Thursday, March 24, 2011

आजादी के परवाने


भगत सिंह की शहादत पर लेखक के विचार
भगत सिंह, राजगुरु और उनके साथियों ने सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने का विचार कोलकाता में तब बनाया था जब वे लाहौर में शेर-ए-पंजाब लाला लाजपत राय पर लाठियां बरसाने वाले अंग्रेज अफसरों को सबक सिखा कर गुपचुप रूप से इस शहर आए थे। इसके लिए अवसर भी शीघ्र ही मिल गया। केंद्रीय असेंबली में दो बिल पेश होने वाले थे-जन सुरक्षा बिल और औद्योगिक विवाद बिल जिनका उद्देश्य देश में उठते युवक आंदोलन को कुचलना और मजदूरों को हड़ताल के अधिकार से वंचित रखना था। भगत सिंह और आजाद के नेतृत्व में क्रांतिकारियों की मीटिंग में यह फैसला किया गया कि 8 अपै्रल 1929 को जिस समय वायसराय असेंबली में इन दोनों प्रस्तावों को कानून बनाने की घोषणा करें तभी बम धमाका किया जाए। इसके लिए बटुकेश्र्वर दत्त और विजय कुमार सिन्हा को चुना गया, किंतु बाद में भगत सिंह ने यह कार्य दत्त के साथ स्वयं करने का ही निर्णय लिया। ठीक उसी समय जब वायसराय जनविरोधी, भारत विरोधी प्रस्तावों को कानून बनाने की घोषणा करने के लिए उठे, दत्त और भगत सिंह भी खड़े हो गए। पहला बम भगत सिंह ने और दूसरा दत्त ने फेंका और इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाया। वहां खलबली मच गई, जॉर्ज शुस्टर टेबल के नीचे छिप गया। सार्जेंट टेरी इतना भयभीत था कि वह इन दोनों को गिरफ्तार नहीं कर पाया। दत्त और भगत सिंह आसानी से भाग सकते थे, लेकिन वे स्वेच्छा से बंदी बने। उन्हें दिल्ली जेल में रखा गया और वहीं मुकदमा भी चला। इसके बाद दोनों को लाहौर ले जाया गया, पर भगत सिंह को मियांवाली जेल में रखा गया। लाहौर में सांडर्स की हत्या, असेंबली में बम धमाका आदि केस चले और 7 अक्टूबर 1930 को ट्रिब्यूनल का फैसला जेल में पहुंचा। इसके अनुसार, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी, कमलनाथ तिवारी, विजय कुमार सिन्हा, जयदेव कपूर, शिव वर्मा, गया प्रसाद, किशोरी लाल और महावीर सिंह को आजीवन, कुंदनलाल को सात तथा प्रेमदत्त को तीन साल का कठोर कारावास। यह समाचार जेल से बाहर पहुंचते ही इस निर्णय के विरोध में पूरे देश में आंदोलन प्रारंभ हो गए। गांधी जी लार्ड इरविन के साथ वार्ता में भी यह फैसला न बदलवा सके। 23 मार्च 1931 को भारत मां के ये तीनों बेटे बलिदान हो गए। इन्हें संध्या के समय फांसी दी गई, क्योंकि निश्चित तिथि 24 मार्च की प्रात:काल तक जनाक्रोश सहने की हिम्मत अंग्रेज शासकों में नहीं थी। मौत से मिलते हुए भी भगत सिंह ने अंग्रेज मजिस्ट्रेट से कहा कि आप भाग्यशाली हैं कि आज आप अपनी आंखों से यह देखने का अवसर पा रहे हैं कि भारत के क्रांतिकारी किस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक अपने सर्वाेच्च आदर्श के लिए मृत्यु का आलिंगन कर सकते हैं। संध्या के आधे अंधेरे में इन्हें फांसी पर लटकाया गया। आधी रात को ही सतलुज के किनारे उन्हें आधी अधूरी अग्नि दी गई और जब 24 मार्च के सूर्य के साथ ही देशभक्त जनता वहां पहुंची तो वहां मिली अधजले शरीर और अस्थियां। देश के दीवाने उस राख को ही सिर पर लगाते ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेने लगे। इन क्रांतिकारियों द्वारा गाया गया गीत-मेरा रंग दे बसंती चोला जन जन का कंठहार बन गया। भौतिक सुखों की होड़ में दीवाने देश के कितने नेता और देशवासी यह याद रख पाए हैं कि भारत के लाखों बेटे-बेटियां अपने सांसारिक सुख स्वप्नों को अपने हाथों से आग लगाकर देश की आजादी के परवाने बने थे? सत्ता सुख भोगने वाले, शहीदी पर्व पर केवल भाषण देने वाले कितने नेता उस त्याग-तपस्या, कठोर यातनाओं, कोल्हू में बैल की तरह जुत कर भी आजादी के गीत गाने वालों की हिम्मत से परिचित हो सके हैं? आज की आवश्यकता यह है कि भारत की नई पीढ़ी को हम इन वीरों की शहादत से जोड़ सकें। भारत का कल इन बच्चों को ही तो संभालना है। (लेखिका पंजाब सरकार में मंत्री हैं)

