सप्तक्रांति की अवधारणा में उनके विचार का सार तत्व है। सप्तक्रांति एक अवधारणा है। उसका उसी तरह शास्त्रीय महत्त्व है जैसे जेपी की ‘सम्पूर्ण क्रांति’ और दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ का। जो क्रांति घटित नहीं हो पाती वह अवधारणा में सिमट जाती है। उसका विचारक एक दार्शनिक की श्रेणी में पहुंच जाता है पर लोहिया दार्शनिक नहीं विशुद्ध राजनीतिक थे। उनकी सप्तक्रांति के घटित न होने के कई कारण हो सकते हैं
लोकसभा में 16 दिसम्बर-2009 को राजद के सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से पूछा-वर्ष 2010 में डॉ. राममनोहर लोहिया की जन्मशती स्मृति उत्सव आयोजित किये जाने हेतु की गई तैयारियों का ब्योरा क्या है? क्या इस सम्बंध में अनेक सांसदों ने सरकार को लिखित ज्ञापन दिया है?, यदि हां तो क्या सरकार ने डॉ. लोहिया के जन्मशती उत्सव को मनाने हेतु तैयारियां आरम्भ कर दी हैं? यदि हां तो तत्सम्बंधी ब्योरा क्या है? और यदि नहीं, तो इसके कारण क्या हैं? रघुवंश बाबू पहली यूपीए सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री थे पर उनके सवाल को प्रधानमंत्री ने इतना भी महत्त्व नहीं दिया कि वे खुद जवाब दें। उनके राज्यमंत्री वी. नारायण स्वामी ने जो जवाब दिया है, वह सरकार की मंशा समझने के लिए काफी है-‘जी, हां। अनेक सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित एक लिखित ज्ञापन सरकार को प्राप्त हुआ है। सरकार को मामले की जानकारी है।’
इस विवरण से और बातों के अलावा केंद्र सरकार का देश के महापुरुषों के बारे में नजरिया समझ में आ जाता है। सरकार के घर में महापुरुष वे सब नहीं हैं, जिन्हें लोग मानते हैं। वह पेटेंट के नियमों से चल रही है, जिनका पेटेंट नेहरू के जमाने में हो गया वे ही महापुरुष हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। आचार्य जे.बी. कृपलानी की जन्मशती पर एक सवाल के जवाब में कहा गया कि गुजरात सरकार को सूचित कर दिया गया है। मतलब वे राष्ट्र के नहीं, महज गुजरात के नेता थे। इसे गनीमत ही कहेंगे कि केंद्र सरकार ने उनकी जन्मशती के लिए पाकिस्तान के सिंध प्रांत को नहीं सूचित किया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जन्मशती के साथ जो खिलवाड़ वाजपेयी सरकार ने किया, वह कम निंदनीय नहीं है। इसके लिए बनी राष्ट्रीय समिति को मेनका गांधी के मंत्रालय के अधीन किये जाने पर विरोध हुआ, कई ने इस्तीफे दिये तो समिति को तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत के अधीन किया गया, जिसकी कभी बैठक ही नहीं हुई। जन्मशती समारोह तो हुए ही नहीं। चंद्रशेखर के दिलचस्पी लेने पर सिर्फ एक जलसा सिताब-दियरा में हुआ। ऐसे में हम मनमोहन सरकार से कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि वह डॉ. लोहिया की जन्मशती को एक राष्ट्रीय उत्सव में परिवर्तित कर दे? यह सिर्फ सरकार के राजनीतिक नेतृत्व का सवाल नहीं है बल्कि उसका अंधानुकरण करने वाली अफसरशाही का मन भी इसी तरह का बन गया है। वह भी महापुरुषों के साथ उसी तरह का भेदभाव कर रही है, जैसा उनके राजनीतिक आका चाहते हैं। पांच साल पहले अच्युत पटवर्धन की जन्मशती थी। क्या किसी को याद है कि ‘भारत छोड़ो’ क्रांति के सूत्रधार रहे उस नायक को भारत सरकार ने वह मान दिया, जिसके वे हकदार थे? उस समय तो अनेक समाजवादी यूपीए सरकार में मंत्री भी थे। लो
