बैसाखी जनजीवन से जुड़ा हुआ ऐसा त्योहार है जिसका सीधा सम्बन्ध कृषि से है। इसलिए यह सभी वगरें, जातियों और धर्मों के मध्य बड़े उत्साह से मनाया जाता है। किंतु सिखों के लिए इसका विशेष महत्व है। तीन सौ वर्ष पूर्व इसी दिन गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ सृजन किया था। सिख आंदोलन इससे दो सौ वर्ष पूर्व गुरु नानक देव द्वारा प्रारभ्भ किया जा चुका था। वह आंदोलन अपने मूलरूप में भक्तिपरक था। किंतु गुरु गोबिंद सिंह का खालसा पंथ अपने अंदर तत्कालीन राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सरोकारों को भी समाए हुआ था। एक ओर यह एकेश्वरवाद से जुड़ा हुआ था, दूसरी ओर मानवीय समता, सामाजिक विषमता, छुआछूत, ऊंच-नीच के साथ गहरा सरोकार व्यक्त करता था और सत्ता के अन्याय तथा अत्याचार के विरुद्ध लोगों को जागृत करने वाला भी था। गुरु गोबिंद सिंह से लगभग 100 वर्ष पूर्व ही इस आंदोलन का टकराव अपने समय की सत्ता से प्रारभ्भ हो गया था। इसी कारण पांचवें गुरु अजरुन देव को सन् 1606 में मुग़ल बादशाह जहाँगीर द्वारा और नौवें गुरु तेग़ बहादुर को सन् 1675 में औरंगजेब द्वारा शहीद किया था। छठे गुरु हरिगोबिंद ने शाहजहाँ की सेना के साथ सशस्त्र टक्कर भी ली थी। दसवें गुरु गोबिंद सिंह ने अनुभव किया कि दो सौ वर्ष पूर्व स्थापित इस परम्परा को नया स्वरूप देने की आवश्यकता है। उनके दादा गुरु हरिगोबिंद इस स्वरूप परिवर्तन की नींव रख चुके थे। बैसाखी 1699 के दिन, शिवालिक की पहाड़ियों के मध्य अपने पिता गुरु तेग़बहादुर जी द्वारा बसाए नगर आनन्दपुर में सम्पूर्ण देश में फैले अपने अनुयायियों का उन्होंने एक विशाल सम्मेलन बुलाया। उस सम्मेलन में उन्होंने देश और धर्म की रक्षा के लिए कुछ सिर आमंत्रित किए। उनके आह्वान पर पाँच लोग सामने आए, जिन्हें पंच प्यारे कहकर समादृत किया गया। उस दिन गुरु गोबिंद सिंह ने अपने अनुयायियों को नया गणवेश और नाम दिए। उन्हें धर्म युद्ध करने के लिए तैयार किया। सबसे बड़ा काम यह किया कि युद्ध के प्रति उनमें गहरी आस्था उत्पन्न की। इस देश में प्राचीन काल से ही विजयादशमी के दिन, शस्त्र पूजा की परम्परा है। ऐसी पूजा केवल क्षत्रिय जाति ही करती रही हैं, जिनकी संख्या कभी भी दस प्रतिशत से अधिक नहीं रही। शेष जनता सदैव शस्त्रविहीन रही। परिणाम यह हुआ कि जब कभी सशस्त्र विदेशी आक्रमणकारी इस देश में आए, उनका सामना कुछ क्षत्रिय जातियों ने तो किया, अधिसंख्य जनता उससे निर्लिप्त रही। उसने अत्याचार सहे, बड़ी संख्या में उनका संहार भी हुआ। वे बड़े निरीह भाव से सब कुछ सहते रहे और अपना सिर कटाते रहे। गुरु गोबिंद सिंह ने इस देश को युद्ध का पूरा दर्शन दिया। युद्ध कर्म के लिए केवल क्षत्रियों