Wednesday, March 23, 2011

लोहिया का अंगरेजी विरोध


समाजवादी राजनीति के पुरोधा डॉ. राममनोहर लोहिया के भाषा संबंधी समस्त चिंतन और आंदोलन का लक्ष्य भारतीय सार्वजनिक जीवन से अंगरेजी के वर्चस्व को हटाना था। यहां दो बातें स्पष्ट कर देना जरूरी है। पहली यह कि लोहिया जब अंगरेजी हटाने की बात करते हैं, तो उसका मतलब हिंदी लाना नहीं है। दूसरी, अंगरेजी हटाने के नारे के पीछे लोहिया की एक खास समझदारी है।
लोहिया भारतीय जनता पर थोपी गई अंगरेजी के स्थान पर भारतीय भाषाओं को प्रतिष्ठा दिलाने के पक्षधर थे। 19 सितंबर 1962 को हैदराबाद में लोहिया ने कहा था, ‘अंगरेजी हटाओ का मतलब हिंदी लाओ नहीं होता। अंगरेजी हटाओ का मतलब होता है, तमिल या बांग्ला और इसी तरह अपनी-अपनी भाषाओं की प्रतिष्ठा।लोहिया को अंगरेजी भाषा मात्र से कोई आपत्ति नहीं थी। अंगरेजी के विपुल साहित्य के भी वह विरोधी नहीं थे, बल्कि विचार और शोध की भाषा के रूप में वह अंगरेजी का सम्मान करते थे। लोहिया की अंगरेजी से मूल आपत्ति सार्वजनिक जीवन में इस्तेमाल से है। इसके ठोस सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक कारण हैं। भाषा का सवाल उनके लिए पेट का सवाल है। वह पेट और दिमाग के सवालों को जुड़ा हुआ मानते थे। उनके अंगरेजी विरोध का मूल कारण है, भारतीय संदर्भ में अंगरेजी का सामंती भाषा होना।
दक्षिण के हिंदी-विरोधी उग्र आंदोलनों के दौर में लोहिया पूरे दक्षिण भारत में अंगरेजी के खिलाफ तथा हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं के पक्ष में आंदोलन कर रहे थे। अंगरेजी हटाने के संदर्भ में वह तमिल आदि हिंदी से इतर भाषाओं को लाने की बात अवश्य करते हैं, लेकिन विभिन्न कारणों से उनके लेखन में कहीं-कहीं भारतीय भाषाओं में से हिंदी को ही राजभाषा और राष्ट्रभाषा के पद पर बिठाने की इच्छा अनायास ही प्रकट हो जाती है। हिंदी के प्रति झुकाव की वजह से दक्षिण भारतीयों को लोहिया उत्तर और ब्राह्मण संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में दिखाई देते थे। दक्षिण भारत में उनके अंगरेजी हटाओके नारे का मतलब हिंदी लाओलिया जाता था। इस वजह से लोहिया को दक्षिण भारत में सभाएं करने में कई बार काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। मद्रास और कोयंबटूर में सभाओं के दौरान उन पर पत्थर तक फेंके गए। ऐसी घटनाओं के बीच हैदाराबाद लोहिया और सोशलिस्ट पार्टी की गतिविधियों का केंद्र बना रहा। अंगरेजी हटाओआंदोलन की कई महत्वपूर्ण बैठकें हैदराबाद में हुई।
अंगरेजी हटाने और हिंदी को एकमात्र राजभाषा बनाने के लिए संविधान में प्रावधान किया गया कि 15 साल तक हिंदी का विकास किया जाए और 1965 में अंगरेजी को हटा दिया जाए। लोहिया इस 15 साल की विकास की अवधि के एकदम खिलाफ थे। हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की क्षमता और समृद्धि के बारे में वह बार-बार कहते थे कि जैसे बिना पानी में उतरे तैरना सीखना असंभव है, उसी तरह बिना प्रयोग में लाए भारतीय भाषाओं की समृद्धि मुमकिन नहीं। लोहिया की स्पष्ट समझदारी थी कि जब तक अंगरेजी के साथ रुतबा जुड़ा हुआ है, भारतीय भाषाओं की समृद्धि संदिग्ध है।
जहां तक भाषा और विकास के संबंध की बात है, तो लोहिया अपने लेखन और भाषण में लगातार रेखांकित करते रहे कि विकास का किसी भाषा विशेष से कोई संबंध नहीं होता। वह रूस, चीन, फ्रांस आदि देशों का उदाहरण देकर बताते रहे कि इन तमाम देशों ने अपनी प्रगति बिना अंगरेजी ज्ञान के अपनी भाषाओं के जरिये की है। आज जापान, कोरिया और चीन जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं, जिन्होंने अपनी प्रगति अपनी भाषाओं में की है। वह कहते थे कि भाषा (अंगरेजी) ज्ञान के चक्कर में विद्यार्थी विषय ज्ञान में पारंगत नहीं हो पाते, इसलिए वे भाषा ज्ञान की तुलना में विषय ज्ञान को महत्व देते हैं। लोहिया कहते थे कि मौलिक चिंतन अपनी भाषा में ही संभव है, किसी विदेशी भाषा में नहीं। वह हिंदी को सारी संकीर्णताओं से निकालकर एक उदार भाषा बनाने के पक्षधर थे।
दुर्भाग्य की बात है कि आज भाषा ज्ञान के कुतर्क के खिलाफ विषय ज्ञान की महत्ता के लिए संघर्ष करने वाला कोई राममनोहर लोहिया हमारे बीच नेतृत्व करने के लिए नहीं है, इसलिए हम लड़ाई हार रहे हैं। जब तक हमारी मातृभाषाओं पर गहराते संकट के खिलाफ संघर्ष की जरूरत महसूस की जाती रहेगी, तब तक भाषा संबंधी उनके विचार प्रासंगिक रहेंगे।

राष्ट्रवादी समाजवाद का चितेरा


राजनीतिक मूल्यों के पतन के इस दौर में दोषपूर्ण व्यवस्था एवं अन्याय से लड़ने वालों के लिए राम मनोहर लोहिया का स्मरण उत्साहवर्धक होगा। मायावी प्रपंच से कोसो दूर रहे लोहिया ऐसे जननेता थे जो मानते थे कि भारत का भाग्योदय विदेशी आदर्शों और सिद्धांतों से नहीं, स्वदेशी आदर्शो और सिद्धांतों से ही संभव है। उन्होंने कहा था, असल में देश के हालात बिगड़ने का कारण है विदेशी सहायता, विदेशी नीति और वह विदेशी अंश जो हमारी राजनीति, बजट, रुपये-पैसे, खेती-कारखानों मे आ गया है। भारत तन और मन दोनों से अपना नहीं रह गया है, पराया बन गया है। वह साम्यवाद और पूंजीवाद दोनों के खिलाफ थे और समाज में सम्यक क्रांति लाने के पक्षधर थे। लोहिया का समाजवाद एक ऐसी व्यवस्था का नाम था, जिसके माध्यम से देश में समता और संपन्नता लाई और कायम की जा सके। उनका मानना था कि पूरी समता एक सपना है। जो सपना बिल्कुल नहीं देखते वे अवसरवादी हैं। जो सपना ही सपना देखते हैं वे यथार्थ से कटे सनकी बन जाते हैं। यथार्थवादी और आदर्शवान दिमाग की कोशिश होनी चाहिए कि अधिकाधिक समता को हासिल किया जाए। समता की सारी बातें निरर्थक होंगी जब तक पेट के सवालों के साथ-साथ मन के सवाल भी हल नहीं किए जाते। जनता की क्षमावृत्ति और सरकार की भोगवृत्ति के चलते समाजवाद नहीं आ सकता। आपातकाल के संबंध में उनके विचार आज भी उतने ही सटीक और प्रासंगिक हैं, आपातकाल की घोषणा 1962 में चीनी हमले के कारण की गई थी, लेकिन बाद में तो सरकार ने इसका दुरुपयोग अपने बचाव के लिए करना शुरू कर दिया। यह बात उन्होंने 1965 में कही थी जो उनकी मृत्यु के कई वर्षों बाद 1975 में लगाए गए आपातकाल की मानो भविष्यवाणी थी। कौन जानता है कि उनकी बात को सही साबित करने के लिए 2जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल, बोफोर्स जैसे घोटाले और जानलेवा महंगाई जैसे तमाम मुद्दे एक बार फिर आपातकाल को न्योता दे दें। देश में पंथनिरपेक्षता, शोषण तथा सामाजिक अन्याय को रोक पाने में असफल भारतीय संविधान से वह संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने कहा था, यह संविधान बनाया था गुलाम भारत के प्रतिनिधियों ने। संविधान को बनाने के लिए जो सभा बैठी थी उसे चुना था उन विधानसभाओं ने जो अंग्रेजों के जमाने में चुनी गई थीं। फिर ऐसा संविधान जनतंत्र की कहां तक स्थापना कर सकता है? 1947 में हुए देश विभाजन से लोहिया बहुत दुखी थे। विभाजन की जिम्मेदारी के संबंध में उन्होंने कहा था, देश के बंटवारे के लिए जितने दोषी जिन्ना, नेहरू और सरदार पटेल थे उतने गांधीजी नहीं थे, लेकिन दूसरे नंबर के दोषी वह भी थे। मुख्य दोषियों में इतिहास की विशाल निर्वैयक्तिक शक्तियां, कन्नौज के विघटन के बाद हिंदुओं का पतन, हिंदुस्तान के इस्लाम की अंधी आत्मघाती कट्टरता, ब्रितानी साम्राज्यवाद की आखिरी साजिश और सबसे अधिक, समर्पण और समझौते की वह दीन भावना भी थी जिसे समन्वय और सहिष्णुता कहा जाता है। कौन जानता है कि अगर गांधीजी जेल में होते या जेल जाने की धमकी भी देते तो बंटवारे से बचा जा सकता था। यह एक तथ्य है कि 15 अगस्त, 1947 की रात जब जवाहर लाल नेहरू और उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता बंटवारे की त्रासदी के साथ आई आजादी का जश्न मना रहे थे तो लोहिया और महात्मा गांधी उस जश्न में शामिल नहीं थे। लोहिया के अनुसार देश का विभाजन और गांधीजी की हत्या एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक पहलू की जांच किए बिना दूसरे की जांच करना समय की बर्बादी है। लोहिया गांधीजी के अनुयायी तो थे किंतु किसी पद-प्रतिष्ठा की लालसा से दूर रहने के कारण वह उनकी आलोचना करने में संकोच नहीं करते थे। लोहिया का कहना था कि हिंदुस्तान के शासक वर्ग के तीन प्रमुख लक्षण हैं-ऊंची जाति, अंग्रजी शिक्षा और पैसा। इनमें से कोई दो लक्षण साथ जुड़ जाने पर कोई भी व्यक्ति शासक वर्ग में शामिल हो सकता है। यह निष्कर्ष आज भी उतना ही सत्य है, जितना लोहिया के समय था। प्रत्यक्षानुभूति साक्षात्कार दर्शन के आधार पर जिस राष्ट्रवादी समाजवाद की रूपरेखा लोहिया ने कल्पित की थी उसके कार्यान्वयन के लिए प्रशंसकों और सहचरों की उनकी स्वतंत्र टीम पर्याप्त न थी। काश दीनदयाल उपाध्याय के एकात्ममानव दर्शन तथा राम मनोहर लोहिया के प्रत्यक्षानुभूति साक्षात्कार दर्शन को मिलाकर डूब रहे भारत को बचाने का कोई नया नुस्खा बन पाता। जनसाधारण की निष्ठा किसके प्रति होनी चाहिए-व्यक्ति, संगठन या सिद्धांत के प्रति? लोहिया ने बताया कि निष्ठा तीनों के प्रति होनी चाहिए किंतु प्रचलित निष्ठा-क्रम मे बदलाव आना चाहिए। सर्वप्रथम निष्ठा सिद्धांत के प्रति होनी चाहिए, फिर संगठन के प्रति और अंत में नेता के प्रति। वैयक्तिक निष्ठा के बल पर स्वार्थ सिद्धि करते हुए देश को गर्त मे ढकेलने का विरोध करने वालों के लिए लोहिया का यह मत सर्वश्रेष्ठ सूत्र होना चाहिए। स्वतंत्र भारत की सरकार ने उन्हें 12 बार जेल भेजा था, किंतु उन्होंने सिद्धांतों से समझौता कभी नहीं किया। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Tuesday, March 22, 2011

