरकर को लेकर आज भी अनर्गल बहस जारी है। क्या ऐसी घटिया हरकतों पर सरकार को रोक नहीं लगानी चाहिए? लेकिन देखा जा रहा है कि केंद्र की सरकार ने राष्ट्रवाद पर चुप्पी साध रखी है। कांग्रेस के कुछ लोगों द्वारा बचाव में यह भी तर्क दिया जा रहा है कि पाठ्य पुस्तकों में गांधी जी के जीवनचरित में उनकी जाति बनिया का उल्लेख है, लेकिन ऐसे कुतर्क गढ़ने वालों से पूछा जा सकता है कि क्या गांधी जी की महानता और लोकप्रियता इस बात में निहित है कि उनका जन्म बनिया परिवार में हुआ था? अगर नहीं तो फिर उनकी जाति का महिमामंडन करना क्या गांधी जी का उपहास उड़ाना नहीं हुआ? आज गांधी जी विश्व के महान व्यक्तियों में शुमार हैं और आज भी उनके आदर्श विश्व के लिए प्रेरणास्त्रोत बने हुए हैं तो यह उनकी वैचारिक दृढ़ता और सहज मानवीय संवेदना के कारण संभव है, न कि किसी जाति विशेष में जन्म लेने के कारण। राजाराममोहन राय, ईश्वरचंद विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद और देश के तमाम समाजसेवी और क्रांतिकारी आज भी जनमानस के लिए पूज्यनीय और वंदनीय हैं, लेकिन क्या यह जरूरी हो जाता है कि हम उनकी जातियों को जानें ही? क्या उनका योगदान उन्हें जानने के लिए पर्याप्त नहीं है? सच तो यह है कि इनके सामाजिक और राष्ट्रीय योगदानों में उनकी जाति की भूमिका नगण्य ही रही है। फिर सियासी फायदे के लिए इन्हें जातियों में बांधना कहां तक उचित है। सच यह भी है कि इन महान लोगों ने अपने जीवन काल में जाति और सांप्रदायिक भावनाओं की खुलकर आलोचना की। ऐसे में अगर कोई राजनीतिक दल, संस्था या व्यक्ति विशेष उनकी जातियों का उल्लेख करता है और उसकी आड़ में अपनी सियासी गोटियां बैठाता है तो निस्संदेह उसके सामाजिक-राजनीतिक आचरण पर सवाल उठेंगे ही। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
अंबेडकर की दलित चेतना
समय बीतने के साथ-साथ बाबासाहेब अंबेडकर के विचारों की प्रासंगिकता बढ़ती ही जा रही है। दलितों तथा गैर दलितों के बीच उनकी तरह-तरह से व्याख्या की जा रही है। अंबेडकर के विचारों के तीन प्रमुख स्रोत थे। पहला उनका अपना अनुभव, दूसरा-महात्मा ज्योतिबा फूले का सामाजिक आंदोलन तथा तीसरा-बुद्धिज्म। इन स्रोतों की जड़ में भारत की अमानवीय जाति व्यवस्था थी। डॉ. अबेडकर को भी छुआछूत तथा जातीय घृणा का शिकार होना पड़ा था, जिससे खिन्न होकर उन्होंने इसे खत्म करने का अभियान चलाया। उन्होंने जाति व्यवस्था की ईश्वरीय अवधारणा का तीखा विरोध किया और इसे मानव निर्मित बताया। इस संदर्भ में उनके महात्मा गांधी से वैचारिक मतभेद उभर कर सामने आए। गांधीजी कहते थे कि छुआछूत मानव की देन है इसलिए मानव प्रदत्त छुआछूत से तो लड़ना चाहिए, जबकि ईश्वरीय जाति व्यवस्था के विरुद्ध आवाज नहीं उठानी चाहिए। गांधीजी की इस ईश्वरीय अवधारणा के विरुद्ध अंबेडकर चट्टान की तरह खड़े हो गए। यद्यपि छुआछूत निवारण के अभियान में गांधीजी की भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती, लेकिन उनकी ईश्वरीय अवधारणा की दलितों ने तीव्र आलोचना की। अंबेडकर ने जाति व्यवस्था को हिंदू धर्म की प्राणवायु बताया और साफ शब्दों में कहा कि ऊंच-नीच के भेदभाव के चलते हिंदू धर्म कभी मिशनरी धर्म नहीं बन पाया, जबकि अन्य धर्म जैसे बौद्ध धर्म अनेक देशों की सीमाएं पार कर गए। जाति व्यवस्था विरोधी, अहिंसक तथा विश्वबुंधत्ववादी होने के कारण डॉ. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इन्हीं कारणों से उन्होंने बौद्ध धर्म को दलितों के लिए सबसे उचित धर्म बताया। डॉ. अंबेडकर का राजनीतिक चिंतन भी जाति व्यवस्था से उत्पन्न परिस्थितियों से प्रभावित हुआ था। वह 1920 के दशक से ही दलितों के लिए पृथक मतदान की मांग करने लगे थे। इसके पीछे उनका तर्क था कि ऐसा होने से जाति व्यवस्था के विरोध तथा दलितों के हित में काम करने वाले ही चुनकर विधानसभा तथा लोकसभा में पहुंच सकेंगे अन्यथा दलित स्थापित पार्टियों के दलाल बनकर रह जाएंगे। गांधीजी के प्रबल विरोध और आमरण अनशन के कारण पृथक मतदान की मांग वापस ले ली गई, जिसके बदले मौजूदा आरक्षण व्यवस्था लागू हुई। यह व्यवस्था पूना पैक्ट (1932) के नाम से जानी जाती है। पूना पैक्ट का सबसे अधिक प्रभाव शिक्षा के क्षेत्र में पड़ा। लाखों की संख्या में दलित शिक्षित होकर हर श्रेणी की नौकरियों में शामिल हुए और उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की दिशा बदल दी। लेकिन आरक्षण नीति सही ढंग से लागू न होने के कारण दलित समाज का नुकसान भी हुआ है। डॉ. अंबेडकर की आशंका सही सिद्ध हुई। विधानसभा तथा लोकसभा में चुने हुए प्रतिनिधि दलित मुक्ति के सवाल पर नकारात्मक भूमिका में आ गए। सालों-साल चलती रही इसी भूमिका के कारण काशीराम की बहुजन समाज पार्टी का 1984 में उदय हुआ। काशीराम ने वर्तमान जनतांत्रिक प्रणाली में दलितों की भूमिका को चमचा युग बताया। काशीराम ने सत्ता में भागीदारी को सत्ता पर कब्जा में बदल दिया। इस उद्देश्य से उन्होंने नारा दिया अपनी-अपनी जातियों को मजबूत करो। इस नारे के तहत सर्वप्रथम बसपा ने विभिन्न दलित जातियों का सम्मेलन करके उन्हें अपनी तरफ आकर्षित किया। साथ ही उसने पिछड़ी जातियों को अपनी तरफ लाने की कोशिश की जिसका परिणाम था बसपा का 1993 में समाजवादी पार्टी से समझौता। दो साल बाद इस गठबंधन के टूट जाने के बाद बसपा का झुकाव भारतीय जनता पार्टी की तरफ बढ़ा तथा उसके सहयोग से मायावती तीन बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। किंतु 2007 में उत्तर प्रदेश के पिछले आम चुनाव में मायावती के नेतृत्व में बसपा ने दलित-ब्रांाण एकता के नारे के साथ बहुमत हासिल कर लिया। यह बहुमत प्रचंड जातीय धु्रवीकरण के आधार पर मिला था। वैसे भी भारतीय चुनाव प्रणाली में हमेशा जातीय, क्षेत्रीय और सांप्रदायिक धु्रवीकरण आम प्रक्रिया का हिस्सा रही है। किंतु मंडल कमीशन के लागू होने के बाद जातीय धु्रवीकरण बेहद उग्र रूप में जनता के समक्ष आया है। उत्तर प्रदेश में इस धु्रवीकरण से बसपा को सबसे अधिक फायदा पहुंचा है, जिस कारण वह सत्ताधारी पार्टी बन गई। इस संदर्भ में एक गंभीर सवाल यह उठता है कि जातीय ध्रवीकरण के आधार पर चुनाव जीत कर सत्ताधारी तो बना जा सकता है, किंतु डॉ. अंबेडकर की जाति-उन्मूलन की विचारधारा को मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता। बुद्ध से लेकर अंबेडकर तक ने जाति-विहीन समाज में ही दलित मुक्ति की कल्पना की थी, किंतु आज का भारतीय जनतंत्र पूर्णरूपेण जातीय, क्षेत्रीय एवं सांप्रदायिक जनतंत्र में बदल चुका है। ऐसा जनतंत्र राष्ट्रीय एकता के लिए वास्तविक खतरा है। डॉ. अंबेडकर की उक्ति- जातिविहीन समाज की स्थापना के बिना स्वराज प्राप्ति का कोई महत्व नहीं, आज भी विचारणीय है। (लेखक जेएनयू में प्रोफेसर हैं).
