Tuesday, March 22, 2011

लोहिया की समग्र जातीय दृष्टि मार्क्सस से आगे और मंडल से भी व्यापक


लोहिया के सिद्धांत के अंतर्गत सच को जानना, सच का सामना करना और फिर सच को बेहतर बनाना; यह सब एक साथ होना चाहिए। इसलिए यह जरूरी है कि हम जाति और वर्ग का सच जानें। उसकी गणना करें और उसके आधार पर अब तक जो नीतियां और कार्य क्रम हैं, उनकी समीक्षा करें। जातिविहीन समाज बनाने का जो संवैधानिक संकल्प है और स्वतंत्रता संग्राम के जो आदर्श हैं, उन पर आगे बढ़ने की कोशिश करें

डॉ. राममनोहर लोहिया ने भारतीय समाज की संरचना में जाति की भूमिका को समाजवादी समाज के निर्माण के संदर्भ में बहुत महत्त्वपूर्ण माना था। इसके कारण समाजवादी चिंतन धारा में वर्ग प्रधान नीतियों के समानांतर जाति के प्रति सजग नीतियों की जरूरत महसूस की जाने लगी। समाजवादियों ने डॉ राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में 1960 से पिछड़ों को विशेष अवसर के सिद्धांत की प्रस्तुति की। इसमें पिछड़े की परिभाषा अतिव्यापक की गई, जिससे कि जातिभेद और लिंगभेद दोनों को विषमताओं के निर्मूलन के संदर्भ में पहचाना जाए और इनके वर्ग व्यवस्था से सम्बन्ध को भी समझा जाए। मार्क्‍सवादी विचारधारा के विकास में कई महत्त्वपूर्ण सत्यों का उद्घाटन हुआ था लेकिन एशिया के संदर्भ में मार्क्‍सवादियों ने स्थानीय सभ्यता और संस्कृति के साथ तालमेल बिठाए बगैर जो किताबी समझदारी पेश की उसमें इस तथ्य की अनदेखी की गई कि भारतीय समाज की संरचना में, अन्यायों की जड़ में जाति और स्त्री-पुरु ष भेद का हाथ है। इस मायने में लोहिया भारतीय समाजवाद के माक्सरेत्तर चिंतकों के अग्रणी बने। लोहिया ने पिछड़े की परिभाषा में सबसे पहले महिलाओं को स्थान देने की बात कही है। यह मार्क्‍स और गांधी दोनों के चिंतन से बल पाता है। मार्क्‍स ने महिला को पुरु ष का सर्वहारा माना था और गांधी ने महिला को मानव समाज का श्रेष्ठतर तत्व होने के बावजूद लगातार पीछे रखे जाने की विवशता की शिकार माना था। पिछड़े की परिभाषा में लोहिया ने दूसरे नम्बर पर अस्पृश्यता के शिकार मनुष्यों को रखा। तीसरे नम्बर पर जनजातियों से जुड़े समुदायों को रखा। चौथे नम्बर पर उनकी दृष्टि में हिन्दुओं, मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के बीच में जो तथाकथित पिछड़ी जातियां कहलाती हैं; जो मूलत: श्रमजीवी और कामकाजी जमात की हुनरमंद लोगों की जमातें हैं; उनको उन्होंने रखा। उन्होंने इस कोटि में जो गैर हिन्दू जमातों के पिछड़े हैं, उनको पांचवें क्रम में शामिल करने का काम किया। इस तरह से पांच तरह के पिछड़े समूहों को लोहिया ने एक साथ विशेष अवसर का अधिकारी माना। इसकी शुरु आत में उन्होंने अपने दल के अंदर उम्मीदवार चुनते समय और पदाधिकारी और समितियों का चयन करते समय साठ सैकड़ा के सिद्धांत की जरूरत को बल दिया और उसका पालन किया। इसके परिणामस्वरूप भारत के सभी दलों की तुलना में लोहिया के दल और आंदोलन से बड़ी संख्या में पिछड़ी जमातों से जुड़े लोग राष्ट्रीय नेतृत्व की कतार में आ गए।
लोहिया और मं डल की सोच में अंतर