लोहिया की समग्र जातीय दृष्टि मार्क्सस से आगे और मंडल से भी व्यापक


लोहिया के सिद्धांत के अंतर्गत सच को जानना, सच का सामना करना और फिर सच को बेहतर बनाना; यह सब एक साथ होना चाहिए। इसलिए यह जरूरी है कि हम जाति और वर्ग का सच जानें। उसकी गणना करें और उसके आधार पर अब तक जो नीतियां और कार्य क्रम हैं, उनकी समीक्षा करें। जातिविहीन समाज बनाने का जो संवैधानिक संकल्प है और स्वतंत्रता संग्राम के जो आदर्श हैं, उन पर आगे बढ़ने की कोशिश करें

डॉ. राममनोहर लोहिया ने भारतीय समाज की संरचना में जाति की भूमिका को समाजवादी समाज के निर्माण के संदर्भ में बहुत महत्त्वपूर्ण माना था। इसके कारण समाजवादी चिंतन धारा में वर्ग प्रधान नीतियों के समानांतर जाति के प्रति सजग नीतियों की जरूरत महसूस की जाने लगी। समाजवादियों ने डॉ राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में 1960 से पिछड़ों को विशेष अवसर के सिद्धांत की प्रस्तुति की। इसमें पिछड़े की परिभाषा अतिव्यापक की गई, जिससे कि जातिभेद और लिंगभेद दोनों को विषमताओं के निर्मूलन के संदर्भ में पहचाना जाए और इनके वर्ग व्यवस्था से सम्बन्ध को भी समझा जाए। मार्क्‍सवादी विचारधारा के विकास में कई महत्त्वपूर्ण सत्यों का उद्घाटन हुआ था लेकिन एशिया के संदर्भ में मार्क्‍सवादियों ने स्थानीय सभ्यता और संस्कृति के साथ तालमेल बिठाए बगैर जो किताबी समझदारी पेश की उसमें इस तथ्य की अनदेखी की गई कि भारतीय समाज की संरचना में, अन्यायों की जड़ में जाति और स्त्री-पुरु ष भेद का हाथ है। इस मायने में लोहिया भारतीय समाजवाद के माक्सरेत्तर चिंतकों के अग्रणी बने। लोहिया ने पिछड़े की परिभाषा में सबसे पहले महिलाओं को स्थान देने की बात कही है। यह मार्क्‍स और गांधी दोनों के चिंतन से बल पाता है। मार्क्‍स ने महिला को पुरु ष का सर्वहारा माना था और गांधी ने महिला को मानव समाज का श्रेष्ठतर तत्व होने के बावजूद लगातार पीछे रखे जाने की विवशता की शिकार माना था। पिछड़े की परिभाषा में लोहिया ने दूसरे नम्बर पर अस्पृश्यता के शिकार मनुष्यों को रखा। तीसरे नम्बर पर जनजातियों से जुड़े समुदायों को रखा। चौथे नम्बर पर उनकी दृष्टि में हिन्दुओं, मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के बीच में जो तथाकथित पिछड़ी जातियां कहलाती हैं; जो मूलत: श्रमजीवी और कामकाजी जमात की हुनरमंद लोगों की जमातें हैं; उनको उन्होंने रखा। उन्होंने इस कोटि में जो गैर हिन्दू जमातों के पिछड़े हैं, उनको पांचवें क्रम में शामिल करने का काम किया। इस तरह से पांच तरह के पिछड़े समूहों को लोहिया ने एक साथ विशेष अवसर का अधिकारी माना। इसकी शुरु आत में उन्होंने अपने दल के अंदर उम्मीदवार चुनते समय और पदाधिकारी और समितियों का चयन करते समय साठ सैकड़ा के सिद्धांत की जरूरत को बल दिया और उसका पालन किया। इसके परिणामस्वरूप भारत के सभी दलों की तुलना में लोहिया के दल और आंदोलन से बड़ी संख्या में पिछड़ी जमातों से जुड़े लोग राष्ट्रीय नेतृत्व की कतार में आ गए।
लोहिया और मं डल की सोच में अंतर
राममनोहर लोहिया की जाति सम्बन्धी दृष्टि और दिशा को बाद के कई लोगों ने भारत की राजनीति में जाति के बढ़ते प्रभाव का कारण माना है। उनका यह आरोप है कि डॉ लोहिया ने भारतीय समाज को अगड़ा और पिछड़ा में बांटा और समाजवादियों ने लोहिया के बाद पिछड़ों में भी सिर्फ मझोली जातियों को आरक्षण का अधिकारी मानते हुए न सिर्फ पिछड़ावाद चलाया बल्कि दलितों और पिछड़ों के बीच एकता कायम न कर के विवाद बढ़ाया और अब महिलाओं के आरक्षण का भी विरोध कर रहे हैं। यह सही है कि राममनोहर लोहिया की समाजवादी राजनीति से पैदा अनेकों लोगों ने क्षेत्रीय दलों की शक्ल में उत्तर भारत में महत्त्वपूर्ण भूमिका प्राप्त की है और उनके नेतृत्व में चल रहे राजनीतिक संगठनों में प्राय: पिछड़ावाद की गूंज सुनाई पड़ती है। इनमें से कुछ दल महिला आरक्षण के भी विरोधी हैं लेकिन इसके लिए डॉ लोहिया के बजाए बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल द्वारा प्रस्तुत आरक्षण फार्मूला जिम्मेवार है। जिसे हम सभी मंडलवाद या मंडल रिपोर्ट के रूप में जानते-पहचानते हैं। लोहिया और मंडल की राजनीतिक सोच और दिशा में पूरब और पश्चिम या दिन-रात जितना अंतर है। श्री मंडल को डॉ लोहिया ने अपने जीवनकाल में अपने दल के अंदर सत्ता की राजनीति के लिए सिद्धांतों से समझौता करने का अपराधी पाया था। श्री मंडल ने डॉ लोहिया के गैरकांग्रेसवाद की राजनीति के समूची रणनीति को बिहार में अपने को मुख्यमंत्री बनाने के लिए ध्वस्त करने का प्रयास किया था। इसीलिए डॉ लोहिया की नीति को हम पिछड़ों के लिए विशेष अवसर की नीति के रूप में पहचानें और मंडलवाद को आरक्षण की नीति के साथ जोड़कर देखें तो बेहतर होगा।
वर्ग-जाति में अभिन्न सम्बन्ध
