Tuesday, April 5, 2011

वंचित वर्ग की राजनीतिक आवाज


बाबू जगजीवन राम की जयंती पर वंचित एवं शोषित वर्ग के हित के लिए उनके योगदान का स्मरण कर रहे हैं लेखक
बाबू जगजीवन राम का जीवन एक ऐसे व्यक्ति का जीवन है जिसने कभी अन्याय से समझौता नहीं किया। वह जीवनपर्यत दलितों व दबे-कुचले वगरें के सम्मान के लिए संघर्ष करते रहे। छात्र जीवन से ही उन्होंने अन्याय के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी थी। बाबू जगजीवन राम के जीवन के कई पहलू हैं। उनमें से ही एक है भारत में संसदीय लोकतंत्र के विकास में उनका अमूल्य योगदान। 28 साल की उम्र में ही 1936 में उन्हें बिहार विधान परिषद् का सदस्य नामांकित कर दिया गया था। जब गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के तहत 1937 में चुनाव हुए तो बाबूजी डिप्रेस्ड क्लास लीग के उम्मीदवार के रूप में निर्विरोध एमएलए चुने गए। अंग्रेज बिहार में अपनी पिट्ठू सरकार बनाने के प्रयास में थे। उनकी कोशिश थी कि जगजीवन राम को लालच देकर अपने साथ मिला लिया जाए। उन्हें मंत्री पद और पैसे का लालच दिया गया, लेकिन जगजीवन राम ने अंग्रेजों का साथ देने से साफ इनकार कर दिया। उसके बाद ही बिहार में कांग्रेस की सरकार बनी, जिसमें वह मंत्री बने। बाद में वह महात्मा गांधी सिविल नाफरमानी आंदोलन में जेल गए। जब मुंबई में 9 अगस्त, 1942 को महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की तो जगजीवन राम वहीं थे। तय योजना के अनुसार उन्हें बिहार में आंदोलन को तेज करना था, लेकिन दस दिन बाद ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अंतरिम सरकार में जब बारह लोगों को लॉर्ड वॉवेल की कैबिनेट में शामिल होने के लिए बुलाया गया तो उसमें बाबू जगजीवन राम भी थे। उनको श्रम विभाग का जिम्मा दिया गया। इसी दौर में उन्होंने कुछ ऐसे कानून बनाए जो भारत के इतिहास में आम आदमी, मजदूरों और दबे-कुचले वगरें के हित की दिशा में मील का पत्थर माने जाते हैं। उन्होंने मिनिमम वेजेज एक्ट, इंडस्टि्रयल डिस्प्यूट्स एक्ट और ट्रेड यूनियन एक्ट लागू कराए, जिन्हें मजदूरों के हित में सबसे बड़े हथियार के रूप में आज भी इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने इम्प्लाइज स्टेट इंश्योरेंस एक्ट और प्राविडेंट फंड एक्ट भी बनवाया। कल्पना कीजिए अगर बाबूजी ने इन कानूनों को न बनाया होता तो आज मजदूरों और कर्मचारियों की कितनी दुर्दशा होती। भारत की संसद को बाबू जगजीवन राम अपना दूसरा घर मानते थे। मंत्री के रूप में जगजीवन राम को जो भी काम मिला, उसे बहुत ही अच्छी तरह से निभाया। 1952 के चुनाव के बाद उन्हें नेहरूजी ने संचार मंत्री बनाया। उन दिनों संचार मत्रालय में ही विमानन विभाग भी शामिल था। उन्होंने निजी विमानन कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया और गांव-गांव तक डाकखानों का नेटवर्क विकसित किया। बाद में जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें रेल मंत्री बनाया। उन्हीं के कार्यकाल में रेलवे के आधुनिकीकरण की बुनियाद पड़ी और रेलवे कर्मचारियों के लिए बहुत सी कल्याणकारी योजनाएं शुरू की गईं। पद की लालसा उन्हें बिलकुल नहीं थी, इसलिए जब कामराज योजना आई तो उन्होंने सबसे पहले सरकार से अलग होकर संगठन का काम शुरू किया। जब लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री पद संभाला तो बाबूजी को एक अति कुशल प्रशासक के रूप में अपने साथ लिया। यह भारत के लिए निश्चित रूप से कठिन दौर था। 1962 में चीन और 1965 में पाकिस्तान से लड़ाई हो चुकी थी। गरीब आदमी और किसान भुखमरी के कगार पर खड़ा था। अमेरिका से पीएल-480 के तहत सहायता में मिलने वाला गेहूं और ज्वार ही भूख मिटाने का मुख्य साधन बन चुका था। ऐसी विकट परिस्थिति में डॉ. नॉरमन बोरलाग भारत आए और हरितक्रांति का सूत्रपात किया। नई सोच और आधुनिक तकनीक के पक्षधर बाबू जगजीवन राम उस समय कृषि मंत्री थे। उन्होंने ही डॉ. नॉरमन बोरलाग के हरित क्रांति के विचार को कार्यान्वित करने में पूरा राजनीतिक समर्थन दिया। भारत में दो-ढाई साल में ही हालात बदल गए और देश की जरूरत से अधिक खाद्यान्न पैदा होने लगा। भारत में हरित क्रांति के लिए तकनीकी मदद तो निश्चित रूप से डॉ. नॉरमन बोरलाग से मिली, लेकिन भारत के कृषि मंत्री बाबू जगजीवन राम ने जबरदस्त राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करते हुए हरित क्रांति के लिए जरूरी प्रशासनिक इंतजाम किया। डा. बोरलाग का अविष्कार था बौना गेहूं और धान, जिसने भारत और पाकिस्तान में भुखमरी की समस्या को हमेशा के लिए खत्म कर दिया। बाद में चीन ने भी इस प्रौद्योगिकी का फायदा उठाया। भूख की समस्या को उन्होंने बहुत ही सूझ-बूझ से परास्त किया। 1971 की भारत-पाकिस्तान जंग में बाबूजी ने जिस तरह से अपनी सेनाओं के लिए राजनीतिक समर्थन जुटाया, वह सैन्य इतिहास में मिसाल बन गया है। बाद में भी जब इंदिरा गांधी का सबसे बुरा दौर था, कांग्रेस के पुराने नेता उनका साथ छोड़ चुके थे, तो बाबू जगजीवन राम ने उनके साथ खड़े होकर उन्हें मजबूती दी थी, लेकिन उन्होंने कभी भी लोकतांत्रिक मूल्यों से समझौता नहीं किया। वह सच्चे अर्थो में भारत निर्माता थे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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