Sunday, April 10, 2011

दो शताब्दी पुराना है सत्याग्रह का अमोघ अस्त्र


सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे का आमरण अनशन और काहिरा में तहरीर चौक पर हजारों लोगों के जमा होने जैसे अहिंसक आंदोलनों की शुरुआत आज से पूरे दो सौ वर्ष पूर्व 1811 में हुई थी जब धार्मिक नगरी बनारस के मेहनतकश मजदूरों और कारीगरों ने अपनी मांगें मनवाने के लिए सत्याग्रह का प्रयोग किया था। करीब सौ साल बाद महात्मा गांधी ने सत्याग्रह के इस नवीन हथियार का दक्षिण अफ्रीका में प्रयोग किया। बनारस सत्याग्रह अंग्रेज हुकूमत द्वारा नगरवासियों पर गृहकर लगाने के खिलाफ शुरू हुआ था। अधिकतर नगरवासी अपने मकानों और दुकानों पर ताला बंद कर शहर के बाहर जमा हो गए और अधिकारियों को दो टूक जवाब दिया कि जिसका मकान और दुकान हो उससे टैक्स लो। गांधीवादी विचारक और इतिहासकार धर्मपाल ने अपनी चर्चित पुस्तक भारतीय परंपरा में सविनय अवज्ञा में उल्लेख किया है कि सरकारी कारिंदों, पुलिसकर्मियों को नजर अंदाज करते हुए लाखों नगरवासियों ने जनवरी-फरवरी 1811 में धरना-प्रदर्शन और हड़ताल जारी रखी। आंदोलनकारियों की एकता, विरोध के नित नए तरीकों और उनकी निर्भीकता से हुकूमत सकते में आ गई। बनारस के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट डब्लूडब्लू बर्ड ने कोलकाता में गवर्नर जनरल और लखनऊ में ब्रिटिश सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जे. मैक्डोनाल्ड को शहर की विस्फोटक स्थिति के बारे में आपात संदेश भेजे। बर्ड ने अपने पत्र में लिखा कि 25 दिसम्बर 1810 को जैसे ही बनारस के लोगों को गृहकर लगाने के फैसले की जानकारी मिली, शहर में उत्तेजना फैल गई। लोगों ने शहर के बाहर बड़ी सभा कर ऐलान किया कि वह किसी कीमत पर टैक्स अदा नहीं करेंगे।

बर्ड ने जनवरी 1811 में कोलकाता भेजे गए अपने पत्र में कहा कि लोगों ने अपनी दुकानें बंद कर दी हैं, जुलाहों के करघे ठप हैं, लोहारों ने औजार बनाना बंद कर दिया है, दर्जी कपड़े नहीं सिल रहे हैं, नाई हजामत नहीं बना रहे हैं तथा मल्लाहों ने नावों को किनारे बांध दिया है। डोम भी शव नहीं जला रहे हैं, पुजारियों ने पूजा-पाठ बंद कर रखा है और शहरी जीवन पूरी तरह से ठप हो चुका है। अंग्रेज कलेक्टर और पुलिस कप्तान ने आंदोलन को ठंडा करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद के अपनाए लेकिन लोग अपनी इस मांग पर कायम रहे कि गृहकर वापस लिए जाने तक वह अपने घरों में नहीं लौटेंगे। फिरंगी अधिकारी इस मुगालते में थे कि कारोबार बंद होने पर लोग खुद ही आíथक दिक्कतों से परेशान होकर आंदोलन खत्म कर देंगे। सबसे पहले तो दिहाड़ी मजदूर आंदोलन छोड़ेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। शहर के बाहर जमा आंदोलनकारियों ने दिहाड़ी मजदूरों और जरूरतमंद लोगों की आर्थिक मदद के लिए एक कोष स्थापित कर लिया। सत्याग्रह में शामिल नहीं होने वालों को जाति से बहिष्कृत कर दिया गया। वर्ष 2011 में अरब जगत के आंदोलनकारी जहां इंटरनेट, फेसबुक और ट्विटर का इस्तेमाल कर आंदोलनों की भूमिका बखूबी तैयार कर रहे हैं जबकि बनारस के लोगों ने सूचना आदान-प्रदान करने के लिए धर्मपत्री का सहारा लिया था। धर्मपत्री में आंदोलन का ब्योरा था। दूरदराज के लोगों से समर्थन देने के लिए अपील की गई थी। अंग्रेज अधिकारियों को आशंका थी कि बनारस से इस विद्रोह की चिनगारी दावानल का रूप लेकर पूरे भारत में पांव पसारने में लगी तो हुकूमत को भस्म कर सकती है। कलेक्टर बर्ड ने अपने एक पत्र में हैरानी जताई थी कि आंदोलन में हर जाति, हर पेशे और हर मजहब के लोग शामिल हैं। ब्राह्मण और मौलवी लोगों को शपथ दिला रहे हैं कि वे गृहकर खत्म होने तक अपना आंदोलन जारी रखेंगे। इस कर के खिलाफ लोगों का विरोध धनराशि नहीं बल्कि इस सिद्धांत पर आधारित था कि हमारी वस्तु पर टैक्स लगाने का अधिकार किसी विदेशी सरकार को नहीं दिया जा सकता है। एक समय ऐसा आया जब अधिकारियों ने सेना के बलबूते आंदोलन को कुचलने का फैसला किया। मेजर जनरल मैक्डोनाल्ड ने सैनिक टुकड़ियों को लखनऊ से बनारस मार्च करने का आदेश दिया। ऐन मौके पर फिरंगी अधिकारियों को सद्बुद्धि आई और उन्होंने बनारस के राजा उदित नारायण सिंह और समाज के अन्य प्रतिष्ठित लोगों की मदद ली। फिर भी उसे नगर के धार्मिक मठों और मंदिरों, पुजारियों और समाज के गरीब तबकों को कर के दायरे से बाहर करने की घोषणा करनी पड़ी। उसने टैक्स संबंधी फैसले की समीक्षा करने के लिए एक जनयाचिका गवर्नर जनरल के पास भेजी। बनारस के राजा का शहर के लोगों में बहुत सम्मान था तथा उन्हें अभिभावक का दर्जा हासिल था। राजा ने लोगों से आग्रह किया कि दो महीने तक चला उनका आंदोलन सफल रहा है तथा इसे अब खत्म किया जाए। उन्होंने गृहकर में की गई कटौती को एक अच्छा कदम बताया। उन्होंने कहा कि जनता ने अपनी ताकत दिखा दी है। सरकार को अंतत: ये कर वापस लेना पड़ेगा। उनके साथ ही शहर क प्रतिष्ठित नागरिकों के समझाने-बुझाने पर लोगों ने अपना आंदोलन खत्म किया तथा अपने घर वापस लौट गए। उनके राजा की भविष्यवाणी सही सिद्ध हुई तथा सरकार ने दिसम्बर 2011 में गृहकर को रद्द कर दिया।

No comments:

Post a Comment