डॉ लोहिया की दृष्टि में वर्ग और जाति के बीच में अभिन्न सम्बन्ध है। मंडल-फार्मूले में वर्ग के बारे में कोई सजगता नहीं है। उन्होंने जाति के आधार पर सामाजिक पिछड़ेपन की परिभाषा करने की कोशिश की, जिसका सुधार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय द्वारा तथाकथित मलाईदार तबके और अन्य तबकों के बीच के अंतर के रूप में स्थापित किया गया। लोहिया की जाति नीति बगैर वर्ग विश्लेषण के अधूरी होगी। वैसे भी वर्ग विश्लेषण का कोई प्रयास जाति की उपेक्षा करके दिशाहीन बन जाता है। इन दोनों में यानी वर्ग और जाति में स्त्री प्रसंग को जोड़ना अनिवार्य है। डॉ लोहिया तो नारी समता को विश्व की सबसे बड़ी क्रांति और जरूरत मानते थे। फिर भी यह कहना जरूरी होगा राममनोहर लोहिया के पिछड़ों के विशेष अवसर के सिद्धांत में जो त्रुटियां आई, उनमें लोहिया की समान दृष्टि और सामाजिक परिवर्तन की रणनीति के साथ कुछ न कुछ सम्बन्ध है। कम से कम इतना सम्बन्ध तो है कि डॉ लोहिया की जय लगाने वाले अनेकों लोग उनके बाद पिछड़ावाद और अगड़ावाद की राजनीति में कोई दोष नहीं देख सके और आज भी वह महिला आरक्षण के खिलाफ यह तर्क देते हैं कि महिलाओं के अंदर जाति के आधार पर जो अंतर होना चाहिए, उसको जोड़े बगैर महिला आरक्षण काम का नहीं रह जाएगा।
जाति तोड़ो सिद्धांत
जाति प्रथा’ नामक निबंध संग्रह में यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि डॉ लोहिया की जाति, वर्ग और स्त्री सम्बन्ध दृष्टि 1949-50 से 1967 तक (जब उनका निधन हुआ) सत्रह साल में धीरे-धीरे विकसित हुई। उन्होंने अपने विश्लेषण में जाति के संदर्भ में अन्य जाति विरोधी चिंतकों की तुलना में इस बात को खुलकर रखा और जो उनको बाकी जाति चिंतकों से अलग करती है, वह है जाति तोड़ो का सिद्धांत और कार्यक्रम। उनकी निगाह में अगड़ों की जगह पिछड़ों तथा ब्राह्मणों की जगह मराठा, रेड्डी, कम्मा या यादव को स्थान देने से जाति व्यवस्था कमजोर नहीं होगी। खाली जगहें बदलेंगी अन्याय को जो मूल सैद्धांतिक आधार है, वह जस का तस बना रहेगा। उन्होंने यह भी माना कि दक्षिण भारत का ब्राह्मण विरोधी आंदोलन और पश्चिम भारत का गैर ब्राह्मण आंदोलन दोनों ही सीमित उद्देश्यों के लिए चलाए गए क्रांतिकारी लफ्फाजी के उदाहरण थे। इसलिए वह चाहते थे कि अब जाति पर जो प्रहार किया जाए, वह समाजवाद के आधार पर न कि ब्राह्मण विरोधी या द्विज विरोधी दृष्टि के तहत किया जाए। इसमें ब्राह्मण और अन्य सवर्ण जातियों के या द्विज जातियों के गरीब भी शामिल हों।
उच्च-पिछड़ी जातियां बनाएं नया समाज
डॉ लोहिया का यह मानना था कि आनेवाले समय में नया समाज बनाने के लिए उच्च और पिछड़ी जातियों के बीच में आदर्श सम्बन्ध की तलाश करनी होगी, जिसमें एक आदर्श तो चाणक्य और चंद्रगुप्त के सम्बन्धों का है। जिसमें जो राजनीतिक दृष्टि से सजग और सामाजिक दृष्टि से समर्थ जाति समूह हैं, वह नए समाज की रचना में पिछड़ चुके या पिछड़ रहे लोगों के सलाहकार बन के सत्ता की लगाम पिछड़ों के हाथ में सौंपे और उनके कौशल से देश निर्माण को आगे बढ़ाएं। दूसरा आदर्श उन्होंने किसान की जिंदगी से लिया। जिसमें उन्होंने माना कि जो सवर्ण जातियों के आदर्शवादी युवक हैं यानी जो समाजवाद चाहते हैं वह पिछड़ों के राजनीतिक अभ्युदय में खाद की भूमिका अदा करें क्योंकि जो पूरा समाज है वह जातििलंग भेद के कारण लकवाग्रस्त है। दिशाहीन, गतिहीन और उदासीन है। इस उदासीनता और गतिहीनता को तोड़ने के लिए एक तरफ स्त्री को पुरु ष के बराबर हर अवसर देना पड़ेगा, उसकी तेजस्विता को फिर से अवसर देना पड़ेगा और दूसरी तरफ पिछड़ों को भी योग्यता की शर्त से अलग करके अवसर की गुंजाइश पैदा करनी पड़ेगी क्योंकि बिना अवसर के योग्यता नहीं निखर सकती। उनका यह निष्कर्ष पिछड़ावाद और स्त्री-पुरुष भेद को तोड़ने के लिए सर्वमान्य हो; इसका प्रयास डॉ लोहिया ने तमाम तरह की कोशिशों से किया। आखिर फिर यह क्यों हुआ कि डॉ लोहिया की नीतियों से लाभान्वित तबके उनके जाने के बाद स्त्री के प्रश्न पर इतने दुराग्रही हो रहे हैं दलितों और गैर द्विज पिछड़ी जातियों विशेष तौर पर किसान जातियों के बीच में फासला कम नहीं हो रहा है। असल में तो उत्तर प्रदेश में आज लड़ाई शूद्र बनाम अतिशूद्र की चल रही है। एक तरफ दलित नेतृत्व का दल शासन में और दूसरी तरफ शूद्र नेतृत्व का दल सबसे प्रबल विरोधी दल के रूप में। बिहार में यह लड़ाई शूद्र बनाम शूद्र की है। जहां पर एक जमात कुर्मिंयों की अगुआई में शासन में और दूसरी जमात यादवों की अगुआई में विरोध पक्ष है। दक्षिण- पश्चिम भारत में तो पिछड़ा और अति पिछड़ा का सवाल दलितों में अदालत की चौखट तक पहुंच चुका है। जहां पर दलित और महादलित के बीच में खुलेआम आरक्षण के लिए मुकदमेबाजी हो रही है। उत्तर भारत में गुर्जर अपने को पिछड़े से निकालकर आदिवासी की कोटि में डालना चाहते हैं और सबसे बलशाली गैर द्विज जमात जाट पिछड़े वर्ग के रूप में गिनवाए जाने के लिए ट्रेनें और रास्ते रोक रहे हैं।
प्रभु जाति प्रजातंत्र की परिणति
