भगत सिंह की शहादत पर लेखक के विचार
भगत सिंह, राजगुरु और उनके साथियों ने सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने का विचार कोलकाता में तब बनाया था जब वे लाहौर में शेर-ए-पंजाब लाला लाजपत राय पर लाठियां बरसाने वाले अंग्रेज अफसरों को सबक सिखा कर गुपचुप रूप से इस शहर आए थे। इसके लिए अवसर भी शीघ्र ही मिल गया। केंद्रीय असेंबली में दो बिल पेश होने वाले थे-जन सुरक्षा बिल और औद्योगिक विवाद बिल जिनका उद्देश्य देश में उठते युवक आंदोलन को कुचलना और मजदूरों को हड़ताल के अधिकार से वंचित रखना था। भगत सिंह और आजाद के नेतृत्व में क्रांतिकारियों की मीटिंग में यह फैसला किया गया कि 8 अपै्रल 1929 को जिस समय वायसराय असेंबली में इन दोनों प्रस्तावों को कानून बनाने की घोषणा करें तभी बम धमाका किया जाए। इसके लिए बटुकेश्र्वर दत्त और विजय कुमार सिन्हा को चुना गया, किंतु बाद में भगत सिंह ने यह कार्य दत्त के साथ स्वयं करने का ही निर्णय लिया। ठीक उसी समय जब वायसराय जनविरोधी, भारत विरोधी प्रस्तावों को कानून बनाने की घोषणा करने के लिए उठे, दत्त और भगत सिंह भी खड़े हो गए। पहला बम भगत सिंह ने और दूसरा दत्त ने फेंका और इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाया। वहां खलबली मच गई, जॉर्ज शुस्टर टेबल के नीचे छिप गया। सार्जेंट टेरी इतना भयभीत था कि वह इन दोनों को गिरफ्तार नहीं कर पाया। दत्त और भगत सिंह आसानी से भाग सकते थे, लेकिन वे स्वेच्छा से बंदी बने। उन्हें दिल्ली जेल में रखा गया और वहीं मुकदमा भी चला। इसके बाद दोनों को लाहौर ले जाया गया, पर भगत सिंह को मियांवाली जेल में रखा गया। लाहौर में सांडर्स की हत्या, असेंबली में बम धमाका आदि केस चले और 7 अक्टूबर 1930 को ट्रिब्यूनल का फैसला जेल में पहुंचा। इसके अनुसार, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी, कमलनाथ तिवारी, विजय कुमार सिन्हा, जयदेव कपूर, शिव वर्मा, गया प्रसाद, किशोरी लाल और महावीर सिंह को आजीवन, कुंदनलाल को सात तथा प्रेमदत्त को तीन साल का कठोर कारावास। यह समाचार जेल से बाहर पहुंचते ही इस निर्णय के विरोध में पूरे देश में आंदोलन प्रारंभ हो गए। गांधी जी लार्ड इरविन के साथ वार्ता में भी यह फैसला न बदलवा सके। 23 मार्च 1931 को भारत मां के ये तीनों बेटे बलिदान हो गए। इन्हें संध्या के समय फांसी दी गई, क्योंकि निश्चित तिथि 24 मार्च की प्रात:काल तक जनाक्रोश सहने की हिम्मत अंग्रेज शासकों में नहीं थी। मौत से मिलते हुए भी भगत सिंह ने अंग्रेज मजिस्ट्रेट से कहा कि आप भाग्यशाली हैं कि आज आप अपनी आंखों से यह देखने का अवसर पा रहे हैं कि भारत के क्रांतिकारी किस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक अपने सर्वाेच्च आदर्श के लिए मृत्यु का आलिंगन कर सकते हैं। संध्या के आधे अंधेरे में इन्हें फांसी पर लटकाया गया। आधी रात को ही सतलुज के किनारे उन्हें आधी अधूरी अग्नि दी गई और जब 24 मार्च के सूर्य के साथ ही देशभक्त जनता वहां पहुंची तो वहां मिली अधजले शरीर और अस्थियां। देश के दीवाने उस राख को ही सिर पर लगाते ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेने लगे। इन क्रांतिकारियों द्वारा गाया गया गीत-मेरा रंग दे बसंती चोला जन जन का कंठहार बन गया। भौतिक सुखों की होड़ में दीवाने देश के कितने नेता और देशवासी यह याद रख पाए हैं कि भारत के लाखों बेटे-बेटियां अपने सांसारिक सुख स्वप्नों को अपने हाथों से आग लगाकर देश की आजादी के परवाने बने थे? सत्ता सुख भोगने वाले, शहीदी पर्व पर केवल भाषण देने वाले कितने नेता उस त्याग-तपस्या, कठोर यातनाओं, कोल्हू में बैल की तरह जुत कर भी आजादी के गीत गाने वालों की हिम्मत से परिचित हो सके हैं? आज की आवश्यकता यह है कि भारत की नई पीढ़ी को हम इन वीरों की शहादत से जोड़ सकें। भारत का कल इन बच्चों को ही तो संभालना है। (लेखिका पंजाब सरकार में मंत्री हैं)
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