Tuesday, March 22, 2011

स्वतंत्र, सक्रिय और तीव्र मन


अपने जीवन में गलतफहमी और बदनामी के शिकार हुए व्यक्ति और विचारक के रूप में लोहिया के कद को अब उत्तरोत्तर स्वीकार किया जा रहा है। उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किया जाएगा जिसने समाजवादी विचार और कर्म में महान योगदान दिया है
लोहिया मौलिक चिंतक थे। वे स्वतंत्र, सक्रिय, तीव्र विश्लेषक और निर्भीक मन के धनी थे। कथनी और करनी का अंतर उन्हें अत्यंत क्षुब्ध कर देता था। लोहिया (1910 से 1967) से व्यापक विषयों पर र्चचा करने के बाद आइंस्टीन ने कहा था : एक स्वतंत्रमना व्यक्ति से मिल कर प्रसन्नता होती है; आदमी कितना अकेला हो जाता है। सब से बड़े वैज्ञानिक ने प्रिंस्टन स्थित अपने घर के बाहर पोर्च पर लोहिया से बातें करते हुए कहा : आप स्वतंत्रमना व्यक्ति हैं।’
दोनों कुछ घंटों के लिए मिले किंतु आइंस्टीन ने लोहिया का क्या सही मूल्यांकन किया? वे वास्तव में स्वतंत्र विचारों के व्यक्ति थे। तभी तो वे न केवल इस या उस राष्ट्र के संदर्भ में सोच सके बल्कि सारी मानव-जाति के संदर्भ में भी सोच सके। जिस अंग्रेजी पत्रिका के साथ वे निकट रूप से सम्बद्ध थे उसका नाम था ‘मैनकाइंड’ न कि ‘यंग इंडिया’ अथवा ‘नेशनल हेराल्ड’। उनका मन स्वतंत्र होने के साथ-साथ सक्रिय, तीव्र और विवेक प्रधान भी था और निर्भीक भी। उपहास अथवा विरोध, कारावास या यातना, कुछ भी उनके मन को तर्कपूर्ण सोच, निर्भीक क्रिया और जीवन-मरण के प्रश्न से जूझ रही मानव जाति की समस्याओं के मौलिक हल पेश करने से नहीं रोक सकता था। गांव से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक मानव की जटिल समस्याओं के समाधान के लिए लोहिया ने जो मौलिक तथा साहसपूर्ण समाधान प्रस्तुत किए उससे वे अनेक कटु विवादों के केंद्र बने। एक तरफ कुछ चुनिंदा अनुयायी उनके प्रति निष्ठावान बने रहे तो दूसरी तरफ एक समय अनुयायी रहे एक बड़े समूह ने उनका तब विरोध किया जब उन्होंने यह सुझाव दिया कि गांधीवादी क्रांति गांधी की हत्या से जहां रुक गई थी, वहां से उसे आगे ले जाया जाए। उस क्रांति की ज्योति को पुन: जगाने के लिए उन्होंने राजनीतिक दलों को तोड़ा, जोड़ा और फिर तोड़ा। उन्होंने यह इसलिए नहीं किया कि वे स्वभाव से तोड़क थे बल्कि इसलिए कि वे अवरुद्ध क्रांति को सफल बनाने के लिए नया शक्तिशाली हथियार बनाना चाहते थे। उनके विचार से नेहरू ने अपने दम्भी आत्मसंतोष से और विनोबा तथा उनके अनुयायियों ने अपने ढोंग से गांधी की क्रांति के साथ विश्वासघात किया है अत: वे उनकी अनवरत कटु आलोचना के विषय बने। लोहिया पर तीखी भाषा और चिड़चिड़े मिजाज का आरोप लगाया जा सकता है किंतु उन पर घमंड, ईष्र्या, जलन और झगड़ालूपन का दोष मढ़ना नितांत मूर्खतापूर्ण होगा। उनका हृदय निश्छल था। मित्रता और प्यार के प्रति अत्यंत संवेदनशील और मनुष्य के रूप में तथा कला के रूप में प्राकृतिक सौंदर्य उन्हें हार्दिक आनंद देता था। वे बच्चों के साथ घुल मिल कर उनकी शरारतों तथा हंसी में सहभागी हो सकते थे। वे हर प्रकार के वर्ग दम्भ तथा फूहड़पन से पूर्णतया मुक्त थे। यदि वे बहसों में आक्रामक भाषा का प्रयोग करते थे तो इसलिए क्योंकि वे पाखंड को सहन नहीं कर सकते थे। वे कठोर पवित्रतावादी नहीं थे और पाखंड के अलावा हर चारित्रिक त्रुटि को नजरअंदाज कर सकते थे। कथनी-करनी का अंतर उन्हें हमेशा ही क्षुब्ध कर देता था। लोहिया के पास यह मानने के कारण थे कि प्रधानमंत्री के रूप में जवाहर लाल नेहरू निपट पाखंडी बन गए हैं। अत: उनका सब से तीखा और विषाक्त आक्रमण उन पर होता था। इसका मतलब यह नहीं कि वे नेहरू से ईष्र्या करते थे। एक मौके पर अपने एक अमेरिकी मित्र के सामने उन्होंने स्वीकार किया था कि वे डेढ़ व्यक्तियों से बहुत प्रभावित हुए। उनका आशय था एक गांधी और आधा नेहरू। उनमें इतनी बौद्धिक ईमानदारी थी कि वे यह कह सकते थे कि नेहरू यद्यपि गांधी से आधा ऊंचे थे, फिर भी वह ऊंचा थे। अपने जीवन में गलतफहमी और बदनामी के शिकार हुए व्यक्ति और विचारक के रूप में लोहिया के कद को अब उत्तरोत्तर स्वीकार किया जा रहा है। जब उनके जीवनकाल के विवादों की धूल बैठ जाएगी तो यह भविष्यवाणी की जा सकती है कि उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किया जाएगा जिसने समाजवादी विचार और कर्म में महान योगदान दिया है।


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