तब बना खड्गहस्त खालसा पंथ
बैसाखी जनजीवन से जुड़ा हुआ ऐसा त्योहार है जिसका सीधा सम्बन्ध कृषि से है। इसलिए यह सभी वगरें, जातियों और धर्मों के मध्य बड़े उत्साह से मनाया जाता है। किंतु सिखों के लिए इसका विशेष महत्व है। तीन सौ वर्ष पूर्व इसी दिन गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ सृजन किया था। सिख आंदोलन इससे दो सौ वर्ष पूर्व गुरु नानक देव द्वारा प्रारभ्भ किया जा चुका था। वह आंदोलन अपने मूलरूप में भक्तिपरक था। किंतु गुरु गोबिंद सिंह का खालसा पंथ अपने अंदर तत्कालीन राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सरोकारों को भी समाए हुआ था। एक ओर यह एकेश्वरवाद से जुड़ा हुआ था, दूसरी ओर मानवीय समता, सामाजिक विषमता, छुआछूत, ऊंच-नीच के साथ गहरा सरोकार व्यक्त करता था और सत्ता के अन्याय तथा अत्याचार के विरुद्ध लोगों को जागृत करने वाला भी था। गुरु गोबिंद सिंह से लगभग 100 वर्ष पूर्व ही इस आंदोलन का टकराव अपने समय की सत्ता से प्रारभ्भ हो गया था। इसी कारण पांचवें गुरु अजरुन देव को सन् 1606 में मुग़ल बादशाह जहाँगीर द्वारा और नौवें गुरु तेग़ बहादुर को सन् 1675 में औरंगजेब द्वारा शहीद किया था। छठे गुरु हरिगोबिंद ने शाहजहाँ की सेना के साथ सशस्त्र टक्कर भी ली थी। दसवें गुरु गोबिंद सिंह ने अनुभव किया कि दो सौ वर्ष पूर्व स्थापित इस परम्परा को नया स्वरूप देने की आवश्यकता है। उनके दादा गुरु हरिगोबिंद इस स्वरूप परिवर्तन की नींव रख चुके थे। बैसाखी 1699 के दिन, शिवालिक की पहाड़ियों के मध्य अपने पिता गुरु तेग़बहादुर जी द्वारा बसाए नगर आनन्दपुर में सम्पूर्ण देश में फैले अपने अनुयायियों का उन्होंने एक विशाल सम्मेलन बुलाया। उस सम्मेलन में उन्होंने देश और धर्म की रक्षा के लिए कुछ सिर आमंत्रित किए। उनके आह्वान पर पाँच लोग सामने आए, जिन्हें पंच प्यारे कहकर समादृत किया गया। उस दिन गुरु गोबिंद सिंह ने अपने अनुयायियों को नया गणवेश और नाम दिए। उन्हें धर्म युद्ध करने के लिए तैयार किया। सबसे बड़ा काम यह किया कि युद्ध के प्रति उनमें गहरी आस्था उत्पन्न की। इस देश में प्राचीन काल से ही विजयादशमी के दिन, शस्त्र पूजा की परम्परा है। ऐसी पूजा केवल क्षत्रिय जाति ही करती रही हैं, जिनकी संख्या कभी भी दस प्रतिशत से अधिक नहीं रही। शेष जनता सदैव शस्त्रविहीन रही। परिणाम यह हुआ कि जब कभी सशस्त्र विदेशी आक्रमणकारी इस देश में आए, उनका सामना कुछ क्षत्रिय जातियों ने तो किया, अधिसंख्य जनता उससे निर्लिप्त रही। उसने अत्याचार सहे, बड़ी संख्या में उनका संहार भी हुआ। वे बड़े निरीह भाव से सब कुछ सहते रहे और अपना सिर कटाते रहे। गुरु गोबिंद सिंह ने इस देश को युद्ध का पूरा दर्शन दिया। युद्ध कर्म के