स्वाधीनता आंदोलन के महान योद्धा डॉ. राम मनोहर लोहिया को अपने जीवन में जो उपेक्षा सहनी पड़ी उसकी बराबरी शायद ही किसी महापुरुष को मिली उपेक्षा से की जा सकती है। इसका कारण सम्भवत: यह था कि उन्होंने हर उस चीज का विरोध किया जो नव स्वतंत्र देश के लिए अनिष्टकर था लेकिन देश का इलीट वर्ग जिसके प्रति अंधा बना हुआ था, जैसे पर्दे के पीछे अंग्रेजों की गुलामी (जिसका प्रमाण आज भी अंग्रेजी भाषा की गुलामी में मिल सकता है), विदेशों की नकल की प्रवृत्ति, पुश्तैनी गुलामों के छोटे से तबके का सारी व्यवस्था पर कब्जा, जातियों की गैरबराबरी, आमदनी की गैरबराबरी, शिक्षा की गैरबराबरी, स्त्री-पुरुष की गैरबराबरी और शक्तिशाली द्वारा कमजोर के जीने के अधिकारों पर निरंतर हमला आदि आदि। उन्होंने जो कहा अखबारों ने नहीं छापा। उन्होंने जो लिखा उसे विद्वानों ने नहीं पढ़ा या पढ़कर भी नजरअंदाज किया। इस उपेक्षा के दंश से आहत होकर ही उन्होंने एक बार कहा, ‘लोग मुझे याद करेंगे लेकिन मेरे मरने के बाद।’
उनके निधन के 43 साल बाद उनकी बातों को आज वे लोग दोहरा रहे हैं जिन्होंने शायद लोहिया को पढ़ा भी नहीं था या जो लोहिया का घोर विरोध करते रहे। उनके विचारों की गूंज इस समय देश से अधिक विदेशों में सुनाई दे रही है।
विश्व सरकार था लोहिया का सपना
लोहिया का एक सपना था, विश्व सरकार। इस सपने के साथ आइंस्टीन, बर्नार्ड शॉ, स्कॉट बुकानन, बट्र्रेड रसेल जैसे नाम जुड़े हुए थे और इसके लिए र्वल्ड गवम्रेट फाउंडेशन की स्थापना हुई थी, जिसके तत्वावधान में लोहिया ने यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका के कई देशों का दौरा किया था। वे चाहते थे कि वयस्क मताधिकार से विश्व संसद चुनी जाए (वर्तमान संयुक्त राष्ट्र की जगह), उसी से रोटेशन द्वारा विश्व सरकार बने (वर्तमान सुरक्षा परिषद की जगह) और सभी देशों में राष्ट्रीय उत्पादन के एक निश्चित प्रतिशत से विश्व विकास प्राधिकरण बने (वर्तमान विश्व बैंक, मुद्राकोष और डब्ल्यूटीओ की जगह)। पिछले कुछ समय में इस सपने की गूंज फिर सुनाई देने लगी है। येल विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रोफेसर पॉल केनेडी ने पुस्तक लिखी है, जिसका शीर्षक है ‘दि पार्लियामेंट ऑफ मैन : यूनाइटेड नेशंस एंड क्वेस्ट फॉर र्वल्ड गवम्रेट’। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिगलिट्ज ने भी भूमंडलीकरण का विश्लेषण करते हुए ब्रेटनवुड संस्थाओं के स्थान पर विश्व विकास प्राधिकरण बनाने का सुझाव दिया है।
नई सभ्यता की गढ़ी थी रूपरेखा