राममनोहर लोहिया की जाति सम्बन्धी दृष्टि और दिशा को बाद के कई लोगों ने भारत की राजनीति में जाति के बढ़ते प्रभाव का कारण माना है। उनका यह आरोप है कि डॉ लोहिया ने भारतीय समाज को अगड़ा और पिछड़ा में बांटा और समाजवादियों ने लोहिया के बाद पिछड़ों में भी सिर्फ मझोली जातियों को आरक्षण का अधिकारी मानते हुए न सिर्फ पिछड़ावाद चलाया बल्कि दलितों और पिछड़ों के बीच एकता कायम न कर के विवाद बढ़ाया और अब महिलाओं के आरक्षण का भी विरोध कर रहे हैं। यह सही है कि राममनोहर लोहिया की समाजवादी राजनीति से पैदा अनेकों लोगों ने क्षेत्रीय दलों की शक्ल में उत्तर भारत में महत्त्वपूर्ण भूमिका प्राप्त की है और उनके नेतृत्व में चल रहे राजनीतिक संगठनों में प्राय: पिछड़ावाद की गूंज सुनाई पड़ती है। इनमें से कुछ दल महिला आरक्षण के भी विरोधी हैं लेकिन इसके लिए डॉ लोहिया के बजाए बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल द्वारा प्रस्तुत आरक्षण फार्मूला जिम्मेवार है। जिसे हम सभी मंडलवाद या मंडल रिपोर्ट के रूप में जानते-पहचानते हैं। लोहिया और मंडल की राजनीतिक सोच और दिशा में पूरब और पश्चिम या दिन-रात जितना अंतर है। श्री मंडल को डॉ लोहिया ने अपने जीवनकाल में अपने दल के अंदर सत्ता की राजनीति के लिए सिद्धांतों से समझौता करने का अपराधी पाया था। श्री मंडल ने डॉ लोहिया के गैरकांग्रेसवाद की राजनीति के समूची रणनीति को बिहार में अपने को मुख्यमंत्री बनाने के लिए ध्वस्त करने का प्रयास किया था। इसीलिए डॉ लोहिया की नीति को हम पिछड़ों के लिए विशेष अवसर की नीति के रूप में पहचानें और मंडलवाद को आरक्षण की नीति के साथ जोड़कर देखें तो बेहतर होगा।
वर्ग-जाति में अभिन्न सम्बन्ध
डॉ लोहिया की दृष्टि में वर्ग और जाति के बीच में अभिन्न सम्बन्ध है। मंडल-फार्मूले में वर्ग के बारे में कोई सजगता नहीं है। उन्होंने जाति के आधार पर सामाजिक पिछड़ेपन की परिभाषा करने की कोशिश की, जिसका सुधार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय द्वारा तथाकथित मलाईदार तबके और अन्य तबकों के बीच के अंतर के रूप में स्थापित किया गया। लोहिया की जाति नीति बगैर वर्ग विश्लेषण के अधूरी होगी। वैसे भी वर्ग विश्लेषण का कोई प्रयास जाति की उपेक्षा करके दिशाहीन बन जाता है। इन दोनों में यानी वर्ग और जाति में स्त्री प्रसंग को जोड़ना अनिवार्य है। डॉ लोहिया तो नारी समता को विश्व की सबसे बड़ी क्रांति और जरूरत मानते थे। फिर भी यह कहना जरूरी होगा राममनोहर लोहिया के पिछड़ों के विशेष अवसर के सिद्धांत में जो त्रुटियां आई, उनमें लोहिया की समान दृष्टि और सामाजिक परिवर्तन की रणनीति के साथ कुछ न कुछ सम्बन्ध है। कम से कम इतना सम्बन्ध तो है कि डॉ लोहिया की जय लगाने वाले अनेकों लोग उनके बाद पिछड़ावाद और अगड़ावाद की राजनीति में कोई दोष नहीं देख सके और आज भी वह महिला आरक्षण के खिलाफ यह तर्क देते हैं कि महिलाओं के अंदर जाति के आधार पर जो अंतर होना चाहिए, उसको जोड़े बगैर महिला आरक्षण काम का नहीं रह जाएगा।
जाति तोड़ो सिद्धांत
