Sunday, April 10, 2011

किशन हजारे ऐसे बन गए अन्ना


अप्रैल का ही महीना था, जब किशन हजारे ने 1963 में सेना की नौकरी पाने के लिए मुंबई में लाइन लगाई थी। और, यह भी अप्रैल 2011 है, जब केंद्र की पूरी सरकार उनके सामने लाइन लगाकर खड़ी है। अपने जीवन के 51 साल के इस फासले में किशन बापट बापूराव हजारे ने ऐसा बहुत कुछ किया है, जिसने उन्हें अन्ना (भाई) हजारे बना दिया है। दो दशक पहले ही पद्मश्री और पद्मविभूषण हो चुके अन्ना हजारे की उम्र अब 73 साल है, लेकिन अभाव और गरीबी के बीच पैदा हुआ किशन हजारे देश के लिए अन्ना हो जाने से आगे की तैयारियों में जुटा है। 

किशन हजारे उर्फ अन्ना हजारे का जन्म 15 जनवरी 1940 को महाराष्ट्र में अहमदनगर जिले के भिंगर नामक गांव में हुआ था। अन्ना हजारे के जन्म के वक्तउनके दादा भिंगर में सेना की ओर से तैनात थे और अन्ना हजारे के पिता एक आयुर्वेदिक फार्मेसी में बतौर मजदूर काम करते थे। 1945 में अन्ना हजारे के दादा का असामयिक निधन हो गया, लेकिन उसके बाद भी अन्ना हजारे के पिता बापूराव हजारे ने भिंगर से न जाने का फैसला किया। फिर सात साल बाद 1952 में बापूराव ने आयुर्वेदिक फार्मेसी में काम करना छोड़ दिया और अपने गांव रालेगढ़ सिद्धी लौट आए। जब बापूराव रालेगढ़ सिद्धी आए तो अन्ना हजारे चौथी क्लास की पढ़ाई पढ़ चुके थे। सात भाई-बहनों वाले अन्ना हजारे के लिए यहां से मुश्किलों का जो दौर चला, वह बहुत लंबा खिंचा। सात बच्चों को पालने के लिए अन्ना हजारे के पिता लगातार कर्ज में डूबते गए और किसी भी बच्चे की ठीक से शिक्षा दीक्षा नहीं हो पाई। इसी वक्त किशन की बुआ ने किशन ने गोद ले लिया, क्योंकि उनको कोई बच्चा नहीं था। अपनी बुआ के साथ किशन मुंबई आ गया और यहां उसने सातवीं तक शिक्षा ग्रहण की। लेकिन घर की परिस्थितियां इतनी खराब थीं कि उसके लिए अब आगे और पढ़ते रह पाना मुश्किल था।

इसलिए किशन ने किशोरावस्था में ही मुंबई के दादर इलाके में फूल बेचने का काम शुरू कर दिया। दादर स्टेशन के बाहर वे खड़े होकर फूल बेचते थे और महीने का 40 से 50 रुपया कमा लेते थे। जैसे ही थोड़ी कमाई होने लगी, किशन ने अपने भाइयों को मुंबई लाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे किशन ने दादर इलाके में ही फूल की दो दुकानें ले लीं और अब कमाई सात-आठ सौ रुपए महीने होने लगी थी। यह पचास के दशक की बात है और अब जबकि घर की स्थिति थोड़ी ठीक होने लगी थी तो अन्ना हजारे को महसूस हुआ कि वे नौजवान हैं और अच्छा पैसा कमा लेते हैं, इसलिए उन्होंने वह सब शुरू किया जो आमतौर पर कोई भी नौजवान करता पाया जाता है। किशन हजारे किशन दादा हो गया। किसी के ऊपर जुल्म हो रहा हो या कोई परेशान हो तो किशन हजारे उसकी मदद में मारपीट करने के लिए हमेशा तैयार रहता था। अपनी इसी आदत के चलते उसकी छवि गली के गुंडे की बन गई और वह बदनाम होने लगा। इधर किशन की गुंडागर्दी बढ़ी तो उधर पारिवारिक स्थिति एक बार फिर खराब होने लगी। इसी बीच 1962 में भारत-चीन के बीच युद्ध हुआ और केंद्र सरकार ने नौजवानों से अपील की कि वे ज्यादा से ज्यादा संख्या में सेना में शामिल हों। इसी से प्रभावित होकर अप्रैल 1963 में किशन हजारे सेना में बतौर सैनिक नौकरी करने चला गया।

सेना में करीब 15 सालों तक काम के दौरान किशन हजारे ने सिक्किम, असम, जम्मू कश्मीर, मिजोरम, लेह और लद्दाख में पोस्टेड रहे। सेना की सेवा में रहते हुए उन्होंने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी हिस्सा लिया। 1965 के भारत-पाक युद्ध में किशन हजारे खेमकरन बार्डर पर तैनात थे। भीषण युद्ध और गोलाबारी के बीच उनके सभी साथी मारे गए। एक गोली उनके कान के पास से होकर गुजरी, लेकिन वे जीवित बच गए और ट्रक लेकर वापस लौट आए। इसके बाद 1970 में भी एक बार ट्रक का भीषण एक्सीडेंट हुआ, लेकिन उसमें भी वे जीवित बच गए। कुंआरे किशन हजारे के लिए सेना की नौकरी बहुत रास नहीं आ रही थी। वे तनावग्रस्त थे और समझ नहीं पा रहे थे कि जीवन में आगे करना क्या है। तनाव के इसी दौर में उन्होंने एक बार आत्महत्या करने की भी कोशिश की और दो पन्ने का एक सुसाइड नोट भी लिखा, जिसमें उन्होंने लिखा था कि उन्हें अब जिंदगी रास नहीं आ रही है, वे अब जीना नहीं चाहते हैं। लेकिन इसी बीच एक बार नई दिल्ली से गुजरते हुए उन्होंने स्टेशन पर एक बुकस्टाल पर स्वामी विवेकानंद की किताबें देखीं। अभी सेना में तीन साल की नौकरी ही बीती थी कि विवेकानंद की किताबों ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। अन्ना हजारे ने कहा भी है कि उनके सभी सवालों के जवाब विवेकानंद की किताब में मिलने लगे। अब 26 वर्षीय अन्ना हजारे सेना की नौकरी छोड़कर मानवता की सेवा करना चाहते थे, लेकिन ऐसा करना तत्काल उनके लिए संभव नहीं था। सेना से पेंशनयुक्त स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए कम से कम 15 साल की नौकरी जरूरी होती है, इसलिए अगले 12 साल उन्होंने सेना में और नौकरी की। सेना में नौकरी करते हुए भी वे अपने गांव रालेगढ़ सिद्धी आते रहे और वहां की दशा देखकर व्यथित होते रहे। 15 साल पूरा होने के बाद उन्होंने सेना की नौकरी छोड़ दी और रालेगढ़ सिद्धी आ गए। जिस अहमदनगर जिले के पानेर तालुके में यह रालेगढ़ सिद्धी गांव है, वहां का सबसे बड़ा संकट पानी की कमी थी। कम बारिश के कारण खेती चौपट थी और किसानों की दुर्दशा थी। लेकिन इस दुर्दशा से बाहर आने के लिए खुद किसान ही कुछ करने की स्थिति में नहीं थे। शराब की भट्ठियों के सहारे यहां की अर्थव्यवस्था चल रही थी और खेती का संकट शराब में सराबोर होकर कम किया जा रहा|

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