लिए केवल क्षत्रियों पर निर्भरता समाप्त कर दी। उन्होंने इस कार्य के लिए प्रशिक्षण देने का कार्य उन पिछड़ी और दलित जातियों के लिए भी किया, जिन्होंने अपने जीवन में कभी तलवार नहीं उठाई थी। कभी समाज में कोई विशिष्ट स्थान प्राप्त करने की कभी कल्पना भी नहीं की थी। इस दृष्टि से ज्ञानी ज्ञान सिंह द्वारा रचित 'पंथ प्रकाश' की ये पंक्तियाँ ध्यान देने योग्य हैं-जिनकी जाति और कुल माही/सरदारी नहि भई कदाही और तिनको मै सरदार बनाऊं/तबै गोबिंद सिंह नाम धराऊ। पिछड़े, दलितों और निरीह जनों की, जो सदियों से उपेक्षा और अन्याय की चक्की में पिस रहे थे, गुरु गोबिंद सिंह ने दुज्रेय सैनिकों के रूप में परिवर्तित कर दिया जो अपने समय की संसार को सबसे बड़ी और शक्तिशाली सत्ता से टक्कर लेने लगे। इस कार्य के लिए उन्होंने शस्त्रों की महत्ता पर पूरी तरह बल दिया। इस देश में शस्त्र पूजा तो होती थी, किन्तु कुछ लोगों को छोड़कर शस्त्र सामान्य जनता के जीवन का अनिवार्य हिस्सा नहीं थे। मुग़ल शासन में, राजपूतों को छोड़कर किसी हिन्दू को न शस्त्र धारण करने की अनुमति थी, न धोड़े पर चढ़ने की। गुरु गोबिंद सिंह ने इन दोनों कायरें के लिए अपने शिष्यों को प्रेरित किया। उनके पूर्व की नानक मार्गी भक्ति धारा में परमात्मा के लिए वैष्णव मार्गी नामों का ही अधिक प्रयोग होता था।राम,हरि,गोबिंद,गोपाल,मुरारी,सारंगपाणि जैसे परमात्माबोधक नाम गुरुवाणी में असंख्य बार प्रयुक्त हुए हैं। गुरु गोबिंद सिंह ने अनेक पद ऐसे भी लिखे जिनमें इस प्रकार के नामों का प्रयोग किया गया है। वे अनुयायियों में वीर रस का संचार करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने परमात्माबोधक ऐसे नामों को चुना और सृजन किया जो इस उद्देश्य की पूर्ति में सहायक हो सकते थे। इस दृष्टि से काल उनका सबसे प्रिय नाम था। उन्होंने अपने साहित्य में परमात्मा के लिए काल, अकाल, महाकाल, सर्वकाल आदि का उल्लेख किया। काल का वर्णन करते हुए उसके साकार रूप की कल्पना भी उनके सम्मुख अनायास आ गई। इस साकार रूप में काल का अस्त्र-शस्त्र धारी रूप ही उनके सम्मुख प्रमुख रूप से रहा। परमात्मा को उन्होंने खड्गपाणि, कृपाणपाणि, वाणपाणि, दण्डधारी, चक्रपाणि, असिपाणि, असिधुज (ध्वज) खड्गकेतु आदि अनेक शस्त्रधारी नामों से पुकारा। शस्त्रों और ईश्वर के वीर रूप के प्रति उनकी तन्मयता इतनी बढ़ी कि उनकी दृष्टि में शस्त्र और शस्त्रधारी में कोई अंतर न रहा। स्वयं खड्ग ही खड्गधारी का प्रतीक बन गया। वे अपने ग्रंथ विचित्र नाटक का प्रारभ्भ वे खड्ग की स्तुति से करते हैं-नमसकार स्री खड्ग कउ करौ सु हितु चितु लाई/पूरन करौ गिरन्थ इह तुम मुहि करहु सहाई। यहां यह बात ध्यान देने की है कि इस देश में अपने ग्रंथ की