जाति प्रथा’ नामक निबंध संग्रह में यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि डॉ लोहिया की जाति, वर्ग और स्त्री सम्बन्ध दृष्टि 1949-50 से 1967 तक (जब उनका निधन हुआ) सत्रह साल में धीरे-धीरे विकसित हुई। उन्होंने अपने विश्लेषण में जाति के संदर्भ में अन्य जाति विरोधी चिंतकों की तुलना में इस बात को खुलकर रखा और जो उनको बाकी जाति चिंतकों से अलग करती है, वह है जाति तोड़ो का सिद्धांत और कार्यक्रम। उनकी निगाह में अगड़ों की जगह पिछड़ों तथा ब्राह्मणों की जगह मराठा, रेड्डी, कम्मा या यादव को स्थान देने से जाति व्यवस्था कमजोर नहीं होगी। खाली जगहें बदलेंगी अन्याय को जो मूल सैद्धांतिक आधार है, वह जस का तस बना रहेगा। उन्होंने यह भी माना कि दक्षिण भारत का ब्राह्मण विरोधी आंदोलन और पश्चिम भारत का गैर ब्राह्मण आंदोलन दोनों ही सीमित उद्देश्यों के लिए चलाए गए क्रांतिकारी लफ्फाजी के उदाहरण थे। इसलिए वह चाहते थे कि अब जाति पर जो प्रहार किया जाए, वह समाजवाद के आधार पर न कि ब्राह्मण विरोधी या द्विज विरोधी दृष्टि के तहत किया जाए। इसमें ब्राह्मण और अन्य सवर्ण जातियों के या द्विज जातियों के गरीब भी शामिल हों।
उच्च-पिछड़ी जातियां बनाएं नया समाज
डॉ लोहिया का यह मानना था कि आनेवाले समय में नया समाज बनाने के लिए उच्च और पिछड़ी जातियों के बीच में आदर्श सम्बन्ध की तलाश करनी होगी, जिसमें एक आदर्श तो चाणक्य और चंद्रगुप्त के सम्बन्धों का है। जिसमें जो राजनीतिक दृष्टि से सजग और सामाजिक दृष्टि से समर्थ जाति समूह हैं, वह नए समाज की रचना में पिछड़ चुके या पिछड़ रहे लोगों के सलाहकार बन के सत्ता की लगाम पिछड़ों के हाथ में सौंपे और उनके कौशल से देश निर्माण को आगे बढ़ाएं। दूसरा आदर्श उन्होंने किसान की जिंदगी से लिया। जिसमें उन्होंने माना कि जो सवर्ण जातियों के आदर्शवादी युवक हैं यानी जो समाजवाद चाहते हैं वह पिछड़ों के राजनीतिक अभ्युदय में खाद की भूमिका अदा करें क्योंकि जो पूरा समाज है वह जातििलंग भेद के कारण लकवाग्रस्त है। दिशाहीन, गतिहीन और उदासीन है। इस उदासीनता और गतिहीनता को तोड़ने के लिए एक तरफ स्त्री को पुरु ष के बराबर हर अवसर देना पड़ेगा, उसकी तेजस्विता को फिर से अवसर देना पड़ेगा और दूसरी तरफ पिछड़ों को भी योग्यता की शर्त से अलग करके अवसर की गुंजाइश पैदा करनी पड़ेगी क्योंकि बिना अवसर के योग्यता नहीं निखर सकती। उनका यह निष्कर्ष पिछड़ावाद और स्त्री-पुरुष भेद को तोड़ने के लिए सर्वमान्य हो; इसका प्रयास डॉ लोहिया ने तमाम तरह की कोशिशों से किया। आखिर फिर यह क्यों हुआ कि डॉ लोहिया की नीतियों से लाभान्वित तबके उनके जाने के बाद स्त्री के प्रश्न पर इतने दुराग्रही हो रहे हैं दलितों और गैर द्विज पिछड़ी जातियों विशेष तौर पर किसान जातियों के बीच में फासला कम नहीं हो रहा है। असल में तो उत्तर प्रदेश में आज लड़ाई शूद्र बनाम अतिशूद्र की चल रही है। एक तरफ दलित नेतृत्व का दल शासन में और दूसरी तरफ शूद्र नेतृत्व का दल सबसे प्रबल विरोधी दल के रूप में। बिहार में यह लड़ाई शूद्र बनाम शूद्र की है। जहां पर एक जमात कुर्मिंयों की अगुआई में शासन में और