Sunday, April 10, 2011

डॉ. लोहिया की राह भूलते लोग


आज जब सम्पूर्ण विश्व में अस्त्र-शस्त्र की होड़ मची है और अपने देश भारत में जाति और संप्रदाय का विभाजन शिखर पर है तो समाजवादी डॉ. राममनोहर लोहिया की याद कैसे न आए? सप्तक्रांति के इस जनक का ध्यान आज बहुतों को नहीं आता क्योंकि मौजूदा हालात में हमारा जीवन कई त्रासदियों का सामना कर रहा है। डॉ. लोहिया के ही व्यक्तित्व और कृतित्व हमें इन त्रासदियों से मुक्ति दिला सकते हैं । कभी विचारों के माध्यम से तो कभी व्यवहार यानी शांतिपूर्णआंदोलनों के माध्यम से। डॉ. लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को अकबरपुर, फैजाबाद (अब अंबेडकर नगर जनपद) में हुआ था। इनके पिता हीरालाल लोहिया इनको अपने साथ लेकर वर्ष 1918 में अहमदाबाद गए जहां कांग्रेस अधिवेशन के दौरान मात्र आठ वर्ष के बालक लोहिया ने गांधीजी का प्रथम दर्शन किया। वर्ष 1929 में छह माह इंग्लैंड उच्च शिक्षा लेने के बाद वे शोधकार्य करने के लिए जर्मनी चले गए। वर्ष1932 में उन्हें बर्लिन के हंबोल्ट विश्वविालय से अर्थशास्त्र में पीएच.डी. की उपाधि मिली। कहते हैं कि उनका प्रतिरोधी स्वर वहीं से बुलंद हुआ। जर्मनी से अपने देश लौटने बाद सेवाग्राम में गांधीजी से उनकी 23 अप्रैल 1942 को वार्ता हुई। 8 अगस्त को वे भारत छोड़ो आंदोलन में सम्मिलित हो गए। अपने इरादों और उसूलों के पक्के लोहिया का व्यक्तित्व और उनके विचार वर्ष 1953 को प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के पांच आधारभूत सिद्धांतों की घोषणा में झलके। वे सत्ता के खिलाफ रहे। वर्ष1954 में उन्होंने नहर रेट आंदोलन चलाया जिसके लिए 1500 कार्यकर्ताओं के साथ उन्हें जेल जानी पड़ी। निहत्थे मजदूरों पर गोलियां चलाने वाली केरल सरकार से उन्होंने इस्तीफा मांगा जिससे अन्य नेताओं ने उनके प्रति पुरानी आत्मीयता को घटा दिया किंतु उन पर कोई असर नहीं हुआ। वर्ष 1956 में उन्होंने लगभग एक लाख कार्यकर्ताओं का जुलूस आयोजित किया जो आज भी लोगों को याद है। इस आंदोलन में डॉ. लोहिया ने हरिजनों को मंदिर में प्रवेश कराया और गिरफ्तारी दी। 

वर्ष 1962 में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवहारलाल नेहरू के खिलाफ फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव का मैदान संभाला लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। उसी वर्ष हैदराबाद में उन्होंने अंग्रेजी हटाओ सम्मेलन आयोजित किया। देश जब चीन युद्ध की आग में झुलस रहा था तो उन्होंने सरकार के दायित्व पर समाज का अंकुश लगाने पर जोर दिया। वर्ष 1963 में फरुखाबाद संसदीय क्षेत्र से उपचुनाव हुआ तो उन्होंने ऐतिहासिक जीत डेढ़ लाख मत प्राप्त कर संसद में कदम रखे। संसद में वे मूक-बधिर कभी नहीं रहे और न ही आज के बाहुबलियों की तरह उनका रूप रहा। 23 अगस्त को तीन आना बनाम बारह आना शीषर्क से ऐतिहासिक महत्व के उनके भाषण की चर्चा आज भी होती है। 12 अगस्त, 1967 को संसद में उनका अंतिम भाषण हुआ। 20 अगस्त, 1967 में उन्हें वेलिंगटन हास्पिटल में ग्रंथि ऑपरेशन के लिए भर्ती कराया गया जहां उन्होंने खुद को जेल में बंद कैदी से बड़ा कैदी महसूस किया। 12 अक्टूबर, 1967 को गरीबों, दलितों, शोषितों, वंचितों के इस मसीहा का प्राणांत हो गया। सप्तक्रांति में भी अन्याय के खिलाफ लड़ाई, अपने देश के साथ ही पूरी दुनिया में गैर-बराबरी के विरुद्ध संघषर्, सीमित खर्च, गरीबी के खिलाफ क्रांति, विशेष अवसर देकर जाति-प्रथा का अंत और सामाजिक समानता के लिए निरंतर संघषर्रत रहना लोहिया की स्वभावगत लड़ाई थी। 

सचमुच आज डॉ. लोहिया और उनकी सप्तक्रांति एक बार फिर से प्रासंगिक लगने लगी है क्योंकि उन्होंने समाजवादी होते हुए भी किसी किताबी समाजवाद का अनुकरण नहीं किया। उन्होंने क्रांति का आह्वान करते हुए भी क्रांति को केवल एक नारा नहीं बनने दिया। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. नीलम संजीव रेड्डी ने उन्हें सामाजिक, आर्थिक समस्याओं के प्रति जागरूक व्यक्ति के रूप में याद किया था तो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें महान योद्धा, क्रांतिदर्शी, दलितों और शोषितों के मसीहा के रूप में देखा था। सोशलिस्ट पार्टी के नेता मधु लिमये उन्हें महात्मा गांधी का सच्चा उत्तराधिकारी मानते हैं। आज लोहियावादी खुद भी लोहिया का मूल संदेश भूल रहे हैं। लोहिया का संवाद अगर जनता से था तो उनके उत्तराधिकारियों को चाहिए कि वे लोहिया के लोगों का पूरा ख्याल रखें। लोहिया के कर्म और कर्म जैसा धर्म उनके अपने जीवन में दिखा जबकि लोहिया को मानने वालों का भटकाव अब दिख रहा है यह लोहिया के विचारों से लोगों का एक प्रकार का धोखा है। न जाने कब वह दिन आएगा जब लोहिया का अपना भारत उनके सपनों-सा अस्तित्व पा सकेगा।

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