Thursday, March 10, 2011

शादी हो या मुंडन पहले रक्तदान


पंजाब के मालवा इलाके में रक्तदान अब सामाजिक कार्य के बजाए परंपरा बनने की ओर अग्रसर है। जन्मदिन, मुंडन, शादी या फिर अंखड पाठ खुशी के ये मौके रक्तदान के बिना पूरे नहीं होते। रिश्तेदारों और मित्रों को भेजे जाने वाले निमंत्रण पत्रों में रक्तदान का कार्यक्रम स्पष्ट रूप से लिखा होता है। मेजबान ही नहीं मेहमान भी रक्तदान के बिना कार्यक्रम को अधूरा मानते हैं। बठिंडा जिले के हररंगपुरा गांव निवासी हरविंदर सिंह की पहल ने इलाके में परंपरा का रूप अख्तियार कर लिया है। मालवा क्षेत्र में शादी समारोह के लिए भेजे जाने वाले निमंत्रण पत्र का मजमून कुछ इस तरह होने लगा है, स्वागत बारात-10 बजे; रक्तदान शिविर 10:30 बजे; आनंद कारज 11 बजे; डोली शाम चार बजे। इस परंपरा की शुरुआत भी बड़ी रोचक है। 15 फरवरी, 2009 को हरविंदर सिंह की शादी थी। वह सजधज कर गहरी बुट्टर गांव में चरनजीत कौर से ब्याह रचाने जा रहे थे। घोड़ी चढ़ने से पहले उन्होंने रक्तदान किया। फिर विवाह की सारी रस्में पूरी की। इसके बाद तो सिलसिला-सा चल पड़ा। कोटशमीर गांव के जमींदार घराने के जसवंत सिंह ने भतीजी वीरपाल कौर और इसी गांव के दोधी मनजीत सिंह गोरा ने अपनी बहन सुखप्रीत कौर के विवाह में रक्तदान शिविर लगाकर बारातियों का स्वागत किया। शादी समारोह के निमंत्रण पत्र पर बाकायदा रक्तदान का समय भी छपवा रखा था। देखा-देखी लाली मोंगा ने अपनी जुड़वा बेटियों अनीषा व मनीषा और बलदेव सिंह सधाना ने दो बेटियों अवनीत व अवदीप के जन्मदिन पर रक्तदान शिविर लगाया। इसके बाद बीड़बहमन स्कूल के पीटी मास्टर ने अपनी सेवानिवृत्ति पर रक्तदान शिविर लगाया जिसमें काफी रक्त एकत्र हुआ। यह मुहिम शादी व जन्म दिन समारोह तक ही सीमित नहीं रही। इसी इलाके के मास्टर ज्ञान सिंह ने अपने पिता अजमेर सिंह के शरीरदान के मौके पर तो जगसीर जींदा ने माता मुख्तियार कौर के निधन पर भोग समागम में रक्तदान शिविर लगाकर दिवगंत आत्मा को श्रद्धांजलि दी। इस प्रेरणादायक मुहिम में शहीद जवानों के परिजन भी पीछे नहीं हैं। कारगिल युद्ध में शहीद हुए गिलपत्ती गांव के कुलदीप सिंह तथा शहीद संदीप सिंह के परिवार के लोग भी प्रति वर्ष श्रद्धांजलि समागम में रक्तदान शिविर आयोजित करते हैं। यूनाइटेड वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष विजय भट्ट रक्तदानियों की सराहना करते हुए कहते हैं कि जब से यह मुहिम चली है तब से किसी भी मरीज को खून के अभाव में जान से हाथ नहीं धोना पड़ा|

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