Tuesday, March 22, 2011

छात्रों का सुधार का बीड़ा उठाना है - लोहिया


गैर कांग्रेसवाद की ओर-छोर को खोजें तो 1953 में लौटना पड़ेगा। यह वह साल है, जिसमें भारत और पाकिस्तान की सरकारों को छात्र आंदोलन के तूफान से गुजरना पड़ा। डॉ. लोहिया ने उसे एक परिघटना माना जबकि दूसरे नेता छात्र असंतोष समझते थे। उस साल उत्तर प्रदेश के छात्र इसलिए उत्तेजित हुए थे कि राज्य सरकार ने छात्र संघों की सदस्यता को ऐच्छिक करने का फैसला ले लिया था। यह प्रस्ताव तत्कालीन राज्यपाल कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी ने रखी थी। इसे छात्रों ने व्यापक अर्थो में लोकतंत्र पर सरकारी शिंकजा माना। छात्रों ने इसके खिलाफ लड़ाई छेड़ दी। बिना किसी नेता के चार महीने यह आंदोलन चला। नेहरू ने इसे उपद्रव माना और धमकी दी कि ‘छात्रों का उपद्रव बर्दाश्त के बाहर हो गया है।’ यह प्रतिक्रिया उस सोच की देन है जिसमें वरीयता कुछ और है, लोकतंत्र नहीं। फिर यहां लोहिया ही थे, जिनकी छेड़ी बहस के कारण अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने उस आंदोलन को विकास विरोधी मानने की अपनी धारणा बदली। इसी समय पाक में छात्र आंदोलन उभरा था, जो बटवारे के समय किए गए वादे को पूरा करने तथा शिक्षा की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग कर रहा था। उस आंदोलन को पाकिस्तान में आज भी याद किया जा रहा है। इन छात्र आंदोलनों से डॉ. लोहिया ने अपना वैचारिक, रागात्मक और वैकल्पिक नाता बनाया। वे सतही बातों में पड़ने वाले नहीं थे। उन्होंने इन आंदोलनों की सम्भावनाओं को भांपा और समाजवादी आंदोलन के नेताओं की अवसरवादिता को इससे तौला। वे अपने स्तर पर विकल्प का औजार बनाने पर विचार करने लगे। पटना गोलीकांड पर उनके बयान से इसकी शुरुआत मान सकते हैं। वे छात्रों से सीधे जुड़ रहे थे। हिन्दी क्षेत्र के छात्र आंदोलनों में उन्होंने गहरी रुचि ली। पहले चरण में डॉ. लोहिया ने विचार और प्रचार को ऊपर रखा। उसके बाद संगठन और आंदोलन के मुद्दे पर आए। जैसे ही उन्होंने अपना ध्यान शैक्षणिक परिसरों की ओर किया। बहस शुरू हो गई कि छात्र पढ़ें या राजनीति करें। यह बहस तब थी, आज भी है और आगे भी चलेगी। इस बारे लोहिया ने जो कहा वह भी एक सत्य है कि छात्र जब राजनीति नहीं करते तो सरकारी नीति को चलने देते हैं। उन्होंने सलाह दी थी,‘समाज और सरकार जब सड़ने लगे तो छात्रों को चाहिए कि वे सुधार का बीड़ा उठाएं।’ इसे उनके जीवनकाल में छात्रों में अपनाया उससे कहीं अधिक उनके जाने के बाद जीवन में चरितार्थ किया। गुजरात हो, बिहार या उसके कई सालों बाद असम का छात्र आंदोलन रहा हो, इन आंदोलनों में डॉ. लोहिया की राजनीति का विराट तत्व प्रकट हुआ। बिहार आंदोलन का नाम ही जेपी आंदोलन हो गया। वे 1974-75 में डॉ. लोहिया की तरह अड़ गए और फिर उन्होंने कमाल दिखाया।



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