ये सब लोहिया के विचारों के दुष्परिणाम नहीं हैं। यह तो प्रभुजाति प्रजातंत्र की तार्किक परिणति है। आज समाजवाद के लिए नहीं संसदवाद के लिए राजनीतिक सक्रियता का संगठन किया जा रहा है। जिसमें सामान्य हितों के लिए यानी रोटी, कपड़ा और मकान के लिए राजनीति करना किसी की प्राथमिकता नहीं है। अब संयुक्त मोर्चे का जमाना है जिसमें मजबूत जमातें अपने-अपने सदस्यों का राजनीतिक संगठन बनाकर पांच प्रतिशत से पंद्रह प्रतिशत वोट के आधार पर दस प्रतिशत से चालीस प्रतिशत सीटों को जीतकर सत्ता की साझेदारी का सपना सच कर रहे हैं। उनके लिए आज महंगाई, मजदूरी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा जैसे सवाल गैरजरूरी हो गए हैं। इस समय प्रभुजाति प्रजातंत्र के कारण एक तरफ दलित और आदिवासी परेशान हैं। दूसरी तरफ महिलाओं की कोई सुनवाई नहीं हो रही। इसमें बिहार ने कुछ नए प्रयोग किए हैं। बिहार की राजनीतिक जमात ने नए सूत्रों के आधार पर जहां हमारी आरक्षण की राजनीति यानी मंडलवाद अंतर्विरोधों का शिकार होकर गतिहीन हो गया था, वहां से उन्होंने आगे जाने की कोशिश कर रहे हैं। इसीलिए सबसे पहले महिलाओं के लिए पंचायत और जिला परिषद में, नगरपालिका में पचास प्रतिशत आरक्षण किया है। इसके सुंदर परिणाम आने शुरू हो गए हैं। इन महिलाओं के बीच में एक लिंग के अंदर कई जाति और वगरे का होना पहचाना गया है। इसलिए आरक्षण के अंदर आरक्षण की व्यवस्था की गई है। दूसरी तरफ जो प्रमुख आरक्षण आधार थे, यानी पिछड़ावाद और दलित समूह। इनके अंदर भी अंदरु नी फर्क है, उसको पहचानने का साहस दिखाया गया है। पिछड़ा-अति पिछड़ा और दलित-अतिदलित के नए वर्गीकरण प्रस्तुत किए गए हैं। यह प्रयोग मुसलमानों के बीच में भी जो अगड़ा-पिछड़ा का दो बड़ा संसार है उसको पहचानता है और पसमांदा मुसलमानों के नाम पर एक नई पहचान बनाई गई है। इससे यह साफ होता है कि भारत में जाति के सवाल पर डॉ लोहिया के पहले या उनके बाद जो कदम उठाए गए हैं, उनके जो परिणाम निकले हैं, उनसे जाति के अंदर वर्ग निर्माण और वर्गों के अंदर जातियों का समूहीकरण हुआ है। इसी के समानांतर स्त्रियां भी शिक्षा से लेकर राजनीति में अगली कतार में आने की कोशिश कर रही है।
इसलिए जरूरी है जाति जनगणना
इन सबको देखते हुए अब यह जरूरी हो गया है कि भारत की जाति तस्वीर सामने लाई जाए। यह अफसोस की बात है कि भारतीय समाज के संगठन के जो दो बड़े आधार हैं, उनके बारे में हमारे देश की सरकार और समाज पास कोई पक्की जानकारी नहीं है। एक तरफ हमको यह नहीं मालूम कि आर्थिक दृष्टि से भारत में कितनी बड़ी तादाद में लोग वंचित हैं और गरीबों की तादाद कितनी है। इसी तरह दलित और मुसलमानों की उनकी संख्या से कम की गणना की जाती है, जिससे कि उनका आरक्षण कम दिखाया जा सके। दूसरी तरफ अन्य लोग यह देख रहे हैं कि पिछले साठ बरस की प्रगति यात्रा में शिक्षा के कारण, आर्थिक नवनिर्माण के कारण राजनीतिक शक्तिकरण के कारण बहुत सारी जमातों में प्रगति आई है। भारत का मध्यम वर्ग 10 फीसद से बढ़कर लगभग 30 फीसद हो चुका है और उसमें सभी जमातों से लोग आए हैं। तो क्या हमें जाति तस्वीर और वर्ग तस्वीर की फिर से जांच नहीं करनी चाहिए? बहुत सारी जातियों के नाम बदले हैं, उनके नए समूह बने हैं। इसलिए यह जरूरी है कि हम जाति के आधार पर जनगणना करें। कुछ लोगों को लगेगा की हम एक पुराने दोष को जिंदा कर रहे हैं। ऐसे लोगों से मैं पूछना चाहूंगा कि क्या हम परिवार के अंदर हम अपनी जाति नहीं जानते। हम अपने बच्चों को उनकी जाति नहीं बताते। क्या विवाह के अवसर पर हम प्राय: जाति के अंदर विवाह को सहर्ष स्वीकृति और जाति के बाहर विवाह को रोकने की कोशिश नहीं करते? आखिर ये खाप पंचायतें तथाकथित सम्मान हत्याएं किस बात को कर रहे हैं। जातियों को लेकर के झगड़े किसलिए हो रहे हैं। क्या हम चुनाव लड़ते समय उम्मीदवार की जाति और टिकट देते समय प्रत्याशियों की जाति नहीं जानते। क्या हम अपने प्रशासन के विभिन्न पदों पर बैठे पदाधिकारियों की जाति नहीं जानते?
जाति सामाजिक शक्ति स्रेत
तो आखिर जाति कहां छिपी हुई है, जो जाति की गणना करने से वह सामने आ जाएगी। जाति एक व्यापक सच है। यह बहुत बड़ा सामाजिक शक्तिस्रेत है। इसके जरिए हम परेशानी के समय सुरक्षा पाते हैं। जन्म से मरण तक जाति हमें समाज के कुछ सदस्यों से स्वत: जोड़ देती है। इससे बड़ी सामाजिक सुरक्षा की योजना अभी जीवन बीमा निगम या भारत सरकार के पास भी नहीं है। फिर यह बचकानी बात होगी कि हम जिस सिद्धांत और व्यवस्था के अंतर्गत जी रहे हैं। उसकी गणना करने से घबराएं। इसी तरह गरीबी का सवाल है। गरीबी के बारे में भी यह छिपाने से नहीं दूर होनेवाली है। दुनिया के लोग जब हमारे महानगरों में आते हैं तो वह फुटपाथों पर भीख मांग रहे बच्चों से लेकर शहर में सार्वजनिक जगहों पर झुग्गी झोंपड़ी में करोड़ों की तादाद में जी रहे मनुष्यों को देखते हैं। मैं समझता हूं कि लोहिया के सिद्धांत के अंतर्गत सच को जानना, सच का सामना करना और फिर सच को बेहतर बनाना; यह सब एक साथ होना चाहिए। इसलिए यह जरूरी है कि हम जाति और वर्ग का सच जानें। उसकी गणना करें और उसके आधार पर अब तक जो नीतियां और कार्यक्रम हैं, उनकी समीक्षा करें। जाति विहीन समाज बनाने का जो संवैधानिक संकल्प है और स्वतंत्रता संग्राम के जो आदर्श हैं, उन पर आगे बढ़ने की कोशिश करें।