सकुशल सम्पूर्णता के लिए कविगण सरस्वती देवी से याचना करते रहे है, किंतु गुरु गोबिंद सिंह ने यह याचना श्री खड्ग से की। उनकी दृष्टि में शस्त्र और शस्त्रधारी अभेद्य हैं। काल से समान ही ये शस्त्र भी सदा एक रूप है, निर्विकार है-नमो खड्ग खंड कृपाणं कटारं। सदा एक रुपं सदा निरविकारं। इस प्रकार वे अपने तीर, तुफंग, तलवार, गदा, सैहथी आदि शस्त्रों को नमस्कार करते हैं-नमस्कारयं मोर तीरं तुफंगं। नमो खंग खड़ंग अभेयं अभंगं। गदायं, ग्रिस्टं नमो सेहथीअं। जिनै तुल्य बीरं बीयो न बोअं। गुरु गोबिंद सिंह केवल यही नहीं चाहते थे कि लोग आत्मरक्षा और अन्याय का सामना करने के लिए शस्त्र धारण करें। वे जानते थे कि शत्रु के सम्मुख उसका सामना करने के लिए तलवार उठाकर आ जाने मात्र से काम नहीं चलता। उन्होंने जिस युद्ध दर्शन का विकास किया था उससे शस्त्रधारी को मानसिकता में आमूल परिवर्तन बहुत आवश्यक था। गुरु गोबिंद सिंह ने शस्त्रों को परमात्मा का रूप दिया और सदा उसकी शक्ति को स्मरण रखने की बात की। एक स्थान पर उन्होंने कहा है कि मेरे शस्त्र ही मेरे इष्ट देव है-अरु कृपान खंडो खड्ग तुपक तबर अरु तीर। सैफ सिरोही सैहथी वहै हमारे पीर। उनकी दृष्टि में काल, काली, तेग़ और तीर में कोई अंतर नहीं है-काल तुही काली तुही,तुही तेग अरु तीर। तुही निसानी जीत की आजु तुही जगबीर। गुरु गोबिंद सिंह ने लोगों को शस्त्रधारी होने के लिए कहा और समय आने पर शस्त्रों का उपयोग करने की प्रेरणा दी। उन्होंने जो पत्र औरंगजेब को लिखा था उसमें भी यह कहा था कि जब नीति के सभी साधन असफल हो जाएँ तो तलवार उठा लेना पूरी तरह उचित है। किन्तु शस्त्र उठाने का एक महत् उद्देश्य होना चाहिए। यह उद्देश्य है सत्पुरुषों, साधुजनों की रक्षा और अत्याचारी का विनाश करना। यदि ऐसा नहीं होगा शस्त्रधारी व्यक्ति स्वयं अन्यायी और अत्याचारी बन जाएगा। यह बड़ी घातक स्थिति होगी। खड्ग की स्तुति करते हुए गुरु गोबिंद सिंह का एक प्रसिद्ध छंद है-खग खंड बिहंडं खल दल खंडन अति रण मंडं बर बंडं/ भुंज दंड अखंडं तेज प्रचंडं जोति अमंडं भानु प्रभंगं/ सुख संता करणं दुरमति दरणं किल बिख हरणं असि सरगं/जै जै जग कारण सृष्टि उबारणं मम प्रति पालंग जै तंग। बैसाखी के दिन खालसा के रूप में उन्होंने एक नए व्यक्ति का सृजन किया। इस देश में विदेशी आक्रमणकारियों को आए और अपना शासन स्थापित किए सात सौ वर्ष से अधिक हो गए थे। इन आक्रमणकारियों के हाथों जनता बुरी तरह पीड़ित थी। निर्बल, निरीह और निरुपाय जनता के सम्मुख भगवान के अतिरिक्त कोई सहारा नहीं था। गुरु गोबिंद सिंह ने उनके पस्त और निरुपाय जीवन में नवजीवन का संचार किया। एक नए युग का सूत्रपात किया।
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