ईमानदार होने तक सरकारों को बदलते रहें
विध्वंस और रचना पूरक कार्य हों तो मजा आता है। एक के बिना दूसरा हर हालत में अधूरा है। रचना के बिना विध्वंस से तो लाभ-हानि दोनों की सम्भावनाएं हैं। किंतु विध्वंस के बिना रचना में तो मुझे धोखा ही धोखा नजर आता है
एक व्यापक भ्रम को हमें मिटाना होगा। अपनी कमजोरियों की बात करते हुए हमेशा फूट और दंगों पर ध्यान केंद्रित रहता है। हमेशा जयचंद और मीरजाफर को ही हमारे देश का खलनायक करार दिया जाता है। ऐसे लोग हर युग में, हर जगह रहे हैं। ..हर स्कूली बच्चे को यह मालूम होना चाहिए कि राजाओं की फूट के कारण नहीं, बल्कि लोगों की उदासीनता के कारण हमलावरों को कामयाबी मिली। इस उदासीनता का सबसे बड़ा कारण है जाति। जाति से उदासीनता आती है और उदासीनता से हार।
समूचा हिंदुस्तान कीचड़ का तालाब बन गया है जिसमें कहीं-कहीं कमल उग आए हैं। कुछ जगहों पर ऐय्याशी के आधुनिकतम तरीकों के सचिवालय, हवाई अड्डे, होटल, सिनेमा घर और महल बन गए हैं और उनका इस्तेमाल उसी तरह के बने-ठने लोग-लुगाई करते हैं। लेकिन कुल आबादी के एक हजारवें हिस्से से भी इन सब का कोई सरोकार नहीं है। बाकी तो गरीब, दुखी, उदास, नंगे और भूखे हैं।
हिंदुस्तान की सामान्य जनता, मामूली लोग, अपने में भरोसा करना शुरू करें कि कल तक जो अंग्रेजी राज था, वह पाजी बन गया तो उसे खत्म किया। अब कांग्रेसी सरकार है, वह पाजी बन गई तो उसे खत्म करेंगे। कल मान लें कम्युनिस्ट सरकार बने, वह पाजी हो जाए तो उसे खत्म करेंगे। परसों सोशलिस्ट सरकार बनेगी। मान लो वह पाजी हो जाए तो उसे खत्म करेंगे। जिस तरह तवे के ऊपर रोटी उलटते- पलटते सेंक लेते हैं उसी तरह से हिंदुस्तान की सरकारों को उलटते-पलटते ईमानदार बना कर छोड़ेंगे। यह भरोसा किसी तरह हिंदुस्तान की जनता में आ जाए तो फिर रंग आ जाएगा राजनीति में।
जिस गति से हम अपने प्रधानमंत्रियों के लिए समाधि-स्थल बना रहे हैं, यह शहर (दिल्ली) जल्दी ही जिंदा लोगों के बजाय मुदरे का शहर हो जाएगा। कोई ऐसा नियम प्रतीत होता है कि राष्ट्र जितना अधिक गरीब हो, जीवित या मृत आदमियों पर उतना ही अधिक खर्च हो। भविष्य की पीढ़ियों को इन मूर्तियों, संग्रहालयों और चबूतरों से बहुतेरों को हटाना पड़ेगा। जिन देशों में जीवन को मूल्यवान समझा जाता है और मामूली आदमी का लोकतंत्र किसी हद तक प्रभावी होता है, वहां सचमुच महान व्यक्तियों को भी अन्य बहुतेरों के बीच किसी गिरजे या पारिवारिक कब्रिस्तान में जगह मिलती है।
हिंदुस्तान को देखो तो उसके दो माथे हैं, दो दिमाग हैं। एक ओर उसूल हैं, सिद्धांत और निर्गुण है तो दूसरी ओर काम है, व्यवहार है, सगुण है। एक ओर अद्वैतवाद है जिसके मुताबिक किसी में फर्क नहीं है। किंतु उस परमार्थिक से छोटा एक दुनियावी सत्य है, उसके मुताबिक जात-पांत, भेदभाव, गैरबराबरी सब जायज है। यह हमारा दिमागी विभाजन कई सौ सालों से चला आ रहा है।
विध्वंस और रचना पूरक कार्य हों तो मजा आता है। एक के बिना दूसरा हर हालत में अधूरा है। रचना के बिना विध्वंस से तो लाभ-हानि दोनों की सम्भावनाएं हैं। किंतु विध्वंस के बिना रचना में तो मुझे धोखा ही धोखा नजर आता है।
बड़ी राजनीति देश के कूड़े को बुहारती है और छोटी राजनीति मोहल्ले और गांव के कूड़े को।
मनुष्य को बचाना आज जरूरी हो गया है। आज वह राष्ट्र और जाति से इतनी बुरी तरह बंध चुका है कि जन्म, शादी और प्रेम में भी वह मनुष्य नहीं, बल्कि कुछ अधकटा जीव बन गया है। जो थोड़ा बहुत इस दिशा में हुआ है वह उतना ही युद्ध और विजय का फल है जितना प्रेम का। शायद प्रेम से ज्यादा युद्ध और विजय का। असली दुनिया तब बनेगी जब मनुष्य सचमुच वर्णसंकर अथवा दोगला हो जाएगा।
आखिर समाजवाद का अर्थ होता है बराबरी। उसका और अर्थ होता है सम्पूर्ण बराबरी, सम्भव बराबरी। सम्भव बराबरी को लाने के लिए अधिकतम आमदनी और न्यूनतम खर्च की बात करो। फिर अगर न्यूनतम आमदनी को बढ़ाने में दिन भी लगते हों तो कम से कम अधिकतम खर्च को कम करने की बात सोचो।
कई बार तो मेरे मन में आता है कि राजनीति छोड़ कर मैं हिंदुस्तान में केवल बच्चों की एक पार्टी बना लूं ताकि वे विद्रोह करें अपने मां-बाप के खिलाफ कि अकारण उनके ऊपर थप्पड़ क्यों लगाया जाता है?
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