छात्रों का सुधार का बीड़ा उठाना है - लोहिया


गैर कांग्रेसवाद की ओर-छोर को खोजें तो 1953 में लौटना पड़ेगा। यह वह साल है, जिसमें भारत और पाकिस्तान की सरकारों को छात्र आंदोलन के तूफान से गुजरना पड़ा। डॉ. लोहिया ने उसे एक परिघटना माना जबकि दूसरे नेता छात्र असंतोष समझते थे। उस साल उत्तर प्रदेश के छात्र इसलिए उत्तेजित हुए थे कि राज्य सरकार ने छात्र संघों की सदस्यता को ऐच्छिक करने का फैसला ले लिया था। यह प्रस्ताव तत्कालीन राज्यपाल कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी ने रखी थी। इसे छात्रों ने व्यापक अर्थो में लोकतंत्र पर सरकारी शिंकजा माना। छात्रों ने इसके खिलाफ लड़ाई छेड़ दी। बिना किसी नेता के चार महीने यह आंदोलन चला। नेहरू ने इसे उपद्रव माना और धमकी दी कि ‘छात्रों का उपद्रव बर्दाश्त के बाहर हो गया है।’ यह प्रतिक्रिया उस सोच की देन है जिसमें वरीयता कुछ और है, लोकतंत्र नहीं। फिर यहां लोहिया ही थे, जिनकी छेड़ी बहस के कारण अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने उस आंदोलन को विकास विरोधी मानने की अपनी धारणा बदली। इसी समय पाक में छात्र आंदोलन उभरा था, जो बटवारे के समय किए गए वादे को पूरा करने तथा शिक्षा की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग कर रहा था। उस आंदोलन को पाकिस्तान में आज भी याद किया जा रहा है। इन छात्र आंदोलनों से डॉ. लोहिया ने अपना वैचारिक, रागात्मक और वैकल्पिक नाता बनाया। वे सतही बातों में पड़ने वाले नहीं थे। उन्होंने इन आंदोलनों की सम्भावनाओं को भांपा और समाजवादी आंदोलन के नेताओं की अवसरवादिता को इससे तौला। वे अपने स्तर पर विकल्प का औजार बनाने पर विचार करने लगे। पटना गोलीकांड पर उनके बयान से इसकी शुरुआत मान सकते हैं। वे छात्रों से सीधे जुड़ रहे थे। हिन्दी क्षेत्र के छात्र आंदोलनों में उन्होंने गहरी रुचि ली। पहले चरण में डॉ. लोहिया ने विचार और प्रचार को ऊपर रखा। उसके बाद संगठन और आंदोलन के मुद्दे पर आए। जैसे ही उन्होंने अपना ध्यान शैक्षणिक परिसरों की ओर किया। बहस शुरू हो गई कि छात्र पढ़ें या राजनीति करें। यह बहस तब थी, आज भी है और आगे भी चलेगी। इस बारे लोहिया ने जो कहा वह भी एक सत्य है कि छात्र जब राजनीति नहीं करते तो सरकारी नीति को चलने देते हैं। उन्होंने सलाह दी थी,‘समाज और सरकार जब सड़ने लगे तो छात्रों को चाहिए कि वे सुधार का बीड़ा उठाएं।’ इसे उनके जीवनकाल में छात्रों में अपनाया उससे कहीं अधिक उनके जाने के बाद जीवन में चरितार्थ किया। गुजरात हो, बिहार या उसके कई सालों बाद असम का छात्र आंदोलन रहा हो, इन आंदोलनों में डॉ. लोहिया की राजनीति का विराट तत्व प्रकट हुआ। बिहार आंदोलन का नाम ही जेपी आंदोलन हो गया। वे 1974-75 में डॉ. लोहिया की तरह अड़ गए और फिर उन्होंने कमाल दिखाया।



युवाओं से संवाद


ईमानदार होने तक सरकारों को बदलते रहें
विध्वंस और रचना पूरक कार्य हों तो मजा आता है। एक के बिना दूसरा हर हालत में अधूरा है। रचना के बिना विध्वंस से तो लाभ-हानि दोनों की सम्भावनाएं हैं। किंतु विध्वंस के बिना रचना में तो मुझे धोखा ही धोखा नजर आता है
एक व्यापक भ्रम को हमें मिटाना होगा। अपनी कमजोरियों की बात करते हुए हमेशा फूट और दंगों पर ध्यान केंद्रित रहता है। हमेशा जयचंद और मीरजाफर को ही हमारे देश का खलनायक करार दिया जाता है। ऐसे लोग हर युग में, हर जगह रहे हैं। ..हर स्कूली बच्चे को यह मालूम होना चाहिए कि राजाओं की फूट के कारण नहीं, बल्कि लोगों की उदासीनता के कारण हमलावरों को कामयाबी मिली। इस उदासीनता का सबसे बड़ा कारण है जाति। जाति से उदासीनता आती है और उदासीनता से हार।
समूचा हिंदुस्तान कीचड़ का तालाब बन गया है जिसमें कहीं-कहीं कमल उग आए हैं। कुछ जगहों पर ऐय्याशी के आधुनिकतम तरीकों के सचिवालय, हवाई अड्डे, होटल, सिनेमा घर और महल बन गए हैं और उनका इस्तेमाल उसी तरह के बने-ठने लोग-लुगाई करते हैं। लेकिन कुल आबादी के एक हजारवें हिस्से से भी इन सब का कोई सरोकार नहीं है। बाकी तो गरीब, दुखी, उदास, नंगे और भूखे हैं।
हिंदुस्तान की सामान्य जनता, मामूली लोग, अपने में भरोसा करना शुरू करें कि कल तक जो अंग्रेजी राज था, वह पाजी बन गया तो उसे खत्म किया। अब कांग्रेसी सरकार है, वह पाजी बन गई तो उसे खत्म करेंगे। कल मान लें कम्युनिस्ट सरकार बने, वह पाजी हो जाए तो उसे खत्म करेंगे। परसों सोशलिस्ट सरकार बनेगी। मान लो वह पाजी हो जाए तो उसे खत्म करेंगे। जिस तरह तवे के ऊपर रोटी उलटते- पलटते सेंक लेते हैं उसी तरह से हिंदुस्तान की सरकारों को उलटते-पलटते ईमानदार बना कर छोड़ेंगे। यह भरोसा किसी तरह हिंदुस्तान की जनता में आ जाए तो फिर रंग आ जाएगा राजनीति में।
जिस गति से हम अपने प्रधानमंत्रियों के लिए समाधि-स्थल बना रहे हैं, यह शहर (दिल्ली) जल्दी ही जिंदा लोगों के बजाय मुदरे का शहर हो जाएगा। कोई ऐसा नियम प्रतीत होता है कि राष्ट्र जितना अधिक गरीब हो, जीवित या मृत आदमियों पर उतना ही अधिक खर्च हो। भविष्य की पीढ़ियों को इन मूर्तियों, संग्रहालयों और चबूतरों से बहुतेरों को हटाना पड़ेगा। जिन देशों में जीवन को मूल्यवान समझा जाता है और मामूली आदमी का लोकतंत्र किसी हद तक प्रभावी होता है, वहां सचमुच महान व्यक्तियों को भी अन्य बहुतेरों के बीच किसी गिरजे या पारिवारिक कब्रिस्तान में जगह मिलती है।
हिंदुस्तान को देखो तो उसके दो माथे हैं, दो दिमाग हैं। एक ओर उसूल हैं, सिद्धांत और निर्गुण है तो दूसरी ओर काम है, व्यवहार है, सगुण है। एक ओर अद्वैतवाद है जिसके मुताबिक किसी में फर्क नहीं है। किंतु उस परमार्थिक से छोटा एक दुनियावी सत्य है, उसके मुताबिक जात-पांत, भेदभाव, गैरबराबरी सब जायज है। यह हमारा दिमागी विभाजन कई सौ सालों से चला आ रहा है।
विध्वंस और रचना पूरक कार्य हों तो मजा आता है। एक के बिना दूसरा हर हालत में अधूरा है। रचना के बिना विध्वंस से तो लाभ-हानि दोनों की सम्भावनाएं हैं। किंतु विध्वंस के बिना रचना में तो मुझे धोखा ही धोखा नजर आता है।
बड़ी राजनीति देश के कूड़े को बुहारती है और छोटी राजनीति मोहल्ले और गांव के कूड़े को।
मनुष्य को बचाना आज जरूरी हो गया है। आज वह राष्ट्र और जाति से इतनी बुरी तरह बंध चुका है कि जन्म, शादी और प्रेम में भी वह मनुष्य नहीं, बल्कि कुछ अधकटा जीव बन गया है। जो थोड़ा बहुत इस दिशा में हुआ है वह उतना ही युद्ध और विजय का फल है जितना प्रेम का। शायद प्रेम से ज्यादा युद्ध और विजय का। असली दुनिया तब बनेगी जब मनुष्य सचमुच वर्णसंकर अथवा दोगला हो जाएगा।
आखिर समाजवाद का अर्थ होता है बराबरी। उसका और अर्थ होता है सम्पूर्ण बराबरी, सम्भव बराबरी। सम्भव बराबरी को लाने के लिए अधिकतम आमदनी और न्यूनतम खर्च की बात करो। फिर अगर न्यूनतम आमदनी को बढ़ाने में दिन भी लगते हों तो कम से कम अधिकतम खर्च को कम करने की बात सोचो।
कई बार तो मेरे मन में आता है कि राजनीति छोड़ कर मैं हिंदुस्तान में केवल बच्चों की एक पार्टी बना लूं ताकि वे विद्रोह करें अपने मां-बाप के खिलाफ कि अकारण उनके ऊपर थप्पड़ क्यों लगाया जाता है?