डॉ. लोहिया ने वर्तमान सभ्यता को, जिसे पश्चिमी सभ्यता व औद्योगिक सभ्यता भी कहा गया है (जिसकी पूंजीवाद और साम्यवाद जुड़वां संतानें हैं) के अंत की घोषणा 1951 में की थी। उन्होंने कहा था कि यह सभ्यता मर चुकी है और पचास-एक साल तक लाश की तरह घिसटती रह सकती है। इसके स्थान पर उन्होंने नई सभ्यता की रूपरेखा भी प्रस्तुत की जिसका आधार है-गांधी की सिविल नाफरमानी, अहिंसा के साधन, प्रकृति के साथ साहर्चय सम्बंध बनाने वाला विकास, अधिकतम उत्पादन और उपभोग के स्थान पर नियंत्रित उत्पादन, सीमित उपभोग और विकेंद्रीकरण, आधिकाधिक जीवनस्तर की जगह सबके लिए सम्मानजनक जीवनस्तर। हाल ही में मिनिसोटा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर इमैनुअल वाल्स्ट्रीन ने अपनी पुस्तक ‘दि एंड ऑफ दि र्वल्ड ऐज वी नो इट’ में वर्तमान सभ्यता की मृत्यु की घोषणा की है और इसके स्थान पर नई सभ्यता की सम्भावना को तलाशा है। वे लोहिया की कई बातों को दोहराते हुए लगते हैं। नोम चोम्स्की तो अपनी पुस्तकों ‘हेजीमनी एंड सर्वाइवल’ तथा ‘फॉर रीजन ऑफ स्टेट’ में नई सभ्यता का उभरता हुआ स्वरूप भी विश्व सामाजिक मंच जैसे आंदोलनों में देख रहे हैं, जिसका नारा है : ‘एक नई दुनिया सम्भव है।’
आज की परिस्थिति का था पूर्वाभास
इधर, भूमंडलीकरण के प्रताप के कारण भारत और चीन के उत्कर्ष पर पश्चिम के देशों में भी कहा जाने लगा है कि भारत और चीन उन्हीं के खेल में उन्हीं को मात दे रहे हैं। भारत-चीन के शासक तो इस पर फूले नहीं समा रहे हैं। लोहिया ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘इकनॉमिक्स ऑफ्टर मार्क्स’ में कहा था (तथा अपने कई भाषणों में दोहराया भी था) कि अगर एशिया आदि तीसरी दुनिया के देश पश्चिमी देशों के विकास को अपने यहां दोहराना चाहेंगे तो उन्हें करोड़ों लोगों की बलि देनी पड़ेगी क्योंकि पश्चिमी देशों के विकास ने अपने उपनिवेशों को लूटा और तबाह किया जबकि तीसरी दुनिया के देशों के पास उपनिवेश नहीं होंगे और वे अपनी ही जनता को लूटेंगे और तबाह करेंगे।
भारत, चीन की आड़ में जारी है खेल
पश्चिमी ढंग के विकास के लिए उपनिवेश आवश्यक हैं और अगर ये उपनिवेश बाहर नहीं होंगे तो अपने ही देश में बनाने पड़ेंगे। भारत व चीन इस समय यही कर रहे हैं। वे अपनी ही गरीब जनता व पिछड़े इलाकों को लूट रहे हैं और वहां की जनता से जल, जंगल, जमीन छीनकर, उन्हें भूख, प्यास और बीमारियों से मरने के लिए मजबूर कर रहे हैं, या गोलियों से भून रहे हैं। जेरेमी ब्रूक जैसे बुद्धिजीवी भारत और चीन में आंतरिक उपनिवेशों की बर्बादी के इस खेल को देख रहे हैं। उन्होंने कुछ समय पहले एक पत्रिका में इस पर विस्तार से लिखा था। उन्होंने लिखा : ‘ऐसा लगता है कि पश्चिम, भारत और चीन की आड़ में अपनी गलतियों का पुन: प्रयोग कर रहा है। वह उस इतिहास को परोक्ष रूप से दोहराना चाहता है जिसने अंधाधुंध औद्योगिक विकास के लिए धरती को उजाड़ा और असंख्य लोगों की हत्याएं कीं अथवा वह भारत और चीन में अपने अद्भुत प्रयोग को दोहरा कर यह देखना चाहता है कि सीमित विश्व में आदमी की असीमित भूख की बेलगाम अभिव्यक्ति का तब क्या परिणाम निकलेगा जब लूटपाट और शोषण के लिए उपनिवेश उपलब्ध नहीं होंगे।’
काबू कहां हो रहा मंदी का प्रभाव