दूसरी जमात यादवों की अगुआई में विरोध पक्ष है। दक्षिण- पश्चिम भारत में तो पिछड़ा और अति पिछड़ा का सवाल दलितों में अदालत की चौखट तक पहुंच चुका है। जहां पर दलित और महादलित के बीच में खुलेआम आरक्षण के लिए मुकदमेबाजी हो रही है। उत्तर भारत में गुर्जर अपने को पिछड़े से निकालकर आदिवासी की कोटि में डालना चाहते हैं और सबसे बलशाली गैर द्विज जमात जाट पिछड़े वर्ग के रूप में गिनवाए जाने के लिए ट्रेनें और रास्ते रोक रहे हैं।
प्रभु जाति प्रजातंत्र की परिणति
ये सब लोहिया के विचारों के दुष्परिणाम नहीं हैं। यह तो प्रभुजाति प्रजातंत्र की तार्किक परिणति है। आज समाजवाद के लिए नहीं संसदवाद के लिए राजनीतिक सक्रियता का संगठन किया जा रहा है। जिसमें सामान्य हितों के लिए यानी रोटी, कपड़ा और मकान के लिए राजनीति करना किसी की प्राथमिकता नहीं है। अब संयुक्त मोर्चे का जमाना है जिसमें मजबूत जमातें अपने-अपने सदस्यों का राजनीतिक संगठन बनाकर पांच प्रतिशत से पंद्रह प्रतिशत वोट के आधार पर दस प्रतिशत से चालीस प्रतिशत सीटों को जीतकर सत्ता की साझेदारी का सपना सच कर रहे हैं। उनके लिए आज महंगाई, मजदूरी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा जैसे सवाल गैरजरूरी हो गए हैं। इस समय प्रभुजाति प्रजातंत्र के कारण एक तरफ दलित और आदिवासी परेशान हैं। दूसरी तरफ महिलाओं की कोई सुनवाई नहीं हो रही। इसमें बिहार ने कुछ नए प्रयोग किए हैं। बिहार की राजनीतिक जमात ने नए सूत्रों के आधार पर जहां हमारी आरक्षण की राजनीति यानी मंडलवाद अंतर्विरोधों का शिकार होकर गतिहीन हो गया था, वहां से उन्होंने आगे जाने की कोशिश कर रहे हैं। इसीलिए सबसे पहले महिलाओं के लिए पंचायत और जिला परिषद में, नगरपालिका में पचास प्रतिशत आरक्षण किया है। इसके सुंदर परिणाम आने शुरू हो गए हैं। इन महिलाओं के बीच में एक लिंग के अंदर कई जाति और वगरे का होना पहचाना गया है। इसलिए आरक्षण के अंदर आरक्षण की व्यवस्था की गई है। दूसरी तरफ जो प्रमुख आरक्षण आधार थे, यानी पिछड़ावाद और दलित समूह। इनके अंदर भी अंदरु नी फर्क है, उसको पहचानने का साहस दिखाया गया है। पिछड़ा-अति पिछड़ा और दलित-अतिदलित के नए वर्गीकरण प्रस्तुत किए गए हैं। यह प्रयोग मुसलमानों के बीच में भी जो अगड़ा-पिछड़ा का दो बड़ा संसार है उसको पहचानता है और पसमांदा मुसलमानों के नाम पर एक नई पहचान बनाई गई है। इससे यह साफ होता है कि भारत में जाति के सवाल पर डॉ लोहिया के पहले या उनके बाद जो कदम उठाए गए हैं, उनके जो परिणाम निकले हैं, उनसे जाति के अंदर वर्ग निर्माण और वर्गों के अंदर जातियों का समूहीकरण हुआ है। इसी के समानांतर स्त्रियां भी शिक्षा से लेकर राजनीति में अगली कतार में आने की कोशिश कर रही है।
इसलिए जरूरी है जाति जनगणना