जिनसे डरीं सभी सरकारें


सप्तक्रांति की अवधारणा में उनके विचार का सार तत्व है। सप्तक्रांति एक अवधारणा है। उसका उसी तरह शास्त्रीय महत्त्व है जैसे जेपी की ‘सम्पूर्ण क्रांति’ और दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ का। जो क्रांति घटित नहीं हो पाती वह अवधारणा में सिमट जाती है। उसका विचारक एक दार्शनिक की श्रेणी में पहुंच जाता है पर लोहिया दार्शनिक नहीं विशुद्ध राजनीतिक थे। उनकी सप्तक्रांति के घटित न होने के कई कारण हो सकते हैं

लोकसभा में 16 दिसम्बर-2009 को राजद के सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से पूछा-वर्ष 2010 में डॉ. राममनोहर लोहिया की जन्मशती स्मृति उत्सव आयोजित किये जाने हेतु की गई तैयारियों का ब्योरा क्या है? क्या इस सम्बंध में अनेक सांसदों ने सरकार को लिखित ज्ञापन दिया है?, यदि हां तो क्या सरकार ने डॉ. लोहिया के जन्मशती उत्सव को मनाने हेतु तैयारियां आरम्भ कर दी हैं? यदि हां तो तत्सम्बंधी ब्योरा क्या है? और यदि नहीं, तो इसके कारण क्या हैं? रघुवंश बाबू पहली यूपीए सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री थे पर उनके सवाल को प्रधानमंत्री ने इतना भी महत्त्व नहीं दिया कि वे खुद जवाब दें। उनके राज्यमंत्री वी. नारायण स्वामी ने जो जवाब दिया है, वह सरकार की मंशा समझने के लिए काफी है-‘जी, हां। अनेक सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित एक लिखित ज्ञापन सरकार को प्राप्त हुआ है। सरकार को मामले की जानकारी है।’
इस विवरण से और बातों के अलावा केंद्र सरकार का देश के महापुरुषों के बारे में नजरिया समझ में आ जाता है। सरकार के घर में महापुरुष वे सब नहीं हैं, जिन्हें लोग मानते हैं। वह पेटेंट के नियमों से चल रही है, जिनका पेटेंट नेहरू के जमाने में हो गया वे ही महापुरुष हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। आचार्य जे.बी. कृपलानी की जन्मशती पर एक सवाल के जवाब में कहा गया कि गुजरात सरकार को सूचित कर दिया गया है। मतलब वे राष्ट्र के नहीं, महज गुजरात के नेता थे। इसे गनीमत ही कहेंगे कि केंद्र सरकार ने उनकी जन्मशती के लिए पाकिस्तान के सिंध प्रांत को नहीं सूचित किया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जन्मशती के साथ जो खिलवाड़ वाजपेयी सरकार ने किया, वह कम निंदनीय नहीं है। इसके लिए बनी राष्ट्रीय समिति को मेनका गांधी के मंत्रालय के अधीन किये जाने पर विरोध हुआ, कई ने इस्तीफे दिये तो समिति को तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत के अधीन किया गया, जिसकी कभी बैठक ही नहीं हुई। जन्मशती समारोह तो हुए ही नहीं। चंद्रशेखर के दिलचस्पी लेने पर सिर्फ एक जलसा सिताब-दियरा में हुआ। ऐसे में हम मनमोहन सरकार से कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि वह डॉ. लोहिया की जन्मशती को एक राष्ट्रीय उत्सव में परिवर्तित कर दे? यह सिर्फ सरकार के राजनीतिक नेतृत्व का सवाल नहीं है बल्कि उसका अंधानुकरण करने वाली अफसरशाही का मन भी इसी तरह का बन गया है। वह भी महापुरुषों के साथ उसी तरह का भेदभाव कर रही है, जैसा उनके राजनीतिक आका चाहते हैं। पांच साल पहले अच्युत पटवर्धन की जन्मशती थी। क्या किसी को याद है कि ‘भारत छोड़ो’ क्रांति के सूत्रधार रहे उस नायक को भारत सरकार ने वह मान दिया, जिसके वे हकदार थे? उस समय तो अनेक समाजवादी यूपीए सरकार में मंत्री भी थे। लो
किंवदंती बन गए थे डॉ. लोहिया
डॉ लोहिया अपने छोटे से जीवन काल में ही किंवदंती बन गए थे। उनसे जितना तब सरकार डर से कांपती थी उतना आज भी कांप रही है। लोहिया के जीवनकाल में जो किंवदंती बनी थी, उनमें उनके पराक्रम के किस्से होते थे। उनकी तेजस्विता का वर्णन होता था और वे घटनाएं होती थीं जो मन को छू जाती थीं। लोहिया के जाने के बाद उसका स्वरूप बदला है पर चरित्र में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। किंवदंती में विविधता आई है। उनकी जीवनी, संस्मरण, रचनावली और लोकसभा में भाषणों की पुस्तक आई है, जिसने किंवदंती को लिखित साहित्य का पुष्ट आधार दे दिया है। डॉ. लोहिया के जीवन और राजनीति को छात्र युवा आंदोलन के मद्देनजर जितनी बारीकी से देखा जाना चाहिए था वह नहीं हुआ है। अनिल राजीमवाले की किताब में दो जगह जिक्र है। पहली बार एक जगह सूचना है कि 1939 की गर्मी में महात्मा गांधी से मिलने युसुफ मेहरअली, लोहिया, अच्युत पटवर्धन, नरेन्द्रदेव और एसएम जोशी गए। युद्ध की परिस्थितियों पर वे अपनी बात गांधी को बताना चाहते थे कि यही समय है जब स्वाधीनता संग्राम को तेज करना चाहिए। इसके विपरीत कांग्रेस नेतृत्व दुविधा में पड़ा हुआ है। दूसरे जिक्र से यह जानकारी मिलती है कि 1942 में जब बड़े-बड़े नेता जेल में थे तब युवा समूह को नेतृत्व देने और भूमिगत आंदोलन को चलाने की कमान लोहिया और उनकी जमात ने सम्भाली।
विद्रोह ने समझदारी का रास्ता बनाया