इस समय दुनिया के बुद्धिजीवी इस बात पर चकित हैं कि जिस पूंजीवाद ने कुछ समय पहले साम्यवाद के किले को ध्वस्त कर इतिहास का अंत किया और विश्व का एकछत्र सम्राट होने का दावा किया वह कैसे कुछ जुआरियों और सट्टेबाजों के खेल के कारण अचानक ढह गया। आर्थिक मंदी को शुरू हुए दो साल हो गए किंतु केंद्रीय बैंकों की सारी तिजोरियां खोल देने के बाद भी मंदी थमने का नाम नहीं ले रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने 1930 की मंदी पर काबू पाने के लिए जो उपाय किए थे, वैसे कुछ उपाय करने के बाद और मार्क्स तथा कींस को दोबारा खंगालने के बाद भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था और उसके प्रभाव से सारे विश्व की अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं लौट पा रही है और नोबेल पुरस्कार विजेता पॉल क्रुगमैन को लिखना पड़ रहा है कि रूजवेल्ट के ‘न्यू डील’ के उपाय भी मंदी पर काबू नहीं पा सके थे और दूसरे युद्ध ने ही अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित किया था।
विश्व समता के मूल्य को जीना सीखें
डॉ. लोहिया ने ‘इकनॉमिक्स ऑफ्टर मार्क्स’ में पूंजीवाद के इन संकटों का जो विश्लेषण प्रस्तुत किया था वह आज भी सर्वाधिक प्रासंगिक है। उन्होंने कहा था कि विश्व को एक परिवार मान कर ही धनी देश निर्धन देशों को उनके लिए उपयुक्त टेक्नोलॉजी देकर उनकी सहायता करें न कि वहां अपने भारी उद्योग लगा कर तथा सहायता की आड़ में उनका शोषण करें तो विकसित देशों के कारखाने भी काम करते रहेंगे जिससे वहां पर्याप्त रोजगार पैदा होंगे और विकासशील तथा अविकसित देशों का भी विकास होगा। विश्व-मंदी से बचने का यही रास्ता है कि विश्व समता के मूल्य को जीना सीखे।
अपने दम पर विपक्ष के लिए बनाई थी जगह
लोहिया तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की नीतियों का विरोध करने के लिए बदनाम हुए। आज भी नेहरू की नीतियों के प्रशंसक और वामपंथी उन्हें इस बात के लिए कोसते हैं। हालांकि अब न तो कोई नेहरू की नीतियों को पूछता है और न वामपंथी नीतियों को। लोहिया ने बिना देशी या विदेशी सहायता के 10 सालों में मुट्ठी भर सांसदों के बल पर चट्टान की तरह जमी कांग्रेस को विस्थापित कर भारतीय राजनीति में विपक्ष के लिए स्थायी जगह बनाई अपनी पार्टी की कीमत चुका कर। फिर भी कुछ नामी वामपंथी बुद्धिजीवी उन्हें पूरनचंद जोशी और ज्योति बसु की तुलना में सिफर उपलब्धि वाला मानते हैं जबकि इन दोनों वामपंथी नेताओं की राजनीति अंतिम सांसें ले रही है। ये बुद्धिजीवी मारिया मिश्र की पुस्तक ‘विष्णुज क्राउडिड टैम्पल’ पर चुप रहे जिसमें नेहरू की नीतियों को ब्रिटिश राज की नीतियों का फूहड़ अनुकरण बताया गया है जो कि लोहिया का नेहरू पर मुख्य आरोप था।
सभी पार्टियों की जड़ में हैं लोहिया के विचार