पर निर्भरता समाप्त कर दी। उन्होंने इस कार्य के लिए प्रशिक्षण देने का कार्य उन पिछड़ी और दलित जातियों के लिए भी किया, जिन्होंने अपने जीवन में कभी तलवार नहीं उठाई थी। कभी समाज में कोई विशिष्ट स्थान प्राप्त करने की कभी कल्पना भी नहीं की थी। इस दृष्टि से ज्ञानी ज्ञान सिंह द्वारा रचित 'पंथ प्रकाश' की ये पंक्तियाँ ध्यान देने योग्य हैं-जिनकी जाति और कुल माही/सरदारी नहि भई कदाही और तिनको मै सरदार बनाऊं/तबै गोबिंद सिंह नाम धराऊ। पिछड़े, दलितों और निरीह जनों की, जो सदियों से उपेक्षा और अन्याय की चक्की में पिस रहे थे, गुरु गोबिंद सिंह ने दुज्रेय सैनिकों के रूप में परिवर्तित कर दिया जो अपने समय की संसार को सबसे बड़ी और शक्तिशाली सत्ता से टक्कर लेने लगे। इस कार्य के लिए उन्होंने शस्त्रों की महत्ता पर पूरी तरह बल दिया। इस देश में शस्त्र पूजा तो होती थी, किन्तु कुछ लोगों को छोड़कर शस्त्र सामान्य जनता के जीवन का अनिवार्य हिस्सा नहीं थे। मुग़ल शासन में, राजपूतों को छोड़कर किसी हिन्दू को न शस्त्र धारण करने की अनुमति थी, न धोड़े पर चढ़ने की। गुरु गोबिंद सिंह ने इन दोनों कायरें के लिए अपने शिष्यों को प्रेरित किया। उनके पूर्व की नानक मार्गी भक्ति धारा में परमात्मा के लिए वैष्णव मार्गी नामों का ही अधिक प्रयोग होता था।राम,हरि,गोबिंद,गोपाल,मुरारी,सारंगपाणि जैसे परमात्माबोधक नाम गुरुवाणी में असंख्य बार प्रयुक्त हुए हैं। गुरु गोबिंद सिंह ने अनेक पद ऐसे भी लिखे जिनमें इस प्रकार के नामों का प्रयोग किया गया है। वे अनुयायियों में वीर रस का संचार करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने परमात्माबोधक ऐसे नामों को चुना और सृजन किया जो इस उद्देश्य की पूर्ति में सहायक हो सकते थे। इस दृष्टि से काल उनका सबसे प्रिय नाम था। उन्होंने अपने साहित्य में परमात्मा के लिए काल, अकाल, महाकाल, सर्वकाल आदि का उल्लेख किया। काल का वर्णन करते हुए उसके साकार रूप की कल्पना भी उनके सम्मुख अनायास आ गई। इस साकार रूप में काल का अस्त्र-शस्त्र धारी रूप ही उनके सम्मुख प्रमुख रूप से रहा। परमात्मा को उन्होंने खड्गपाणि, कृपाणपाणि, वाणपाणि, दण्डधारी, चक्रपाणि, असिपाणि, असिधुज (ध्वज) खड्गकेतु आदि अनेक शस्त्रधारी नामों से पुकारा। शस्त्रों और ईश्वर के वीर रूप के प्रति उनकी तन्मयता इतनी बढ़ी कि उनकी दृष्टि में शस्त्र और शस्त्रधारी में कोई अंतर न रहा। स्वयं खड्ग ही खड्गधारी का प्रतीक बन गया। वे अपने ग्रंथ विचित्र नाटक का प्रारभ्भ वे खड्ग की स्तुति से करते हैं-नमसकार स्री खड्ग कउ करौ सु हितु चितु लाई/पूरन करौ गिरन्थ इह तुम मुहि करहु सहाई। यहां यह बात ध्यान देने की है कि इस देश में अपने ग्रंथ की सकुशल