इन सबको देखते हुए अब यह जरूरी हो गया है कि भारत की जाति तस्वीर सामने लाई जाए। यह अफसोस की बात है कि भारतीय समाज के संगठन के जो दो बड़े आधार हैं, उनके बारे में हमारे देश की सरकार और समाज पास कोई पक्की जानकारी नहीं है। एक तरफ हमको यह नहीं मालूम कि आर्थिक दृष्टि से भारत में कितनी बड़ी तादाद में लोग वंचित हैं और गरीबों की तादाद कितनी है। इसी तरह दलित और मुसलमानों की उनकी संख्या से कम की गणना की जाती है, जिससे कि उनका आरक्षण कम दिखाया जा सके। दूसरी तरफ अन्य लोग यह देख रहे हैं कि पिछले साठ बरस की प्रगति यात्रा में शिक्षा के कारण, आर्थिक नवनिर्माण के कारण राजनीतिक शक्तिकरण के कारण बहुत सारी जमातों में प्रगति आई है। भारत का मध्यम वर्ग 10 फीसद से बढ़कर लगभग 30 फीसद हो चुका है और उसमें सभी जमातों से लोग आए हैं। तो क्या हमें जाति तस्वीर और वर्ग तस्वीर की फिर से जांच नहीं करनी चाहिए? बहुत सारी जातियों के नाम बदले हैं, उनके नए समूह बने हैं। इसलिए यह जरूरी है कि हम जाति के आधार पर जनगणना करें। कुछ लोगों को लगेगा की हम एक पुराने दोष को जिंदा कर रहे हैं। ऐसे लोगों से मैं पूछना चाहूंगा कि क्या हम परिवार के अंदर हम अपनी जाति नहीं जानते। हम अपने बच्चों को उनकी जाति नहीं बताते। क्या विवाह के अवसर पर हम प्राय: जाति के अंदर विवाह को सहर्ष स्वीकृति और जाति के बाहर विवाह को रोकने की कोशिश नहीं करते? आखिर ये खाप पंचायतें तथाकथित सम्मान हत्याएं किस बात को कर रहे हैं। जातियों को लेकर के झगड़े किसलिए हो रहे हैं। क्या हम चुनाव लड़ते समय उम्मीदवार की जाति और टिकट देते समय प्रत्याशियों की जाति नहीं जानते। क्या हम अपने प्रशासन के विभिन्न पदों पर बैठे पदाधिकारियों की जाति नहीं जानते?
जाति सामाजिक शक्ति स्रेत
तो आखिर जाति कहां छिपी हुई है, जो जाति की गणना करने से वह सामने आ जाएगी। जाति एक व्यापक सच है। यह बहुत बड़ा सामाजिक शक्तिस्रेत है। इसके जरिए हम परेशानी के समय सुरक्षा पाते हैं। जन्म से मरण तक जाति हमें समाज के कुछ सदस्यों से स्वत: जोड़ देती है। इससे बड़ी सामाजिक सुरक्षा की योजना अभी जीवन बीमा निगम या भारत सरकार के पास भी नहीं है। फिर यह बचकानी बात होगी कि हम जिस सिद्धांत और व्यवस्था के अंतर्गत जी रहे हैं। उसकी गणना करने से घबराएं। इसी तरह गरीबी का सवाल है। गरीबी के बारे में भी यह छिपाने से नहीं दूर होनेवाली है। दुनिया के लोग जब हमारे महानगरों में आते हैं तो वह फुटपाथों पर भीख मांग रहे बच्चों से लेकर शहर में सार्वजनिक जगहों पर झुग्गी झोंपड़ी में करोड़ों की तादाद में जी रहे मनुष्यों को देखते हैं। मैं समझता हूं कि लोहिया के सिद्धांत के अंतर्गत सच को जानना, सच का सामना करना और फिर सच को बेहतर बनाना; यह सब एक साथ होना चाहिए। इसलिए यह जरूरी है कि हम जाति और वर्ग का सच जानें। उसकी गणना करें और उसके आधार पर अब तक जो नीतियां और कार्यक्रम हैं, उनकी समीक्षा करें। जाति विहीन समाज बनाने का जो संवैधानिक संकल्प है और स्वतंत्रता संग्राम के जो आदर्श हैं, उन पर आगे बढ़ने की कोशिश करें।


3 comments:

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    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच

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  3. आपके विचार धारदार और ब्लॉग प्रासंगिक है. कृपया इसे जारी रखें.

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