डॉ. लोहिया द्वारा उठाये गए मुद्दे आज हर राजनीतिक पार्टी के मुद्दे बने हुए हैं। उन्होंने 27 करोड़ और तीन आना की बहस से जिस आर्थिक गैरबराबरी की तरफ ध्यान खींचा था, वह आज भी बहस का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है और 84 करोड़ लोग 20 रुपये रोज पर जी रहे हैं, जो 1963 के तीन आने से भी कम होते हैं। उनके द्वारा चलाया गया जाति व्यवस्था के खिलाफ अभियान आरक्षण व जातिवार जनगणना के आंदोलनों के रूप में सब राजनीतिक पार्टियों का अभियान बन गया है और 60 साल तक जातिवार जनगणना को टालते रहने वाली पार्टियां भी उसे मानने के लिए बाध्य हुई हैं। द्विज मानसिकता वाली जिन पार्टियों ने नौकरियों में महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग कभी नहीं की, बावजूद सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसके लिए हरी झंडी दिए जाने के, वे आज लोहिया के नर-नारी समता के सिद्धांत का हवाला देकर विधानमंडलों में महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग कर रही हैं। हालांकि लोहिया हमेशा विधानमंडलों के आरक्षणों के खिलाफ लड़ते रहे क्योंकि ये आरक्षण दो राष्ट्रों के सिद्धांत का कारण रहे और इसी सिद्धांत पर देश का बंटवारा हुआ था।
समान अप्रासंगिकता का सिद्धांत
भारत-पाक महासंघ और उसके अंतर्गत कश्मीर की जनता को आत्मनिर्णय की सुविधा के उनके सुझाव का सबने विरोध किया किंतु आज जस्टिस कृष्णा अय्यर, लालकृष्ण आडवाणी और लॉर्ड मेघनाथ देसाई सहित अनेक बुद्धिजीवी उसका समर्थन कर रहे हैं। नेहरू ने भी निधन से कुछ समय पहले शेख अब्दुल्ला के साथ इस सुझाव पर विचार-विमर्श किया था। हालांकि जनरल अयूब खां ने उनके इरादे पर पानी फेर दिया था। इधर, सवरेदय और पर्यावरण आंदोलनों से जुड़ी संस्थाएं लोहिया के ‘हिमालय बचाओ’ मुद्दे को उठा रही हैं और नदियों को साफ करने के लिए बड़ी-बड़ी योजनाएं बना रही हैं। अरुंधति राय जैसी रोमानी क्रांतिकारी बुद्धिजीवी भी घूम-फिर कर गांधियन समाजवाद की और पूंजीवाद तथा साम्यवाद से परे जाने की बातें कर रही हैं जो कि लोहिया के समान अप्रासंगिकता के सिद्धांत का ही भाष्य है। ये सब बातें अलोहियावादी कर रहे हैं जिन्होंने लोहिया को नहीं पढ़ा लेकिन वे लोहिया की भाषा बोल रहे हैं। कम से कम इससे तो लोहिया-निंदकों की आंखें खुलनी चाहिए।
लोहिया का एक सपना था, विश्व सरकार। इस सपने के साथ आइंस्टीन, बर्नार्ड शॉ, स्कॉट बुकानन, बट्र्रेड रसेल जैसे नाम जुड़े हुए थे और इसके लिए र्वल्ड गवम्रेट फाउंडेशन की स्थापना हुई थी, जिसके तत्वावधान में लोहिया ने यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका के कई देशों का दौरा किया था। वे चाहते थे कि वयस्क मताधिकार से विश्व संसद चुनी जाए (वर्तमान संयुक्त राष्ट्र की जगह), उसी से रोटेशन द्वारा विश्व सरकार बने (वर्तमान सुरक्षा परिषद की जगह) और सभी देशों में राष्ट्रीय उत्पादन के एक निश्चित प्रतिशत से विश्व विकास प्राधिकरण बने (वर्तमान विश्व बैंक, मुद्राकोष और डब्ल्यूटीओ की जगह)
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