सम्पूर्णता के लिए कविगण सरस्वती देवी से याचना करते रहे है, किंतु गुरु गोबिंद सिंह ने यह याचना श्री खड्ग से की। उनकी दृष्टि में शस्त्र और शस्त्रधारी अभेद्य हैं। काल से समान ही ये शस्त्र भी सदा एक रूप है, निर्विकार है-नमो खड्ग खंड कृपाणं कटारं। सदा एक रुपं सदा निरविकारं। इस प्रकार वे अपने तीर, तुफंग, तलवार, गदा, सैहथी आदि शस्त्रों को नमस्कार करते हैं-नमस्कारयं मोर तीरं तुफंगं। नमो खंग खड़ंग अभेयं अभंगं। गदायं, ग्रिस्टं नमो सेहथीअं। जिनै तुल्य बीरं बीयो न बोअं। गुरु गोबिंद सिंह केवल यही नहीं चाहते थे कि लोग आत्मरक्षा और अन्याय का सामना करने के लिए शस्त्र धारण करें। वे जानते थे कि शत्रु के सम्मुख उसका सामना करने के लिए तलवार उठाकर आ जाने मात्र से काम नहीं चलता। उन्होंने जिस युद्ध दर्शन का विकास किया था उससे शस्त्रधारी को मानसिकता में आमूल परिवर्तन बहुत आवश्यक था। गुरु गोबिंद सिंह ने शस्त्रों को परमात्मा का रूप दिया और सदा उसकी शक्ति को स्मरण रखने की बात की। एक स्थान पर उन्होंने कहा है कि मेरे शस्त्र ही मेरे इष्ट देव है-अरु कृपान खंडो खड्ग तुपक तबर अरु तीर। सैफ सिरोही सैहथी वहै हमारे पीर। उनकी दृष्टि में काल, काली, तेग़ और तीर में कोई अंतर नहीं है-काल तुही काली तुही,तुही तेग अरु तीर। तुही निसानी जीत की आजु तुही जगबीर। गुरु गोबिंद सिंह ने लोगों को शस्त्रधारी होने के लिए कहा और समय आने पर शस्त्रों का उपयोग करने की प्रेरणा दी। उन्होंने जो पत्र औरंगजेब को लिखा था उसमें भी यह कहा था कि जब नीति के सभी साधन असफल हो जाएँ तो तलवार उठा लेना पूरी तरह उचित है। किन्तु शस्त्र उठाने का एक महत् उद्देश्य होना चाहिए। यह उद्देश्य है सत्पुरुषों, साधुजनों की रक्षा और अत्याचारी का विनाश करना। यदि ऐसा नहीं होगा शस्त्रधारी व्यक्ति स्वयं अन्यायी और अत्याचारी बन जाएगा। यह बड़ी घातक स्थिति होगी। खड्ग की स्तुति करते हुए गुरु गोबिंद सिंह का एक प्रसिद्ध छंद है-खग खंड बिहंडं खल दल खंडन अति रण मंडं बर बंडं/ भुंज दंड अखंडं तेज प्रचंडं जोति अमंडं भानु प्रभंगं/ सुख संता करणं दुरमति दरणं किल बिख हरणं असि सरगं/जै जै जग कारण सृष्टि उबारणं मम प्रति पालंग जै तंग। बैसाखी के दिन खालसा के रूप में उन्होंने एक नए व्यक्ति का सृजन किया। इस देश में विदेशी आक्रमणकारियों को आए और अपना शासन स्थापित किए सात सौ वर्ष से अधिक हो गए थे। इन आक्रमणकारियों के हाथों जनता बुरी तरह पीड़ित थी। निर्बल, निरीह और निरुपाय जनता के सम्मुख भगवान के अतिरिक्त कोई सहारा नहीं था। गुरु गोबिंद सिंह ने उनके पस्त और निरुपाय जीवन में नवजीवन का संचार किया। एक नए युग का सूत्रपात किया।
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