किंवदंती बन गए थे डॉ. लोहिया
डॉ लोहिया अपने छोटे से जीवन काल में ही किंवदंती बन गए थे। उनसे जितना तब सरकार डर से कांपती थी उतना आज भी कांप रही है। लोहिया के जीवनकाल में जो किंवदंती बनी थी, उनमें उनके पराक्रम के किस्से होते थे। उनकी तेजस्विता का वर्णन होता था और वे घटनाएं होती थीं जो मन को छू जाती थीं। लोहिया के जाने के बाद उसका स्वरूप बदला है पर चरित्र में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। किंवदंती में विविधता आई है। उनकी जीवनी, संस्मरण, रचनावली और लोकसभा में भाषणों की पुस्तक आई है, जिसने किंवदंती को लिखित साहित्य का पुष्ट आधार दे दिया है। डॉ. लोहिया के जीवन और राजनीति को छात्र युवा आंदोलन के मद्देनजर जितनी बारीकी से देखा जाना चाहिए था वह नहीं हुआ है। अनिल राजीमवाले की किताब में दो जगह जिक्र है। पहली बार एक जगह सूचना है कि 1939 की गर्मी में महात्मा गांधी से मिलने युसुफ मेहरअली, लोहिया, अच्युत पटवर्धन, नरेन्द्रदेव और एसएम जोशी गए। युद्ध की परिस्थितियों पर वे अपनी बात गांधी को बताना चाहते थे कि यही समय है जब स्वाधीनता संग्राम को तेज करना चाहिए। इसके विपरीत कांग्रेस नेतृत्व दुविधा में पड़ा हुआ है। दूसरे जिक्र से यह जानकारी मिलती है कि 1942 में जब बड़े-बड़े नेता जेल में थे तब युवा समूह को नेतृत्व देने और भूमिगत आंदोलन को चलाने की कमान लोहिया और उनकी जमात ने सम्भाली।
विद्रोह ने समझदारी का रास्ता बनाया
उस जमात में डॉ. लोहिया अकेले ऐसे नेता थे जो अपने बचपन से ही छात्र राजनीति में रचे-बसे थे। उन्होंने 12 साल की अवस्था में ही मुम्बई के मारवाड़ी माध्यमिक विद्यालय के छात्रों को असहयोग आंदोलन के लिए सड़क पर उतार दिया था। उसी विद्यालय परिसर में ऑल इंडिया कॉलेज स्टूडेंट्स कान्फ्रेंस की नींव पड़ी थी। असहयोग आंदोलन में गांधी जी के आह्वान पर एक साल के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी। कांग्रेस के गुवाहाटी अधिवेशन में वे गए तो थे तमाशा देखने लेकिन बन गए प्रतिनिधि और उस छोटी उम्र में भी उन्हें बोलने का मौका मिला। बाद में साइमन कमीशन के बहिष्कार की अपील को भी उन्होंने छात्रों में पहुंचाया। लोहिया के बारे में एक सोच बनाई गई है कि वह विद्रोही स्वभाव के थे। इस पर पुनर्विचार की जरूरत है। हमेशा और हर अवस्था में विद्रोह को अनुचित नहीं ठहराया जा सकता। विद्रोह समय का तकाजा भी होता है और यह स्थापित व्यवस्था के प्रति होता है। उससे जो सार्थक बदलाव होता है, वह नव रचना को जन्म देता है। उसकी ही छटपटाहट लोहिया में पाई जाती थी। जो भी इस प्रक्रिया से गुजरता है, वह अपने अनुभव से एक मार्ग बनाता है, जिस पर लोग चलते हैं। विद्रोह का भाव व्यक्ति के दृष्टिकोण और चिंतन से पैदा होता है। निषेधात्मक चिंतन वह भावभूमि होती है, जहां विद्रोह का बीज अंकुरित होता है। न जाने क्यों यह प्रथा बन गई है कि निषेधात्मक चिंतन को सराहा नहीं जाता, बल्कि उसकी निंदा की जाती है। जे. कृष्णमूर्ति कहते थे, निषेधात्मक चिंतन को निंदनीय नहीं माना जाना चाहिए। वह समझ का सर्वश्रेष्ठ रूप होता है।
पूंजीवाद नहीं, समाजवाद उपयोगी
