Wednesday, March 23, 2011

लोहिया का अंगरेजी विरोध


समाजवादी राजनीति के पुरोधा डॉ. राममनोहर लोहिया के भाषा संबंधी समस्त चिंतन और आंदोलन का लक्ष्य भारतीय सार्वजनिक जीवन से अंगरेजी के वर्चस्व को हटाना था। यहां दो बातें स्पष्ट कर देना जरूरी है। पहली यह कि लोहिया जब अंगरेजी हटाने की बात करते हैं, तो उसका मतलब हिंदी लाना नहीं है। दूसरी, अंगरेजी हटाने के नारे के पीछे लोहिया की एक खास समझदारी है।
लोहिया भारतीय जनता पर थोपी गई अंगरेजी के स्थान पर भारतीय भाषाओं को प्रतिष्ठा दिलाने के पक्षधर थे। 19 सितंबर 1962 को हैदराबाद में लोहिया ने कहा था, ‘अंगरेजी हटाओ का मतलब हिंदी लाओ नहीं होता। अंगरेजी हटाओ का मतलब होता है, तमिल या बांग्ला और इसी तरह अपनी-अपनी भाषाओं की प्रतिष्ठा।लोहिया को अंगरेजी भाषा मात्र से कोई आपत्ति नहीं थी। अंगरेजी के विपुल साहित्य के भी वह विरोधी नहीं थे, बल्कि विचार और शोध की भाषा के रूप में वह अंगरेजी का सम्मान करते थे। लोहिया की अंगरेजी से मूल आपत्ति सार्वजनिक जीवन में इस्तेमाल से है। इसके ठोस सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक कारण हैं। भाषा का सवाल उनके लिए पेट का सवाल है। वह पेट और दिमाग के सवालों को जुड़ा हुआ मानते थे। उनके अंगरेजी विरोध का मूल कारण है, भारतीय संदर्भ में अंगरेजी का सामंती भाषा होना।
दक्षिण के हिंदी-विरोधी उग्र आंदोलनों के दौर में लोहिया पूरे दक्षिण भारत में अंगरेजी के खिलाफ तथा हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं के पक्ष में आंदोलन कर रहे थे। अंगरेजी हटाने के संदर्भ में वह तमिल आदि हिंदी से इतर भाषाओं को लाने की बात अवश्य करते हैं, लेकिन विभिन्न कारणों से उनके लेखन में कहीं-कहीं भारतीय भाषाओं में से हिंदी को ही राजभाषा और राष्ट्रभाषा के पद पर बिठाने की इच्छा अनायास ही प्रकट हो जाती है। हिंदी के प्रति झुकाव की वजह से दक्षिण भारतीयों को लोहिया उत्तर और ब्राह्मण संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में दिखाई देते थे। दक्षिण भारत में उनके अंगरेजी हटाओके नारे का मतलब हिंदी लाओलिया जाता था। इस वजह से लोहिया को दक्षिण भारत में सभाएं करने में कई बार काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। मद्रास और कोयंबटूर में सभाओं के दौरान उन पर पत्थर तक फेंके गए। ऐसी घटनाओं के बीच हैदाराबाद लोहिया और सोशलिस्ट पार्टी की गतिविधियों का केंद्र बना रहा। अंगरेजी हटाओआंदोलन की कई महत्वपूर्ण बैठकें हैदराबाद में हुई।
अंगरेजी हटाने और हिंदी को एकमात्र राजभाषा बनाने के लिए संविधान में प्रावधान किया गया कि 15 साल तक हिंदी का विकास किया जाए और 1965 में अंगरेजी को हटा दिया जाए। लोहिया इस 15 साल की विकास की अवधि के एकदम खिलाफ थे। हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की क्षमता और समृद्धि के बारे में वह बार-बार कहते थे कि जैसे बिना पानी में उतरे तैरना सीखना असंभव है, उसी तरह बिना प्रयोग में लाए भारतीय भाषाओं की समृद्धि मुमकिन नहीं। लोहिया की स्पष्ट समझदारी थी कि जब तक अंगरेजी के साथ रुतबा जुड़ा हुआ है, भारतीय भाषाओं की समृद्धि संदिग्ध है।
जहां तक भाषा और विकास के संबंध की बात है, तो लोहिया अपने लेखन और भाषण में लगातार रेखांकित करते रहे कि विकास का किसी भाषा विशेष से कोई संबंध नहीं होता। वह रूस, चीन, फ्रांस आदि देशों का उदाहरण देकर बताते रहे कि इन तमाम देशों ने अपनी प्रगति बिना अंगरेजी ज्ञान के अपनी भाषाओं के जरिये की है। आज जापान, कोरिया और चीन जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं, जिन्होंने अपनी प्रगति अपनी भाषाओं में की है। वह कहते थे कि भाषा (अंगरेजी) ज्ञान के चक्कर में विद्यार्थी विषय ज्ञान में पारंगत नहीं हो पाते, इसलिए वे भाषा ज्ञान की तुलना में विषय ज्ञान को महत्व देते हैं। लोहिया कहते थे कि मौलिक चिंतन अपनी भाषा में ही संभव है, किसी विदेशी भाषा में नहीं। वह हिंदी को सारी संकीर्णताओं से निकालकर एक उदार भाषा बनाने के पक्षधर थे।
दुर्भाग्य की बात है कि आज भाषा ज्ञान के कुतर्क के खिलाफ विषय ज्ञान की महत्ता के लिए संघर्ष करने वाला कोई राममनोहर लोहिया हमारे बीच नेतृत्व करने के लिए नहीं है, इसलिए हम लड़ाई हार रहे हैं। जब तक हमारी मातृभाषाओं पर गहराते संकट के खिलाफ संघर्ष की जरूरत महसूस की जाती रहेगी, तब तक भाषा संबंधी उनके विचार प्रासंगिक रहेंगे।

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