राजनीतिक मूल्यों के पतन के इस दौर में दोषपूर्ण व्यवस्था एवं अन्याय से लड़ने वालों के लिए राम मनोहर लोहिया का स्मरण उत्साहवर्धक होगा। मायावी प्रपंच से कोसो दूर रहे लोहिया ऐसे जननेता थे जो मानते थे कि भारत का भाग्योदय विदेशी आदर्शों और सिद्धांतों से नहीं, स्वदेशी आदर्शो और सिद्धांतों से ही संभव है। उन्होंने कहा था, असल में देश के हालात बिगड़ने का कारण है विदेशी सहायता, विदेशी नीति और वह विदेशी अंश जो हमारी राजनीति, बजट, रुपये-पैसे, खेती-कारखानों मे आ गया है। भारत तन और मन दोनों से अपना नहीं रह गया है, पराया बन गया है। वह साम्यवाद और पूंजीवाद दोनों के खिलाफ थे और समाज में सम्यक क्रांति लाने के पक्षधर थे। लोहिया का समाजवाद एक ऐसी व्यवस्था का नाम था, जिसके माध्यम से देश में समता और संपन्नता लाई और कायम की जा सके। उनका मानना था कि पूरी समता एक सपना है। जो सपना बिल्कुल नहीं देखते वे अवसरवादी हैं। जो सपना ही सपना देखते हैं वे यथार्थ से कटे सनकी बन जाते हैं। यथार्थवादी और आदर्शवान दिमाग की कोशिश होनी चाहिए कि अधिकाधिक समता को हासिल किया जाए। समता की सारी बातें निरर्थक होंगी जब तक पेट के सवालों के साथ-साथ मन के सवाल भी हल नहीं किए जाते। जनता की क्षमावृत्ति और सरकार की भोगवृत्ति के चलते समाजवाद नहीं आ सकता। आपातकाल के संबंध में उनके विचार आज भी उतने ही सटीक और प्रासंगिक हैं, आपातकाल की घोषणा 1962 में चीनी हमले के कारण की गई थी, लेकिन बाद में तो सरकार ने इसका दुरुपयोग अपने बचाव के लिए करना शुरू कर दिया। यह बात उन्होंने 1965 में कही थी जो उनकी मृत्यु के कई वर्षों बाद 1975 में लगाए गए आपातकाल की मानो भविष्यवाणी थी। कौन जानता है कि उनकी बात को सही साबित करने के लिए 2जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल, बोफोर्स जैसे घोटाले और जानलेवा महंगाई जैसे तमाम मुद्दे एक बार फिर आपातकाल को न्योता दे दें। देश में पंथनिरपेक्षता, शोषण तथा सामाजिक अन्याय को रोक पाने में असफल भारतीय संविधान से वह संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने कहा था, यह संविधान बनाया था गुलाम भारत के प्रतिनिधियों ने। संविधान को बनाने के लिए जो सभा बैठी थी उसे चुना था उन विधानसभाओं ने जो अंग्रेजों के जमाने में चुनी गई थीं। फिर ऐसा संविधान जनतंत्र की कहां तक स्थापना कर सकता है? 1947 में हुए देश विभाजन से लोहिया बहुत दुखी थे। विभाजन की जिम्मेदारी के संबंध में उन्होंने कहा था, देश के बंटवारे के लिए जितने दोषी जिन्ना, नेहरू और सरदार पटेल थे उतने गांधीजी नहीं थे, लेकिन दूसरे नंबर के दोषी वह भी थे। मुख्य दोषियों में इतिहास की विशाल निर्वैयक्तिक शक्तियां, कन्नौज के विघटन के बाद हिंदुओं का पतन, हिंदुस्तान के इस्लाम की अंधी आत्मघाती कट्टरता, ब्रितानी साम्राज्यवाद की आखिरी साजिश और सबसे अधिक, समर्पण और समझौते की वह दीन भावना भी थी जिसे समन्वय और सहिष्णुता कहा जाता है। कौन जानता है कि अगर गांधीजी जेल में होते या जेल जाने की धमकी भी देते तो बंटवारे से बचा जा सकता था। यह एक तथ्य है कि 15 अगस्त, 1947 की रात जब जवाहर लाल नेहरू और उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता बंटवारे की त्रासदी के साथ आई आजादी का जश्न मना रहे थे तो लोहिया और महात्मा गांधी उस जश्न में शामिल नहीं थे। लोहिया के अनुसार देश का विभाजन और गांधीजी की हत्या एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक पहलू की जांच किए बिना दूसरे की जांच करना समय की बर्बादी है। लोहिया गांधीजी के अनुयायी तो थे किंतु किसी पद-प्रतिष्ठा की लालसा से दूर रहने के कारण वह उनकी आलोचना करने में संकोच नहीं करते थे। लोहिया का कहना था कि हिंदुस्तान के शासक वर्ग के तीन प्रमुख लक्षण हैं-ऊंची जाति, अंग्रजी शिक्षा और पैसा। इनमें से कोई दो लक्षण साथ जुड़ जाने पर कोई भी व्यक्ति शासक वर्ग में शामिल हो सकता है। यह निष्कर्ष आज भी उतना ही सत्य है, जितना लोहिया के समय था। प्रत्यक्षानुभूति साक्षात्कार दर्शन के आधार पर जिस राष्ट्रवादी समाजवाद की रूपरेखा लोहिया ने कल्पित की थी उसके कार्यान्वयन के लिए प्रशंसकों और सहचरों की उनकी स्वतंत्र टीम पर्याप्त न थी। काश दीनदयाल उपाध्याय के एकात्ममानव दर्शन तथा राम मनोहर लोहिया के प्रत्यक्षानुभूति साक्षात्कार दर्शन को मिलाकर डूब रहे भारत को बचाने का कोई नया नुस्खा बन पाता। जनसाधारण की निष्ठा किसके प्रति होनी चाहिए-व्यक्ति, संगठन या सिद्धांत के प्रति? लोहिया ने बताया कि निष्ठा तीनों के प्रति होनी चाहिए किंतु प्रचलित निष्ठा-क्रम मे बदलाव आना चाहिए। सर्वप्रथम निष्ठा सिद्धांत के प्रति होनी चाहिए, फिर संगठन के प्रति और अंत में नेता के प्रति। वैयक्तिक निष्ठा के बल पर स्वार्थ सिद्धि करते हुए देश को गर्त मे ढकेलने का विरोध करने वालों के लिए लोहिया का यह मत सर्वश्रेष्ठ सूत्र होना चाहिए। स्वतंत्र भारत की सरकार ने उन्हें 12 बार जेल भेजा था, किंतु उन्होंने सिद्धांतों से समझौता कभी नहीं किया। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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