Thursday, April 14, 2011

शहीदों की जाति बताना कितना जायज


 कांग्रेस पार्टी के मुखपत्र कांग्रेस संदेश पत्रिका के मार्च अंक में स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को जाति का मुखौटा पहनाकर उनके जीवन वृत्तांत का उल्लेख किया जाना राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत नहीं माना जा सकता है। कांग्रेस संदेश पत्रिका का यह आचरण शहीदों की भावनाओं और गरिमामयी शहादत के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। जब देश और समाज में आपसी सौहा‌र्द्र स्थापित करने के लिए जाति, पंथ, भाषा और क्षेत्र की संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठने की बात की जा रही है तो ऐसे में कांग्रेस संदेश में शहीदों की जातियों का उल्लेख करना आखिर क्या दर्शाता है? क्या शहीदों की इस तरह जातिवादी घेराबंदी करने से एक नया वितंडा खड़ा नहीं होगा? एक ओर कांग्रेस पार्टी जाति और धर्म की सियासत करने वाले राजनीतिक दलों को नैतिकता और शुचिता की सीख देती नजर आती है, वहीं अपने मुखपत्र में शहीदों की जाति का उल्लेख करना आखिर यह किस प्रकार की देशभक्ति का प्रदर्शन है? कांग्रेस संदेश पत्रिका में उल्लेख किया गया है कि भगत सिंह एक स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनका जन्म लायलपुर (अब पाकिस्तान) में एक जाट सिख परिवार में हुआ था, जो ब्रिटिश राज के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल रहे थे। राजगुरु के बारे में पत्रिका में कहा गया है कि वह महाराष्ट्र के भारतीय क्रांतिकारी थे और देशस्थ ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक रखते थे। कुछ इसी तरह सुखदेव के नाम के आगे थापर जोड़ते हुए बताया गया है कि सुखदेव थापर का जन्म पंजाब के लुधियाना में हुआ था। वह पुलिस की अत्यधिक पिटाई के कारण लाला लाजपत राय की हुई मौत का बदला लेने के लिए शहीद भगत सिंह और राजगुरु के साथ ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जेपी सांडर्स की हत्या में शामिल थे। कांग्रेस संदेश पत्रिका में क्रांतिकारियों की शूरवीरता को हत्या जैसे शब्दों से जोड़ना क्या कांग्रेस की औपनिवेशिक मानसिकता को उजागर नहीं करता है? अगर भाजपा या देश का कोई भी आमजन जिनकी क्रांतिकारियों मे अपार श्रद्धा और निष्ठा है, अगर आहत होकर कांग्रेस पार्टी को देश से माफी मांगने की बात कहता है तो यह अनुचित कैसे कहा जा सकता है? देखा जा रहा है कि शहीद भगत सिंह और सुखदेव के परिवार के लोग भी कांग्रेस संदेश पत्रिका के इस धत्कर्म को लेकर बेहद ही आहत हैं और नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। कांग्रेस संदेश पत्रिका जाट सिख परिवार, देशस्थ ब्राह्मण समुदाय और थापर जैसे शब्दों को जोड़े बिना भी तो क्रांतिकारियों का उल्लेख कर अपनी देशभक्ति का प्रदर्शन कर सकती थी? फिर इन जाति और क्षेत्रसूचक शब्दों को जोड़ने की उसे जरूरत क्यों आन पड़ी? ऐसे में कांग्रेस की मंशा और नीयत पर सवाल तो उठेगा ही। यह सार्वकालिक सत्य है कि स्वतंत्रता आंदोलन में अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले शूरवीरों ने जाति, धर्म और क्षेत्र जैसी संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठकर देश की आजादी के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर किया। न तो उनके क्रांतिकारी आचरण में कभी जाति-धर्म की भावना निहित रही और न ही क्षेत्र विशेष के संकुचित दायरे से वे बंधे दिखे। फिर उनके नाम के साथ संकुचित और सीमित संदर्भ वाले शब्दों को जोड़ना क्या उनका मान-मर्दन करना नहीं हुआ? क्यों न माना जाए कि कांग्रेस पार्टी अपने सियासी फायदे के लिए ही शहीदों को जाति, धर्म और क्षेत्र के विभिन्न खांचे में फिट करना चाहती है। अगर इस तरह की राजनीतिक ठगहारी पर देश के अन्य राजनीतिक दलों के अलावा आमजन भी सवाल उठा रहे हैं तो यह जायज ही है। अब अगर बचाव में कांग्रेस संदेश पत्रिका के संपादक अनिल शास्त्री यह तर्क दे रहे हैं कि पाठ्य पुस्तकों में भी स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन वृतांत में उनकी जातियों का उल्लेख किया गया है तो यह बिल्कुल ही गले उतरने वाला तर्क नहीं है। समझ लेना जरूरी है कि कांग्रेस संदेश पत्रिका विद्यार्थियों के लिए कोई पाठ्य पुस्तक नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस की राजनीतिक विचारधारा को प्रचारित करने वाला एक मुखपत्र है और इसका अपना विशेष राजनीतिक महत्व है। इसकी तुलना पाठ्य पुस्तकों से कैसे की जा सकती है? किसी भी राजनीतिक दल को अपने मुखपत्रों के माध्यम से राष्ट्रीयता के अग्रदूतों और शहीदों का उपहास और अपमान करने की छूट देश की जनता नहीं दे सकती है। जहां तक पाठ्य पुस्तकों में क्रांतिकारियों के जीवन-चरित में उनकी जातियों का उल्लेख का सवाल है तो यह भी अनुचित ही है और एक गलत परंपरा को कांग्रेस अगर आधार बना रही है तो यह और भी अनर्थकारी है। मानव संसाधन मंत्रालय को इस दिशा में पहल करते हुए पाठ्य पुस्तकों में उल्लिखित क्रांतिकारियों के जीवन वृतांत से जुड़े जाति प्रसंगों को हटाया जाना चाहिए, लेकिन देखा जा रहा है कि सत्ता में बैठे हुए लोग राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वाले कार्यो और महापुरुषों व राष्ट्रवाद के सारगर्भित संदर्भो के प्रति तंग नजरिया अपना रहे हैं। जब भी किसी सामाजिक संस्थाओं और राजनीतिक दलों द्वारा देश को एकता के सूत्र में गूंथने के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अलख जगाने का प्रयास किया जाता है, तथाकथित ढपोरशंखी धर्मनिरपेक्षतावादियों को इसमें सांप्रदायिकता की बू आने लगती है। इतिहास में राष्ट्रीय शूरवीरों के बारे में न जाने कितनी भ्रामक बातें लिखी गई हैं, लेकिन सरकारों द्वारा आज तक इसमें सुधार करने की पहल नहीं की गई। कौन नहीं जानता है कि महाराणा प्रताप और शिवाजी भारतीयता के नायक रहे हैं और उन्होंने भारतीय संस्कृति और समाज की रक्षा में अपने जीवन को कुर्बान कर दिया। लेकिन देश के तमाम इतिहास की पुस्तकों में जान-बूझकर इन नायकों के संबंध में भ्रामक बातों का जिक्र किया गया है। तमाम वामपंथी इतिहासकारों द्वारा अभी भी उन पर गाहे-बगाहे कीचड़ उछाला जाता है। सार्वजनिक मंचों पर क्रांतिकारी वीर सावरकर को लेकर आज भी अनर्गल बहस जारी है। क्या ऐसी घटिया हरकतों पर सरकार को रोक नहीं लगानी चाहिए? लेकिन देखा जा रहा है कि केंद्र की सरकार ने राष्ट्रवाद पर चुप्पी साध रखी है। कांग्रेस के कुछ लोगों द्वारा बचाव में यह भी तर्क दिया जा रहा है कि पाठ्य पुस्तकों में गांधी जी के जीवनचरित में उनकी जाति बनिया का उल्लेख है, लेकिन ऐसे कुतर्क गढ़ने वालों से पूछा जा सकता है कि क्या गांधी जी की महानता और लोकप्रियता इस बात में निहित है कि उनका जन्म बनिया परिवार में हुआ था? अगर नहीं तो फिर उनकी जाति का महिमामंडन करना क्या गांधी जी का उपहास उड़ाना नहीं हुआ? आज गांधी जी विश्व के महान व्यक्तियों में शुमार हैं और आज भी उनके आदर्श विश्व के लिए प्रेरणास्त्रोत बने हुए हैं तो यह उनकी वैचारिक दृढ़ता और सहज मानवीय संवेदना के कारण संभव है, न कि किसी जाति विशेष में जन्म लेने के कारण। राजाराममोहन राय, ईश्वरचंद विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद और देश के तमाम समाजसेवी और क्रांतिकारी आज भी जनमानस के लिए पूज्यनीय और वंदनीय हैं, लेकिन क्या यह जरूरी हो जाता है कि हम उनकी जातियों को जानें ही? क्या उनका योगदान उन्हें जानने के लिए पर्याप्त नहीं है? सच तो यह है कि इनके सामाजिक और राष्ट्रीय योगदानों में उनकी जाति की भूमिका नगण्य ही रही है। फिर सियासी फायदे के लिए इन्हें जातियों में बांधना कहां तक उचित है। सच यह भी है कि इन महान लोगों ने अपने जीवन काल में जाति और सांप्रदायिक भावनाओं की खुलकर आलोचना की। ऐसे में अगर कोई राजनीतिक दल, संस्था या व्यक्ति विशेष उनकी जातियों का उल्लेख करता है और उसकी आड़ में अपनी सियासी गोटियां बैठाता है तो निस्संदेह उसके सामाजिक-राजनीतिक आचरण पर सवाल उठेंगे ही। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).

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