उस जमात में डॉ. लोहिया अकेले ऐसे नेता थे जो अपने बचपन से ही छात्र राजनीति में रचे-बसे थे। उन्होंने 12 साल की अवस्था में ही मुम्बई के मारवाड़ी माध्यमिक विद्यालय के छात्रों को असहयोग आंदोलन के लिए सड़क पर उतार दिया था। उसी विद्यालय परिसर में ऑल इंडिया कॉलेज स्टूडेंट्स कान्फ्रेंस की नींव पड़ी थी। असहयोग आंदोलन में गांधी जी के आह्वान पर एक साल के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी। कांग्रेस के गुवाहाटी अधिवेशन में वे गए तो थे तमाशा देखने लेकिन बन गए प्रतिनिधि और उस छोटी उम्र में भी उन्हें बोलने का मौका मिला। बाद में साइमन कमीशन के बहिष्कार की अपील को भी उन्होंने छात्रों में पहुंचाया। लोहिया के बारे में एक सोच बनाई गई है कि वह विद्रोही स्वभाव के थे। इस पर पुनर्विचार की जरूरत है। हमेशा और हर अवस्था में विद्रोह को अनुचित नहीं ठहराया जा सकता। विद्रोह समय का तकाजा भी होता है और यह स्थापित व्यवस्था के प्रति होता है। उससे जो सार्थक बदलाव होता है, वह नव रचना को जन्म देता है। उसकी ही छटपटाहट लोहिया में पाई जाती थी। जो भी इस प्रक्रिया से गुजरता है, वह अपने अनुभव से एक मार्ग बनाता है, जिस पर लोग चलते हैं। विद्रोह का भाव व्यक्ति के दृष्टिकोण और चिंतन से पैदा होता है। निषेधात्मक चिंतन वह भावभूमि होती है, जहां विद्रोह का बीज अंकुरित होता है। न जाने क्यों यह प्रथा बन गई है कि निषेधात्मक चिंतन को सराहा नहीं जाता, बल्कि उसकी निंदा की जाती है। जे. कृष्णमूर्ति कहते थे, निषेधात्मक चिंतन को निंदनीय नहीं माना जाना चाहिए। वह समझ का सर्वश्रेष्ठ रूप होता है।
पूंजीवाद नहीं, समाजवाद उपयोगी
डॉ. लोहिया ने आजादी की लड़ाई में और उसके बाद आजाद भारत में सच को खोजने के लिए निषेधात्मक नजरिया अपनाया। इससे वे जांच-परख और अनुसंधान कर सके। नहीं तो वे भी अनुकरण का रास्ता अपनाते। इसके विपरीत उन्होंने जो तरीका इस्तेमाल किया, उससे वे यह कह सके कि भारत के लिए न पूंजीवाद उपयोगी है और न साम्यवाद। तीसरा रास्ता खोजा जाना चाहिए, जिसे उन्होंने समाजवाद कहा। उसी के लिए जिए और जूझें। उनके विद्रोही स्वभाव का यही मर्म है। तभी वे जड़ता और अनुकरण को हिलाकर रख देते थे। कुंठा पर कठोर प्रहार करते थे, जिससे सत्ताधारी डांवाडोल हो जाते थे। लोहिया ने हर तरह की सत्ता पर प्रश्न चिह्न खड़े किए। वे यह सब स्वतंत्रता, समता और सार्थक लोकतंत्र की त्रयी को सच्चे अर्थो में स्थापित करने के लिए कर रहे थे। वे एक राजनीतिक पार्टी के नेता अवश्य थे पर औरों की तरह उसके कैदी नहीं थे। पार्टी उनका जरिया थी। देश, समाज, संस्कृति, राष्ट्रीयता और मानवता की बेहतरी उनकी मंजिल थी। वे लोक जीवन में रमे हुए थे। डॉ लोहिया ने जो-जो काम किये, जो-जो कहा और जैसा उनका प्रेरक जीवन रहा, उससे विचार की एक तरंग पैदा हुई। देश, समाज ने उन्हें संकट काल का नेता माना। युवा मन उनमें जादुई खिंचाव पाता था। हम जानते हैं कि विचार तरंग की कोई दिशा नहीं होती, सूरज की रोशनी की तरह उसका फैलाव होता है। सहज और चुपचाप। अनंत वतरुलाकार। लोहिया की राजनीति में ऐसी तरंग थी। वह उनकी अनुपस्थिति में भी बनी हुई है। कोई काल जब अनंत का हिस्सा हो जाता है तो ऐसा ही होता है। उनके प्रभाव में व्यक्ति, संस्था, संगठन और दल आते गए।
सप्तक्रांति के तत्त्व
जिस राजनीतिक नेता ने इतना व्यापक प्रभाव छोड़ा उनका रास्ता क्या था और क्या वह आज भी प्रासंगिक है? मधु लिमये को मानें तो सप्तक्रांति की अवधारणा में उनके विचार का सार तत्व है। सप्तक्रांति एक अवधारणा है। उसका उसी तरह शास्त्रीय महत्त्व है जैसे जेपी की ‘सम्पूर्ण क्रांति’ और दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ का। जो क्रांति घटित नहीं हो पाती वह अवधारणा में सिमट जाती है। उसका विचारकर एक दार्शनिक की श्रेणी में पहुंच जाता है। पर लोहिया दार्शनिक नहीं विशुद्ध राजनीतिक थे। उनकी सप्तक्रांति के घटित न होने के कई कारण हो सकते हैं। सत्ता का हाथ में न आना भी कारण हो सकता है। बुनियादी बात यह है कि डॉ. लोहिया ने राजनीति में जिस असम्भव को साधा और साकार किया वह क्या किसी विकल्प को खोलता है या नहीं? देखना यह चाहिए। नासिक (जिसमें कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का जन्म हुआ), पंचमढ़ी, हैदराबाद और वाराणसी के समाजवादी सम्मेलनों के ब्योरे में जाने पर जो बात दिमाग में दर्ज होती है कि समाजवादी आंदोलन जब-जब दुविधा में पड़ा और उसके नेताओं ने समझौते किये, उस समय साफ-साफ दिखता है कि अकेले डॉ. लोहिया ऐसे नेता निकले, जिन्होंने आदर्शवाद से कोई समझौता नहीं किया। उनमें एक जिद दिखाई पड़ती है, जो लड़ने के विचारों से भरी हुई होती है। वोट और सत्ता की राजनीति में समझौता न करने का उनका आग्रह अतुलनीय है। जब वक्त आया तो उन्होंने इस आग्रह को रूपांतरित कर दिया, बिना समझौता किए। लक्ष्य कांग्रेस का विकल्प बनाना था। उसके लिए साझा प्रयास जरूरी था, जिससे एक मंच बन सके। इसी प्रयास से गैर कांग्रेसवाद की लाइन निकली।