डॉ. लोहिया ने आजादी की लड़ाई में और उसके बाद आजाद भारत में सच को खोजने के लिए निषेधात्मक नजरिया अपनाया। इससे वे जांच-परख और अनुसंधान कर सके। नहीं तो वे भी अनुकरण का रास्ता अपनाते। इसके विपरीत उन्होंने जो तरीका इस्तेमाल किया, उससे वे यह कह सके कि भारत के लिए न पूंजीवाद उपयोगी है और न साम्यवाद। तीसरा रास्ता खोजा जाना चाहिए, जिसे उन्होंने समाजवाद कहा। उसी के लिए जिए और जूझें। उनके विद्रोही स्वभाव का यही मर्म है। तभी वे जड़ता और अनुकरण को हिलाकर रख देते थे। कुंठा पर कठोर प्रहार करते थे, जिससे सत्ताधारी डांवाडोल हो जाते थे। लोहिया ने हर तरह की सत्ता पर प्रश्न चिह्न खड़े किए। वे यह सब स्वतंत्रता, समता और सार्थक लोकतंत्र की त्रयी को सच्चे अर्थो में स्थापित करने के लिए कर रहे थे। वे एक राजनीतिक पार्टी के नेता अवश्य थे पर औरों की तरह उसके कैदी नहीं थे। पार्टी उनका जरिया थी। देश, समाज, संस्कृति, राष्ट्रीयता और मानवता की बेहतरी उनकी मंजिल थी। वे लोक जीवन में रमे हुए थे। डॉ लोहिया ने जो-जो काम किये, जो-जो कहा और जैसा उनका प्रेरक जीवन रहा, उससे विचार की एक तरंग पैदा हुई। देश, समाज ने उन्हें संकट काल का नेता माना। युवा मन उनमें जादुई खिंचाव पाता था। हम जानते हैं कि विचार तरंग की कोई दिशा नहीं होती, सूरज की रोशनी की तरह उसका फैलाव होता है। सहज और चुपचाप। अनंत वतरुलाकार। लोहिया की राजनीति में ऐसी तरंग थी। वह उनकी अनुपस्थिति में भी बनी हुई है। कोई काल जब अनंत का हिस्सा हो जाता है तो ऐसा ही होता है। उनके प्रभाव में व्यक्ति, संस्था, संगठन और दल आते गए।
सप्तक्रांति के तत्त्व
जिस राजनीतिक नेता ने इतना व्यापक प्रभाव छोड़ा उनका रास्ता क्या था और क्या वह आज भी प्रासंगिक है? मधु लिमये को मानें तो सप्तक्रांति की अवधारणा में उनके विचार का सार तत्व है। सप्तक्रांति एक अवधारणा है। उसका उसी तरह शास्त्रीय महत्त्व है जैसे जेपी की ‘सम्पूर्ण क्रांति’ और दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ का। जो क्रांति घटित नहीं हो पाती वह अवधारणा में सिमट जाती है। उसका विचारकर एक दार्शनिक की श्रेणी में पहुंच जाता है। पर लोहिया दार्शनिक नहीं विशुद्ध राजनीतिक थे। उनकी सप्तक्रांति के घटित न होने के कई कारण हो सकते हैं। सत्ता का हाथ में न आना भी कारण हो सकता है। बुनियादी बात यह है कि डॉ. लोहिया ने राजनीति में जिस असम्भव को साधा और साकार किया वह क्या किसी विकल्प को खोलता है या नहीं? देखना यह चाहिए। नासिक (जिसमें कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का जन्म हुआ), पंचमढ़ी, हैदराबाद और वाराणसी के समाजवादी सम्मेलनों के ब्योरे में जाने पर जो बात दिमाग में दर्ज होती है कि समाजवादी आंदोलन जब-जब दुविधा में पड़ा और उसके नेताओं ने समझौते किये, उस समय साफ-साफ दिखता है कि अकेले डॉ. लोहिया ऐसे नेता निकले, जिन्होंने आदर्शवाद से कोई समझौता नहीं किया। उनमें एक जिद दिखाई पड़ती है, जो लड़ने के विचारों से भरी हुई होती है। वोट और सत्ता की राजनीति में समझौता न करने का उनका आग्रह अतुलनीय है। जब वक्त आया तो उन्होंने इस आग्रह को रूपांतरित कर दिया, बिना समझौता किए। लक्ष्य कांग्रेस का विकल्प बनाना था। उसके लिए साझा प्रयास जरूरी था, जिससे एक मंच बन सके। इसी प्रयास से गैर कांग्रेसवाद की लाइन निकली।